Tuesday, February 1, 2011

नज़रे इलाहाबाद विश्वविद्यालय


Allahabad University
जहां आकर अदब के साथ जीना हमने सीखा है
तभी लोगों ने इसका नाम माहो-मश्रिक रखा है

  मीलों दूर से आते ईल्म के पासबां सारे
फूटे जिनकी पेशानी से अहले-ईल्म के तारे

चमन है ये अदीबों का, बग़ावत का, मोहब्बत का
के सारे मुल्क में फैला है चर्चा जिसकी अज़मत का

चमन है ये बग़ावत का जहां बाग़ी हैं हम सारे
हमारी ठोकरों में हैं फ़लक़ के चांद और तारे

चमन है ये मोहब्बत का प्यार के फूल हम सारे
हमारे इश्क़ के दम से हैं ये पुरनूर नज़्ज़ारे

चमन है ये अदीबों का वो रूहानी-इदराक़ है
यहीं महफ़िल है‘बच्चन की यहीं बज़्में फ़िराक़है

हज़ारों माहो-अख़्तर की शोख़ अंगड़ाइयां भी हैं
कहीं बज़्मे-मोहब्बत है कहीं तन्हाइयां भी हैं

यहां की शाम ‘लखनऊ की शाम’ से नहीं कमतर
यहां की सुबह तो है ‘सुबहे बनारस’ से भी बढ़कर

यहीं है ईल्म की गंगा यही तहज़ीब की यमुना
यहीं है संगमो-प्रयाग की पाकीज़गी जाना

सलाम तुझको तेरी शान व शौकत को है सलाम
मिला दर्जा तुझे सेंट्रल की उस अज़मत को है सलाम।।

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