Wednesday, April 23, 2014

शौक बड़ी चीज़ है... सच्ची

Sanjiv Saraf
कभी ग़ालिब ने मीर के लिए कहा था, ‘रेख़्ता के तुम ही उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था...’  तब यह मीर की शायरी के लिए कहा गया था, लेकिन आज संजीव सराफ को उनकी उर्दू शायरी से मुहब्बत के लिए कहा जा सकता है कि सचमुच वे ‘रेख़्ता’ के उस्ताद हैं, जिन्होंने उर्दू शायरी का सबसे बड़ा आनलाइन ख़ज़ाना ‘रेख़्ता’ की नींव रखी...प्रभात ख़बर के लिए जब मैंने संजीव सराफ जी से बात की, तो उन्होंने अपने उर्दू शायरी के शौक और जुनून को कुछ इस तरह बयान फरमाया...

मेरी मुहब्बत का नज़राना है रेख़्ता : संजीव सराफ

         मौजूदा दौर इंटरनेट का दौर है. किसी भी हाल में हम इससे अछूते नहीं रह सकते. इसकी मकबूलियत की तस्दीक इस बात से होती है कि आज पूरी दुनिया इंटरनेट पर मौजूद है और हर काम के लिए लोग इंटरनेट का ही सहारा लेते हैं. इत्तेफाकन एक दिन मैं भी अपनी पसंदीदा गज़लें ढूंढ रहा था, लेकिन वे उस सलीके में मौजूद नहीं थीं, जैसा कि उन्हें होना चाहिए. मुझे इस दुश्वारी ने एक मशवरा दिया कि मैं एक ऐसी वेबसाइट शुरू करूं, जो पूरी तरह से देवनागरी लिपि में उर्दू शायरी की प्रमाणिकता का प्रतिमान बन जाये. मेरी इसी कोशिश ने रेख़्ता को जन्म दिया. उर्दू जबान से मेरी मोहब्बत का यह सबसे बड़ा सबूत है कि रेख्ता वेबसाइट तीन सौ साल से लेकर आज तक की शायरी का एक अनमोल ख़ज़ाना बन गयी है. आज अगर किसी फनकार की कोई किताब छपती है, तो वह कुछ लाइब्रेरियों तक ही सीमित होकर रह जाती है. लेकिन अगर कोई गजल रेख्ता पर पहुंचती है, तो वह पूरी दुनिया में मकबूलियत पाती है. यह नये फनकारों के लिए तो है ही, साथ ही मुल्क से बाहर बैठे हमारे अपनों के लिए भी है, जो शायरी से मुहब्बत करते हैं. मेरा मानना है कि किसी भी चीज़ को पाने के लिए जब तक आपके दिल में शिद्दत भरी मुहब्बत पैदा नहीं होगी, तब तक उसे आप हासिल नहीं कर सकते. मेरी मुहब्बत का नजराना आपके सामने है, अगर आपकी मुहब्बत का नज़राना भी हमें मिले, तो इससे बेहतर कोई और बात नहीं होगी.


कैसे हुई रेख़्ता वेबसाइट की शुरुआत
एक बड़े शायर का एक बेहतरीन शे’र है- 
                          उर्दू हमारे मुल्क की वाहिद ज़बान है। 
                       गंगा की जिसमें रूह तो जमुना की जान है।। 
आखिर जिस ज़बान में गंगा और जमुना जैसी पाकीज़ा नदियों की तासीर मिल रही हो और जिसके अशआरों, गजलों, नज्मों को पढ़-सुन कर गंगा-जमुनी तहज़ीब की महफिल में खुद के इज़हार-ओ-ख्यालात का मौका मिलता हो, तो भला कौन है जो इससे महरूम रहना चाहेगा. लेकिन वहीं अगर शायरी का इंतेहाई शौक रखनेवाले किसी शख्स को कोई शे’र, कोई ग़ज़ल या कोई नज़्म ढूंढने में मुश्किल हो रही हो, तो वह इस हद तक तो जायेगा ही कि उसका शौक मुकम्मल हो जाये. अपने इसी शौक को पूरा करने के लिए संजीव सराफ ने  www.rekhta.org  वेबसाइट की नींव रखी, ताकि उनके जैसा शायरी का इंतेहाई शौक रखनेवाला दुनिया का कोई भी शख्स एक अदद शे’र से महरूम न रह सके. मौजूदा वक्त में यह वेबसाइट पूरी दुनिया में सर्च की जा रही है और दुनिया भर में फैले उर्दूदां लोग इससे अपने शे’र पढ़ने के शौक को पूरा कर रहे हैं. 
         ‘रेख़्ता : बाब-ए-सुखन’ पर उर्दू के एक हजार मकबूल शायरों (ग़ालिब से लेकर अब तक) की तकरीबन दस हजार गजलें मौजूद हैं. महज दो लोगों से शुरू हुई इस वेबसाइट की खूबसूरती को बढ़ाते रहने के लिए आज 35 से ज्यादा लोग इसके नोएडा दफ्तर में काम कर रहे हैं. संजीव सराफ बताते हैं कि इस वेबसाइट से उन्हें कोई आमदनी नहीं हो रही है, फिर भी वे इसके लिए खर्च करने से जरा भी नहीं हिचकते. कारोबारी संजीव सराफ पॉलीप्लेक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड नाम की कंपनी के मालिक हैं, जो पीइटी फिल्में बनानेवाली दुनिया की बड़ी कंपनियों में शुमार की जाती है. यह एक गैर-उर्दू तरबियत से वास्ता रखनेवाले सराफ की उर्दू शायरी से बेपनाह मुहब्बत ही है, जिसने उन्हें ऐसी वेबसाइट खड़ी करने के लिए मजबूर कर दिया. 

रेख़्ता की खासियत
जनवरी, 2013 में शुरू हुई इस वेबसाइट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह उर्दू शायरी का सबसे बड़ा आनलाइन खजाना है. संजीव का मकसद रेख्ता के जरिये लोगों तक सिर्फ उर्दू शायरी पहुंचाना ही नहीं है, बल्कि देवनागरी, उर्दू और अंगरेजी, तीनों ज़बानों में उर्दू शायरी को मकबूलियत बख्शना है, जिससे गैर-उर्दूदां लोग भी बड़ी आसानी से उर्दू ज़बान की शहद जैसी तासीर को समझ सकें. 
          कहते हैं कि उर्दू मुहब्बत की जबान है. यकीनन इस बात का सबसे ज्यादा ख्याल रखा है संजीव ने. यही नहीं, इस पर मौजूद अशआरों, ग़ज़लों, नज़्मों की पुख़्तगी का खासा ख्याल रखा गया है, जो संजीव की उर्दू से रूहानी लगाव की तस्दीक करता है. कहते हैं कि नुक्ते के हेर-फेर से खुदा जुदा हो जाता है. नुक्ता यानी बिंदी, लेकिन संजीव ने नुक्ते का हेर-फेर नहीं होने दिया है, ताकि खुदा जुदा न हो सके. काबिल-ए-गौर है कि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होते हुए भी वहां उर्दू शायरी को लेकर इतनी बड़ी वेबसाइट मौजूद नहीं है. 


वेबसाइट की पहुंच
किसी भी तहजीब में उसकी ज़बान का हम किरदार होता है. ठीक वैसे ही हिंदुस्तानी तहजीब में उर्दू जबान का है. मौजूदा वक्त में रेख्ता पर शायरी का लुत्फ उठानेवालों में दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा मुल्कों के लोग शामिल हैं, यह सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है. इस वेबसाइट की शुरुआत से लेकर अब तक दुनिया के तकरीबन तीन लाख लोग इसे देख चुके हैं. रेख्ता की इस पहुंच को बरकरार रखने के लिए इसमें नयी तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है. नयी तकनीक के तहत डेस्कटॉप-लैपटॉप से लेकर मोबाइल-टैबलेट तक इसकी मौजूदगी दर्ज कराने की जी-तोड़ कोशिश जारी है. 

सोशल मीडिया पर रेख्ता
मौजूदा वक्त में जिस तरह से सोशल मीडिया अपने शबाब पर है, ठीक उसी तरह इस पर गलत-सही चीजों की बाढ़ भी है. देखने में आता है कि अक्सर लोग सोशल साइटों पर कोई शे’र पोस्ट करते हुए यह ख्याल नहीं रखते हैं कि किस हर्फ पर नुक्ता होना चाहिए. लोगों की इस गलती को भी रेख्ता ने सुधारा है और कई लोग तो अपने दोस्त के गलत शे’र पोस्ट करने पर कमेंट में रेख्ता का वेब पता लिख कर मशवरा तक देते हैं कि पहले शे’र को सही-सही लिखना सीख लो. 

रेख़्ता की इ-लाइब्रेरी
इस सेक्शन में उर्दू की ऐसी पुरानी किताबों को जगह मिली है, जिनकी दुनिया में सिर्फ कुछ प्रतियां ही मौजूद हैं. आनलाइन आर्काइव में जाकर पुरानी जर्जर हो चुकी किताबों की स्कैन प्रति को देख कर जेहन खुद-ब-खुद उर्दू के गोल्डेन पीरियड में चला जाता है. मौजूदा वक्त में रेख़्ता की इ-लाइब्रेरी में उर्दू शायरी की एक हजार से ज्यादा पुरानी किताबें दर्ज हैं. 

नये फनकारों के लिए प्लेटफॉर्म
रेख़्ता के आफिस में एक स्टूडियो भी है, जहां नये फनकारों की गजलों को उनकी आवाज़ में रिकॉर्ड कर अपलोड किया जाता है. इसके अलावा बहुत से पुराने शायरों का कलाम पढ़ते हुए आडियो-वीडियो भी मौजूद है, जिसे सही-सही तलफ्फुज यानी उच्चारण के साथ देख-सुन कर सुहाने दौर की सच्ची शायरी का एहसास होने लगता है. नौजवान शायरों-फनकारों के लिए यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म मुहैया करता है, जिसके जरिये वे दुनिया भर में अपनी शायराना पहचान बना सकते हैं. जाहिर है, इतनी सारी खूबियों वाली इस वेबसाइट की पहुंच और पहचान तो बढ़नी ही है. अगर आपको भी शायरी का शौक है, तो पर अपनी शिरकत फरमाइए...

Office of Rekhta in Noida

Tuesday, November 5, 2013

चार दिनों का प्यार ओ रब्बा, बड़ी लंबी जुदाई...


Reshma Ji
अपनी मखमली आवाज के लिए पूरी दुनिया में मशहूर पाकिस्तानी गायिका रेशमा अब हमारे बीच नहीं रहीं रेशमा राजस्थान के चुरू के लोहा गांव में 1947 में पैदा हुईं थीं, लेकिन उनका गायन कभी सरहदों का मोहताज नहीं रहा। रेशमा ने बॉलीवुड में जब ‘लंबी जुदाई’ गाना गाया तो यह गाना लोगों की जुबान पर चढ़ गया। संगीत के कद्रदानों के लिए इस साल यह दूसरा झटका है पहले शहंशाह-गजल मेहंदी हसन विदा हुए और अब रेशमा ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। जब रेशमा जी गाती थीं तो थार मरुस्थल का ज़र्रा-ज़र्रा कुंदन सा चमकने लगता था। पाकिस्तान के लाहौर में 3 नवंबर, 2013 को उनकी वफात पर अफसोस जाहिर करते हुए प्रभात खबर के लिए मशहूर शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल ने मुझसे बात की। 

Shubha Mudgal

बड़ी लंबी जुदाई दे गयीं रेशमा जी  

    सबसे पहले तो रेशमा जी को दिल से खिराज-ए-अकीदत! रेशमा जी का इस दुनिया से विदा लेना सिर्फ हम कलाकारों के लिए ही तकलीफदेह नहीं है, बल्कि सरहदों से बंटे मुल्कों में हर उस शख्स के लिए तकलीफदेह है, जो अलगाव के दर्द को समझते हैं और इस दर्द को कम करने के लिए रेशमा जी के नग्मों को गुनगुनाते हैं हम जैसे क्लासिकल और सूफियाना संगीत के आलम में खुद को डुबो देनेवालों के लिए तो यह बहुत ही अफसोस की बात है कि अब वह रेशमी आवाज फिर से कोई नग्मा नहीं छेड़ेगी उन्होंने यह साबित किया था कि फनकार किसी मुल्क का नहीं होता, बल्कि वह पूरी कायनात का होता है कलाकारों के लिए कोई सरहद नहीं हुआ करती और रेशमा जैसी सरबलंद आवाज की गायिका के लिए तो और भी नहीं
       इस दुनिया में जितने भी कलाकार-फनकार हैं, उनका अपना एक खास लहजा और अंदाज होता है, जिससे उनकी पहचान बनती है हालांकि यह कोई जरूरी नहीं कि सभी का अंदाज इतना पुरअसर हो कि दुनियाभर के लोगों के दिलों में घर कर जाये लेकिन रेशमा जी की आवाज में वह तासीर थी, वह कशिश थी, एक खनक थी, जिसकी बदौलत वे सुनने वाले हर खास-ओ-आम के दिल में सीधे उतर जाती थीं सबसे बड़ी खासियत यह है कि उनकी आवाज में कोई बनावटीपन नहीं था लफ्जों की अदायगी का एक खालिस फोक (गंवई) अंदाज था. जब भी उनका नग्मा, ‘लंबी जुदाई...’ कहीं बजता है, तो उसे सुनते हुए सचमुच हमारे दिल के गोशे तक किसी से गहरे जुदाई का, महबूब से बिछड़ने का, रुसवा होने का, किसी अपने से बहुत दूर चले जाने का एक दर्द भरा एहसास होने लगता है ऐसा इसलिए, क्योंकि उनके गले में एक रूहानी तासीर थी, जिसे कहीं से सीखा या बनाया नहीं जा सकता 
       रेशमा जी की फनकारी ईश्वर की अमानत है, गुरुओं की दुआएं हैं कोई शख्स किसी चीज को सीखने के लिए लाख कोशिश कर ले, लेकिन जब तक उसके अंदर वह ‘गॉड गिफ्टेड’ चीज न हो, तो उसकी सारी कोशिश बेकार हो सकती है उनका गाया नग्मा ‘अंखियां नू रहने दे अंखियों दे कोल कोल...’ को आप सुनिए, ऐसा लगता है कि कितनी निडर और अपनी ओर बरबस ही खींच लेने वाली आवाज नजर आती है रेशमा जी की आवाज की वह तासीर ही थी, जिसके लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने उनको ‘सितारा-ए-इम्तियाज’ और ‘लेजेंड्स आफ पाकिस्तान’ के लकब से नवाजा सचमुच एक लंबी जुदाई दे गयी हैं रेशमा जी ऊपर वाला उनकी रूह को बेशुमार इज्जत से नवाजे

Wednesday, July 24, 2013

दि मेकिंग आफ दि इंडियन नेशन

रेजिस्टिंग कोलोनियलिज्म एंड कम्यूनल पालीटिक्स: 
मौलाना आजाद एंड दि मेकिंग आफ दि इंडियन नेशन 
रिजवान कैसर 


           भारत रत्न, स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षामंत्री, एक महान कवि, लेखक, पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम भारत की उन चुनिंदा शख्सियतों में शुमार किया जाता है जिन्होंने 20वीं शताब्दी की कमजोरियों को पहचान कर उसकी बुनियाद पर 21वीं शताब्दी की संभावनात्मक ताकतों की इमारत खडी करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। मौलाना आजाद भारतीय कलाओं में छुपी इंसानियत और पश्चिमी सभ्यता के बुद्धिवाद का बेहतरीन संयोजन करते हुए आधुनिक, उदार एवं सार्वभौमिक शिक्षा के जरिये एक ऐसे प्रबुद्ध और सभ्य समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसके धर्मनिरपेक्ष ढांचे में सांप्रदायिक सौहार्द के मजबूत स्तंभ लगे हों।
          मौलाना आजाद की जिंदगी को एक किताब की शक्ल देना कोई आसान काम नहीं है, क्यूंकि भारत के निर्माण में मौलाना आजाद से जुडे बहुत से ऐसे राजनीतिक पहलू हैं, जिन पर इतिहास और इतिहासकार दोनों आज भी मौन हैं। साक्ष्यों का अभाव और कुछ पूर्वाग्रहों के चलते हम उनकी राजनीतिक जिंदगी को सही-सही जानने-समझने में नाकाम रहे हैं। इसकी दो वजहें बहुत ही अहम हैं। एक तो यह कि मक्का में पैदा होने के कारण मौलाना आजाद उर्दू नहीं जानते थे, जिससे उनके ख्यालात पूरी तरह से इतिहास के आईने में उतर नहीं पाये। राजनीतिक गतिविधियों को वे अंग्रेजी में करते थे और उस वक्त के लोगों में अंग्रेजी को लेकर इतनी जागरुकता नहीं थी। मगर साक्ष्यरहित इतिहास के उन्हीं धुंधले पन्नों से, मौलाना आजाद के बारे में उस वक्त छपे रिसालों और अखबारों के पीले पड चुके कतरनों से जामिया मिल्लिया इसलामिया के प्रोफेसर रिजवान कैसर ने उन हकीकतों को और सच्चाइयों को खोज निकाला है। इस किताब को पढकर मौलाना आजाद की जिंदगी से हम रूबरू तो होते ही हैं, साथ ही भारत निर्माण के इतिहास को बहुत करीब से देखने और समझने का एक बेहतरीन मौका भी पाते हैं।
         कमजोरी या पूर्वाग्रह चाहे जिस चीज की हो नुकसान पहुंचाती है। इन्हीं दो चीजों ने भारत की राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक राजनीति के बीच मौलाना आजाद की उपलब्धियों को अभी तक दबाये रखा है। लेकिन प्रोफ़ेसर रिजवान कैसर ने मौलाना आजाद की भाषाई कमजोरी और हिंदुस्तान के राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों के मौलाना आजाद के प्रति पूर्वाग्रह को न सिर्फ सामने लाया है, बल्कि भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के वक्त मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी को चिन्हित करते हुए मौलाना आजाद की कारगुजारियों के आईने में मौजूदा वक्त की मुस्लिम राष्ट्रवाद की ऐसी हकीकत भरी तस्वीर पेश की है, जिसे देखने और जानने के बाद हम मौलाना अजाद पर लगने वाले सांप्रदायिक राजनीति करने के आरोप को सिरे से खारिज कर देते हैं। इस किताब ने यह बताने की पुरअसर कोशिश की है कि मौलाना आजाद ने किसी मुस्लिम राजनीति या सांप्रदायिक राजनीति की वकालत बिल्कुल नहीं की थी, बल्कि उन्होंने तो मुसमानों में राष्ट्रवाद की भावना को इस कदर प्रबल बनाया था, जो आज भी हमारे लिए किसी मिसाल से कम नहीं। भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद की जिंदगी और कारगुजारियों को सांप्रदायिक चश्में से देखने वालों को यह किताब एक बार जरूर पढ़नी चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि यह आजाद की जिंदगी को बयान करती है, बल्कि इसलिए कि इस किताब की बदौलत हम इतिहास की उन सच्ची घटनाओं को जान सकेंगे, जिसे सांप्रदायिकता का अमली जामा पहनाकर हमारे सामने पेश किया जाता रहा है।

Thursday, July 18, 2013

अमानुल्लाह कुरैशी उर्फ अमान फैजाबादी की एक गजल


 रोजा बगैर लीडर! 
Amaan Faizabadi

  

रोजा बगैर लीडर अफ्तार कर रहे हैं। 
अफ्तार की नुमाइश जरदार कर रहे हैं। 

मुफलिस घरों से अपने आला मिनिस्टरों का 

खुशआमदीद कहकर दीदार कर रहे हैं।

कमजर्फियों से होती महफिल की सारी जीनत

रोजा नमाज घर में खुद्दार कर रहे हैं।
  
नाम व नमूद शोहरत मिलती है महफिलों से
उम्मीद आखिरत की बेकार कर रहे हैं।

महफिल का हुस्न कोई कैसे खराब कर ले

बेवा यतीम शिकवा बेकार कर रहे हैं। 

Wednesday, June 26, 2013

समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन का इंटरव्यू

Shiv Viswanathan

देश की जो मौजूदा हालत है, उसे देखते हुए कुछ लोगों का कहना है कि हम एक अघोषित आपातकाल के दौर से होकर गुजर रहे हैं। क्या ऐसा सचमुच है, इसी मसले पर मैंने प्रभात खबर के लिए बात की देश के मशहूर समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन से। पेश है बातचीत का मुख्य अंश...



बेशक! ऐसा माना जा सकता है कि आज हम जिस हिंदुस्तान में रह रहे हैं, वह अपनी छवि से अब तक कि सबसे भ्रष्ट लोकतंत्र होने की कगार पर खड़ा है, लेकिन ऐसा नहीं माना जा सकता कि इस हिंदुस्तान को किसी भी तरह से किसी आपातकाल की जरूरत है, जैसा 1975 में हुआ था। अगर हम आज के अराजक माहौल को देख रहे हैं और आपातकाल जैसे हालात की संभावनात्मक बातें कर रहे हैं तो हमें इसकी भी चर्चा करनी चाहिए कि वास्तव में उस दौर में आपातकाल से हमें किन-किन चीजों का नुकसान उठाना पडा था। आपातकाल के तकरीबन वह डेढ महीने भारत के आधुनिक इतिहास के नजरिये से न सिर्फ काले दिनों के रूप में दर्ज है, बल्कि हमारे लिए और किसी भी बडे लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए एक सबक भी है। जाहिर है, किसी हादसे से मिली सबक से हम सीख लेना बेहतर समझते हैं, बजाय इसके कि उस सबक को ही दोहराया जाये।
वैसे तो आपातकाल खामियों से भरा हुआ है। लेकिन इसकी सबसे बडी खामी की बात की जाये तो यह कि इसने तमाम संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया था। एक नजर से देखें तो संजय गांधी ने लोकतंत्र की सभी आधारस्तंभ संस्थाओं पर ऐसा कुठाराघात किया, जिससे कि लोकतंत्र की सारी मर्यादाएं शर्मसार हो गयी थी। प्लानिंग को उसने व्यक्तिगत बना दिया था, मानो लोकतंत्र न हो, कोई राजतंत्र हो। हालांकि राजतंत्र भी जनता के अधिकारों का ख्याल करता है। किसी भी लोकतंत्र में उसकी संवैधानिक संस्थाओं का आधारस्तंभ के रूप में बने रहना निहायत ही जरूरी होता है। इस नजरिये से देखें तो आज के हालात को जब हम आपातकाल की संज्ञा देने की अर्थहीन कोशिश करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि अभी भी इसी अव्यवस्था में कई संवैधानिक संस्थाएं मौजूदा सरकार से पूरी शिद्दत से लड रही हैं। 
आपातकाल को मैं ‘फाल्स नोशन आफ गवर्नेंस’ की संज्ञा देता हूं। यह वो स्थिति है, जो अराजकता को जन्म देती है, हिंसा को जन्म देती है, आपराधिक प्रवृत्तियों को जन्म देती है, लोगों में विक्षोभ को जन्म देती है, कुप्रबंधन और अव्यवस्था को जन्म देती है, अराजकता को बढावा देती है और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन लेती है। ऐसा लगता है कि लोकतंत्र एक पिंजरे में बंद हो गया है और वहीं से देश को किसी आटोक्रेटिक फेनोमेना में जकडे हुए बेबसी से देख रहा है। गवर्नेंस को लोकतांत्रिक होना चाहिए, न कि टेक्नोक्रेटिक या आटोक्रेटिक। गवर्नेंस तभी लोकतांत्रिक रह सकता है, जब उसकी सभी संवैधानिक संस्थाएं ईमानदारी से अपना काम करें। सरकार की एनार्की का मुकाबला करें और जनता के अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा ख्याल रखें। 
लोगों में अगर ऐसी अवधारणा पल रही है कि इस देश की स्थिति आपातकाल जैसी हो गयी है, तो उन्हें अब यह सोचना शुरू कर देना चाहिए कि अब इस देश में गवर्नेंस की एक नयी अवधारणा की दरकार है। यह नयी अवधारणा दिल्ली से तो नहीं पैदा हो सकती, क्योंकि मौजूदा हालात में व्यवस्था का जो केंद्रीयकरण हुआ है, उसके लिए यह दिल्ली ही जिम्मेदार है। अब चीजों का विकेंद्रीकरण जरूरी हो गया है, तभी इस नयी अवधारणा को बल मिलेगा। अब दिल्ली से काम चलाना मुश्किल है। ऐसा लग रहा है कि देश साउथ ब्लाक से गवर्न हो रहा है। ऐसे में राज्यों और लोकजन के अधिकारों का हनन तो होगा ही। यह अधिकारों का हनन ही है जो आपातकाल जैसी अवस्था को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। जनअधिकारों को लेकर लोगों में खीज और गुस्सा बढ रहा है। यमुना की सफाई भी इन्हीं अधिकारों में से एक है। अगर देश में विकेंद्रीकरण हो तो यमुना जैसी तमाम नदियों को साफ और स्वच्छ रखना आसान हो जायेगा। दिल्ली यह काम नहीं कर सकती, वह सिर्फ लोकतंत्र और गुड गवर्नेंस की दुहाई देते हुए जनता के सभी बुनियादी मसलों पर राजनीति कर सकती है। देश के हर चीज का विकेंद्रीकरण होना जरूरी, तभी देश के आखिरी सिरे पर बैठे लोगों तक उनके मूलभूत अधिकार पहुंच पायेंगे। फिर कोई आपातकाल की बात नहीं करेगा।
हर अच्छे बुरे दौर को हमें सिर्फ याद करने की या उसको सही गलत ठहराने की बात नहीं करनी चाहिए। हमें चाहिए कि उससे सबक सीखें और प्रयासरत रहें कि लोकाधिकारों का हनन न हो। जब जब लोकाधिकारों का हनन होगा, जय प्रकाश नारायण जैसे लोकनायकों का जनम होगा और क्रांति होगी जो संपूर्ण क्रांति की मांग करेगी। आज संपूर्ण क्रांति की बात भले ही न हो, लेकिन गुड गवर्नेंस की एक नयी अवधारणा का विकसित होना बहुत जरूरी है।

Sunday, March 31, 2013

तीसरा आदमी कौन है

एक आदमी खुद को 

सर्वोच्च ज्ञानी मानता है
कभी किसी से नहीं मिलता
वह कविता करता है
अपनी कविता में 
बात करता है जनसरोकारों की 
बजाता है क्रांति का बिगुल

एक दूसरा आदमी है
जो सबको साथ लेकर चलता है
उच्चता का घमंड नहीं करता
बातें करने के बजाय
निभाता है जन के प्रति सरोकारों को 
लेकिन हां
वह कविता नहीं लिखता

एक तीसरा आदमी भी है
जो न कविता लिखता है
और न ही किसी
जनसरोकार की बात करता है
वह कविता और जनसरोकार दोनों से 
जैसे चाहता है, खेलता है

जनता पूछ रही है
यह तीसरा आदमी कौन है
देश का मीडिया मौन है

Monday, March 11, 2013

कहानी की खुश्बू को किशोर चौधरी ने याद दिलायी




कहानी की जमीन सतही नहीं होती, खुरदुरी होती है, जहां पहले से मौजूद शिल्प और कथ्य रूपी घास-फूस, झाड़-झंखाड़ को उखाड़ कर एक नये उपजाउ शिल्प की जमीन तैयार की जाती है। इस जमीन से ही यथार्थ के पौधे निकलते हैं और सृजनशीलता को एक नया आयाम देते हैं। कुछ ऐसी ही कोशिश की है राजस्थान के बाड़मेर स्थित आकाशवाणी में उद्घोशक किशोर चौधरी ने। कुल 14 कहानियों के इस संकलन में किशोर ने अलग-अलग कई ऐसे बिंबों को स्थापित किया है जिससे वे किसी श्रेणी के रचनाकार तो बिल्कुल नहीं, लेकिन अपनी अलहदा श्रेणी के रचनाकार बन जाते हैं। आध्यात्मवेत्ता स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘हम कोई नया ज्ञान नहीं उत्पन्न करते, बल्कि ज्ञान तो हर जगह है, हम सिर्फ उसे तलाश करते हैं।’ कुछ ऐसा ही कहानी-खुश्बू बारिश की नहीं... में किशोर कहते हैं- ‘अरे पगली! ये मिट्टी की खुश्बू है, बारिश ने तो सिर्फ याद दिलाई है।’ इसी तरह कहानी की खुश्बू को किशोर चौधरी ने याद दिलायी है। सचमुच खुश्बू तो हमारे जीवन में भी है, जिसे हम किसी फूल से तलाश लेते हैं या फिर रिश्तों की गहराई से।
हिंदी किताबों के लिए बेस्ट सेलर जैसा कोई कांसेप्ट नहीं है। किसी किताब को हाथोंहाथ लिये जाने और महीने दो महीने में पहले संस्करण की सारी प्रतियों के बिक जाने के बाद दूसरे संस्करण की तैयारी के मद्देनजर अंग्रेजी से उधार लेकर ही सही अब इस शब्दावली का प्रयोग होने लगा है। होना भी चाहिए। पिछले साल अक्टूबर में हिंद युग्म प्रकाशन से छपे किशोर चैधरी के कहानी संग्रह ‘चौराहे पर सीढि़यां’ को पाठकों ने अपने हाथों और पठनीयता के जरिये बुकसेल्फ में सजाकर दिसंबर की शुरूआत में महज दो महीने में ही हिंदी का बेस्ट सेलर बना दिया। 
जरा गौर करें तो आज किताबों से दूर भागने और इलेक्ट्रानिक माध्यमों के दौर की इस पीढ़ी में कहानी पढ़ने का साहस पैदा करना और उन्हें साहित्य की ओर खींचना कितना मुश्किल काम है। लेकिन यह भी गौर करने वाली बात है कि यह काम किसी ऐसे रचनाकार ने नहीं की है, जो मुख्यधारा के साहित्य सृजनशीलता से जुड़ा हुआ हो। दरअसल, किशोर चैधरी मौजूदा साहित्यकारों, रचनाकारों की तरह छपास रोग से बहुत दूर हैं। वे अंतर्जालीय रचनाकार हैं। वे एक ब्लागर हैं और जब भी जो कुछ भी लिखते हैं, उसे अपने ब्लाग ‘हथकढ़’ पर दे मारते हैं। नेटीजनों के बीच में उनकी रचनाएं पहुंचती हैं और सराही जाती हैं। यही वजह है कि हिंद युग्म प्रकाशन किशोर की रचनाओं को किताब की शक्ल में लाने के लिए विवश हो गया, जिसका आज दूसरा संस्करण भी सबके सामने है। वेब बुक स्टोर फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम पर इसकी बिक्री आज भी जारी है और लोग प्रीबुकिंग के जरिये इसे मंगा रहे हैं। किताबों के आनलाइन होने का एक फायदा यह है कि हिंदी के लोग जो कहीं किसी दूसरी भाषा में रहते हैं, दूसरे मुल्क में रहते हैं, उन तक ये आसानी से पहुंच बना लेती हैं।
किशोर चौधरी की कहानियों की दुनिया साहित्यिक यथार्थ की नहीं, बल्कि मानवीय यथार्थ की दुनिया है। साहित्यिक यथार्थ कहीं न कहीं किताबों की ओर ले जाती है, लेकिन मानवीय यथार्थ किताबों से दूर हकीकत की ओर ले जाती है। इसकी बानगी वहां से मिलती है जब इस संग्रह के शीर्शक वाली कहानी-चैराहे पर सीढि़यां में वे कहते हैं, ‘आदमी को कभी ज्यादा पढ़ना नहीं चाहिए। पढ़ा लिखा आदमी समाज की नींव खोदने के सिवा कोई काम नहीं करता। किताबें उसकी अक्ल निकाल लेती हैं।’ क्या ही सच है कि हमारे समाज में एक से बढ़कर एक पढ़े-लिखे लोग हैं, विद्वान हैं, धर्माचार्य हैं, लेकिन फिर भी आज हमारे समाज का वैचारिक स्तर अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच चुका है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि लोगों ने किताबों को सिर्फ व्यवसाय से जोड़ा, जीवन से नहीं। ऊंचे पदों से जोड़ा, लेकिन इंसानी रिश्तों से नहीं। चैराहे पर सीढि़यां से ही- ‘लोग रिश्तों को सीढ़ी बनाकर चढ़ जाते हैं और फिर वापस लौटना भूल जाते हैं।’ यह आज के दौर का कटु सत्य है और जग जाहिर है लोग इतने स्वार्थी हो चुके हैं कि अपने अहबाबों से भी साथ रहने का मानसिक किराया वसूल करते हैं।
किशोर की कहानियों में जीवन के हर रंग तो मौजूद हैं, लेकिन उन रंगों की लयात्मकता सामान्यता से कुछ अलग नजर आती है। उनके सोचने का नजरिया बिल्कुल अलग है। धर्म और आस्था तर्कों की कसौटी पर कसे गये हैं, लेकिन किशोर इसे नकारते हुए कहानी ‘सड़क जो हाशिए से कम चैड़ी थी’ में कहते हैं- ‘आस्था और तर्क बिना किसी सुलह के विपरीत रास्ते पर चल देते हैं।’ यह विपरीत रास्ता हमारे समाज के खांचों में ही कहीं न कहीं मिल जाता है तो हमारे सोच का फलक कुछ और हो जाता है। कहानी ‘रात की नीम अंधेरी बाहें’ में किशोर का खुद के सोचने के बारे में एक मासूम सा बयान देखिए- ‘मैं दूसरों के बारे में इसलिए सोचता हूं कि खुद के बारे में सोचने से तकलीफ होती है। खुद के बारे में सोचते हुए मैं जीवन दर्शन में फंस जाता हूं। मेरा अज्ञान मुझे डराने लगता है। मैं इस संसार को मिथ्या समझने लगता हूं। जबकि कुछ ही घंटों बाद जीवन को जीने के लिए दफ्तर जाना जरूरी होता है। दफ्तर न जाओ तो ये मिथ्या संसार हमें भूख का आईना दिखाता है। कहता है बाबूजी यही दुनिया सत्य है, यहां मिथ्या कुछ भी नहीं।’ 
जीवन के हर एक रंग को अलग-अलग बिंबों में पेश करने वाले किशोर चैधरी की कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि हम किसी कथ्य या किरदार को नहीं, बल्कि अनायास होती घटनाओं को पढ़ रहे हैं जो हमारे जीवन से ही जुड़ी हुई होती हैं। हालांकि कहीं-कहीं छिटकती भी हैं, लेकिन फिर वापस आकर जुड़ भी जाती हैं। रूढ़ीवादी तत्वों से किशोर ने इनकार नहीं किया, लेकिन लिखते हुए कुछ ऐसा शिल्प गढ़ते हैं कि पाठकों को उन तत्वों से इनकार कर आधुनिकता की ओर जाने के लिए मजबूर कर देते हैं। कहानी ‘एक अरसे से’ में- ‘लोग कहते थे कि बड़ी गलती की, दरवाजे के ठीक सामने दरवाजा बनाया। भाग घर के पार हो जायेगा। सौभाग्य को कैद करने के लिए जरूरी था कि आर-पार दरवाजे न हों।’ बेहद छोटे-छोटे वाक्यों और आम बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल करने वाले किशोर को पढ़ना साहित्य के एक नये आयाम को समझना नहीं है, लेकिन एक वर्तमान साहित्य के बीच एक चुनौती की तरह जरूर देखना है, जिस पर किशोर खरा उतरने के काबिल हैं।

Friday, February 22, 2013

वे नहीं मरे अभी


हर बार की तरह इस बार भी
कुछ इंसान ही मरे हैं
और आगे भी यही मरते रहेंगे

वो नहीं मरे
जिन्हें मरना चाहिए था
वे भी नहीं
Hyderabad Blast
जिन्हें मर जाना चाहिए

सुना है उनके पास
कोई खुदा, कोई ईश्वर है
बड़ा ताकतवर है वो
वही इंसानों को मारने की
नसीहत देता है

उस खुदा या उस ईश्वर को
मैं बिल्कुल नहीं जानता
अच्छा है जो मैं
ऐसे खुदा, ऐसे ईश्वर को
बिल्कुल भी नहीं मानता...

प्रोफेसर रिजवान कैसर और तहसीन मुनव्वर का इंटरव्यू


Tuesday, December 11, 2012

नग्मानिगार इब्राहिम अश्क से एक छोटी सी गुफ्तगू

        रूमानी ज़ुबान के एक स्कूल हैं दिलीप साहब

आज दिलीप साहब की यौम-ए-पैदाइश का मुबारक दिन है। 90 साल के मरहले पर खड़े दिलीप साहब के बेमिसाल वजूद के वैसे तो बहुत सारे पहलू हैं। लेकिन उनमें से कुछ पहलू ऐसे हैं जिनके बारे में ये दुनिया बहुत कम जानती है। उन्हीं में से कुछ के बारे में वसीम अकरम को तफ्सील से बता रहे हैं बालीवुड के मशहूर नग्मानिगार इब्राहिम अश्क...



Ibrahim Ashk
        उर्दू एक शीरीं जबान है। एक ऐसी ज़बान जिसकी तासीर बहुत मीठी होती है। जाहिर है, जब ऐसी जबान किसी शख्सीयत का हिस्सा बनती है, तो वह शख्सीयत महज एक फनकाराना शख्सीयत भर नहीं रहती, बल्कि उसकी जिंदगी का वजूद "कम्प्लिटनेस" का एक पैमाना बन जाता है। इसी पैमाने की तर्जुमानी करते हैं मशहूर अदाकार दिलीप कुमार साहब।
         दिलीप साहब को उर्दू जबान से बेपनाह मुहब्बत है। वे जब किसी महफिल का हिस्सा बनते हैं और अपनी मुबारक जबान से लोगों से मुखातिब होते हैं, तो पूरी महफिल इस शिद्दत-ओ-एहतराम से उनको सुनती है, मानो सुनने में अगर एक भी लफ्ज छूट गया तो उसकी जिंदगी से एक वक्फा कम हो जायेगा। यही वजह है कि एक जमाने में उनके दीवानों में पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, प्रकाश चंद्र शेट्टी जैसी बडी सियासी शख्सीयतें भी शामिल रही हैं।
Dilip Kumar
         दिलीप साहब की इस शख्सीयत को समझने के लिए जरा पीछे जाकर तवारीख के कुछ सफहों पर नजर डालना जरूरी है, कि आखिर इस बेमिसाल वजूद की जड़ें क्या कहती हैं। दरअसल, दिलीप साहब का त'अल्लुक पाकिस्तान के पेशावर से है और उनका नाम मुहम्मद यूसुफ खान है। एक अरसा पहले मुंबई में आ बसे उनके वालिद का फलों का कारोबार था। उनकी परवरिश पूरी तरह से पेशावरी माहौल में हुई थी। दिलीप साहब भी कभी-कभार फलों के कारोबार को संभाला करते थे। लेकिन उनके अंदर एक फनकार उनसे गुफ्तगू करता था। तब के जमाने में मुंबई में कई थिएटर चलते थे, जहां ड्रामों में लोगों की बहुत जरूरत पड़ती थी। एक बहुत मशहूर थिएटर था "पारसी थिएटर", जहां सोहराब मोदी और आगा हश्र कश्मीरी के ड्रामे हुआ करते थे। इन ड्रामों की जबान उर्दू हुआ करती थी। आगे चलकर इन्हीं ड्रामों पर फिल्में बननी शुरू हुईं और यहीं से शुरू हुआ दिलीप साहब की फनकारी का सिलसिला। वैसे तो बतौर हीरो उनकी पहली फिल्म थी "ज्वार भाटा", जो चल नहीं पायी। लेकिन उन्होंने जब फिल्म "शहीद" में सरदार भगत सिंह का किरदार निभाया, तब तक उनके वालिद साहब को यह बात नहीं मालूम थी कि उनका बेटा एक अदाकार बन गया है। शहीद में दिलीप साहब के मरने का सीन देखकर उन्हें बड़ा दुख हुआ। लेकिन जैसे-जैसे दिलीप साहब की मकबूलियत बढ़ी, वालिद की नाराजगी कुछ कम हो गयी।
          तब के ड्रामों में कलाकार पुरजोर आवाज में चीख-चीख कर डायलाग बोला करते थे। क्योंकि दूर बैठे दर्शकों तक आवाज पहुंचाने की जिम्मेदारी होती थी। यही चलन फिल्मों में भी आया, लेकिन जब दिलीप साहब आये तो उन्होंने इस चलन को तोड़ दिया और बहुत नर्म लब-ओ-लहजे में, बहुत धीरे से रूमानी डायलाग बोलने की एक नयी रवायात कायम की, जो आज भी न सिर्फ जिंदा है, बल्कि इस अदायागी को बाकायदा एक मकबूलियत हासिल है। रूमानी ज़बान की यह रवायात एक स्कूल बन गयी, जिससे मुतास्सिर होने वालों में अमिताभ बच्चन, नसीरुद्दीन शाह, संजीव कुमार और इनके बाद की पीढ़ी शामिल है। यह दिलीप साहब की उर्दू ज़बान से मुहब्बत ही थी, जो शीरीं जबान को रूमानी अंदाज में जीने के कायल थे। दिलीप साहब के जमाने में जो फिल्में लिखा करते थे, वे सब उर्दूदां थे और दुनिया की तमाम 'क्लासिक लिटरेचर' यानि आलमी अदब को जानने वाले हुआ करते थे। इसका उन पर बहुत असर हुआ। शुरू में तो नहीं, लेकिन अपनी मकबूलियत के बाद वे स्क्रिप्ट में कई बार तब्दीलियां करवाते थे, जब तक कि उस फिल्म इस्तेमाल उर्दू लफ्ज़ पूरी शिद्दत से उनके दिल में नहीं उतर जाते थे। आज भी बालीवुड यह एहसान मानता है की दिलीप साहब ने ही इंडस्ट्री को डायलाग बोलने की एक उम्दा रवायत दी।
          उर्दू की मेयारी शायरी के मुरीद दिलीप साहब को पढ़ने का बहुत शौक रहा है। खास तौर से ग़ज़लों और नज्मों को वे खूब पढ़ते हैं। उनके लिखने के बारे में तो कोई इल्म नहीं है, लेकिन उनकी जुबान से शे'र को सुनकर ऐसा लगता है कि वह शे'र किसी और का नहीं, बल्कि खुद उन्हीं का लिखा हुआ है। यह बहुत बड़ी फनकारी है कि किसी के अशआर को अपनी जुबां पर लाकर उसे अपना बना लिया जाये। यही नहीं दिलीप साहब को तकरीबन आठ से दस जबानें आती हैं। यह मिसाल ही है कि उन्हें किसी जबान को सीखने के लिए बहुत ज़रा सा ही वक्त लगता है। वे जहां भी जाते हैं, वहां के लोगों से कुछ ही देर की गुफ्तगू में उनकी ही जबान में बात करने लगते हैं। 
          एक वाकया मुझे याद है। मेरी ग़ज़लों के एल्बम, जिसे तलत अज़ीज़ ने गाया था, की लांचिंग के मौके पर वे आये थे। उन्हीं के हाथों से उस एल्बम की लांचिंग थी। जब दिलीप साहब ने माइक हाथ में लिया और कहा- "मेरे मोहतरम, बुजुर्ग व दोस्तों, ख्वातीन-ओ-हजरात, आदाब!" तो सारी महफिल एकदम खामोश हो गयी और ऐसा पुरसुकून मंजर ठहर गया गोया अब उनकी जबान से खूबसूरत लफ्जों की बारिश होने वाली है। उन्होंने जब आगे बोलना शुरू किया, तो उर्दू ग़ज़ल की तवारीख कुछ ऐसे बयान फरमाई, गोया कोई प्रोपेफसर अपनी क्लास में खड़ा लेक्चर दे रहा हो। इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि दिलीप साहब किसी जबान को सिर्फ पढ़ते नहीं थे, बल्कि उसे अपने दिल में उतार लेते थे। एक बार लंदन के रायल अल्बर्ट हाल में लता जी के प्रोग्राम का आगाज करने के लिए उन्हें बुलाया गया था। उस प्रोग्राम की रिकार्डिंग को आज भी  रिवाइंड करके सुना जाता है। उनकी आवाज़ और ज़बान का जादू ही है कि जब वे किसी महफिल या प्रोग्राम की सदारत करते थे, तो उसकी जान बन जाते थे। शायरी को समझना और वक्त की नजाकत को देख उसका बेहतरीन इस्तेमाल करना बहुत बड़ी बात है। यह एक ऐसा फन है, जो शायर न होते हुए भी उनको एक शायर से ज्यादा मकबूल बनाता है। यही वजह है कि दिलीप साहब जब भी कोई शेर पढ़ते हैं, तो वे उस वक्त और मौजू को ताजगी बख्श देते हैं। उनकी जबान से आज तक कहीं भी सस्ती शायरी नहीं सुनी गयी है। वे बेहद दिलकश और पुरअसर अंदाज़ में शेर पढ़ते हैं।
          अरसा पहले जब मैं दिल्ली से निकलने वाली "शमा" मैगजीन में था, उस वक्त मुंबई से उनके खत आते थे। आपको यकीन नहीं होगा कि वे खत किसी कंपनी से बनी कलम से नहीं, बल्कि अपने हाथों से बनायी गयी बरू की लकड़ी की कलम को स्याही में डुबो कर उर्दू में ही लिखते थे। उनकी लिखावट ऐसी होती थी, गोया कैलीग्राफी की गयी हो। यह वही शख्स कर सकता है, जिसे ज़बान से बेपनाह मुहब्बत हो। दिलीप साहब का वजूद तमाम उर्दूदानों के लिए किसी कीमती सरमाये से कम नहीं।

दिलीप कुमार के जन्मदिन पर गीतकार इब्राहिम अश्क का इंटरव्यू


मौलाना मुहम्मद अहमद और शीबा असलम फहमी का इंटरव्यू


असगर अली इंजीनियर का इंटरव्यू


Sunday, July 15, 2012

किसान

पांव में तेज दर्द है
और फटी बिवाई से खून झांक रहा है
पूरा बदन 
थकन के बोझ से दबा हुआ है
घुटने यूं रूठे हैं
कि अब उठने नहीं देंगे
मगर फिर भी 
उठना तो पड़ेगा
सूरज उगाने की
जिम्मेदारी जो ले रखी है मैने...

यह किसी आफिस की मुलाजिमत नहीं
जो दरवाजे पर छुट्टी का बोर्ड लगाकर
झूठी बीमारी के बहाने
घर पर आराम फरमाए,
पानी सरक गया तो तो न जाने 
कितने दिनों के बाद लौटेगा
और ऐसे इंतजारों में
फसलें गुजर जाया करती हैं...

पेट को रोज
दो वक्त की तन्ख्वाह चाहिए
यह किसी महकमे का नौकर नहीं
जो महीनों की तन्ख्वाह न पाकर भी
अपना काम करता रहता है...

मुंह अंधेरे से लेकर
शाम तक के सारे लम्हों से होकर
धीरे-धीरे कई रोज में 
पकता है एक दाना... 

Thursday, June 14, 2012

सूफी गायिका बेग़म आबिदा परवीन से बातचीत का एक टुकड़ा


खिराज-ए-अकीदत - शहंशाह-ए-गजल मेहदी हसन 
18 जुलाई, 1927- 13 जून, 2012
कायनात ने खो दिया सुरों का नूर-ए-मुजस्सम
Mehdi Hasan & Abida Parveen
बेहद अफसोस है कि जनाब मेहदी हसन साहब इस दुनिया से रुखसत हो गये. आज सारा आलम सोगवार सा बैठा उनके जनाजे को ऐसे देख रहा है जैसे वे अभी अपनी गहरी नींद से बेदार होंगे और फरमायेंगे, जरा मेरा हारमोनियम लाना, एक सुर खटक रहा है... मगर काश ऐसा होता. इसी एहसास को शिद्दत से महसूस करते हुए और चश्म-ए-नम से सराबोर हुईं मशहूर-ओ-मआरूफ सूफी गायिका आबिदा परवीन से जब मैंने बात की तो लग्जिशी जुबान में उन्होंने अपने दर्द को कुछ यूं बयान किया...
        शहंशाह-ए-गजल जनाब मेहदी हसन का इस दुनिया से जाना महज एक इंसानी हयात का जाना नहीं है, बल्कि पूरी कायनात से एक ऐसी रूह का जाना है जो मौसिकी के लिए एक नूर-ए-मुजस्सम थे. अल्लाह उनकी रूह को जन्नत में आला से आला मुकाम अता फरमाए. आज पूरी कायनात ने जो खोया है, मैं समझती हूं कि शायद इससे पहले फन की किसी दुनिया ने कोई भी ऐसी नायाब चीज नहीं खोयी होगी. वे इस दुनिया के तमाम गुलोकारों से बहुत अलग थे. गजल व नज्म को गाने के लिए जिस मिजाज की जरूरत होती है, वे उसी मिजाज को शिद्दत से जीते थे. उनकी आवाज को सुनकर ही हमें ये एहसास होने लगता है कि वह गजल यह नज्म अब सिर्फ गजल एक नज्म नहीं रह गयी, बल्कि उसने अपनी रूहानियत को जी लिया. गजलें और नज्में उनकी जुबान पर उतरने के लिए अपने वजूद को पाने के लिए बेकरार रहा करती थीं. 
कम से कम मेरे लिए तो यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि उनके बाद गजल की इस रूहानी विरासत को कोई संभाल पायेगा नहीं, महज जिंदा रखने की रवायत तो दूर की बात है. गजल और मौसिकी को लेकर उनके अंदर जो सलाहियत  थी, जो कैफियत थी, वह दुनियावी  नहीं थी, बल्कि हकीकी थी. गजल के हर एक शे‘र और शे‘र के हर एक लफ्ज को वो अपनी जुबान नहीं, बल्कि अपनी रूह दे देते थे, जिसे सुनने के बाद शायारी और शायर की कैफियत का अंदाजा लगाना आसान हो जाता है. मेहदी साहब की यही वह सबसे मखसूस सलाहियत थी, जिसे महसूस कर मशहूर शायर फैज अहमद फैज ने अपनी गजल-गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले... को उनके नाम करते हुए कहा था, 'इसके मुगन्नी (गायक) भी आप, मौसिकार (संगीतकार) भी आप और इसके शायर भी आप ही हैं.‘
          मुझे उनकी हर मुलाकात का एक-एक रूहानी मंजर बाकायदा ऐसे याद है जैसे कि एक बच्चा अपना सबक याद रखता है. वे जब भी मिलते थे, सिवाय मौसिकी यानि संगीत के किसी और मसले पर बात ही नहीं करते थे. मुख्तलिफ शायरों की सादा-मिजाज गजलों को भी वे अपनी जुबान देकर उसे बाकमाल नग्मगी में तब्दील कर देते थे. ऐसा इसलिए, क्योंकि वे गजलों को गाने से पहले खूब रियाज़ करते थे. दिन-दिन भर हारमोनियम लिए बैठे रहते थे और एक ही गजल को मुख्तलिफ रागों पर कसा करते थे. गजलों के जरिये रूह में उतरने की वो कूवत सिर्फ मेहदी साहब में ही थी. परवीन शाकिर की गजल- कू-ब-कू फैल गयी बात शनासाई की... को गाते हुए वे खुद भी इतने शनास हो जाते थे कि प्रोग्राम पूरी तरह से खुश्बूजदा हो जाता था. रंजिश ही सही... तो उनका माइलस्टोन ही है. मीर की गजल- ये धुआं कहां से उठता है को गाते हुए वे पूरे माहौल को शादमानी के ऐसे आलम में लेकर चले जाते थे, जिसे अब कहीं पर तलाश करना बहुत ही मुश्किल है. गजल सुनने-सुनाने का अब वैसा मंजर शायद ही मिले. जिंदगी के आखिरी वक्त तक अपने सीने में बंटवारे का दर्द समेटे रहे और उफ तक न किया. ऐसा खुदा की सल्तनत का एक नायाब इंसान ही कर सकता है. उनको दिल से जज्बाती खिराज-ए-अकीदत. अल्लाह उनकी रूह को जन्नत बख्शे... आमीन...!

Saturday, April 14, 2012

मौलाना मोहम्मद वली रहमानी का इंटरव्यू


प्रेमचंद की कहानियों में बदलाव


          यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि प्रेमचंद ने अपनी आखिरी कहानी ‘कफन’ मूलतः उर्दू में लिखी थी और हिंदी में इसका अनुवाद प्रकाशित हुआ था। लेकिन अनुवाद के दौरान कफन की कहानी में बदलाव आ गया। दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पाक्षिक पत्रिका ‘जौहर’ के अप्रैल, 2012 अंक के एक लेख में प्रेमचंद की आखिरी कहानी ‘कफन’ के हिंदी रूपांतरण के बारे में कहा गया है कि यह मूल कहानी से कुछ अलग है। आज से तकरीबन आठ साल पहले जामिया में हिंदी के प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्ला ने यह बात सामने लायी थी और अपने लेखों के जरिये कफन के मूल कथानक से छेड़छाड़, शाब्दिक बदलाव और वाक्य विन्यास में बदलाव की बात की थी। अब्दुल बिस्मिल्ला कहते हैं- ‘दरअसल, कई साल पहले जब मुझे इस बात की जानकारी हुई, तो सबसे पहले मैंने जामिया की लाइब्रेरी से वह मूल पांडुलिपि निकलवायी। उसको पढ़ने के बाद मैंने पाया कि मौजूदा वक्त में लगातार छप रही कहानी ‘कफन’ अपनी मूल पांडुलिपि से कुछ अलग है। तब मैंने इसके बारे में और ज्यादा जानकारी इकट्ठा करने के बाद कई लेख लिखे। दोनों में फर्क वाक्य विन्यास और उर्दू शब्दों के हिंदी अर्थ के रूप में है और कहीं-कहीं अनावश्यक शब्दों को भी जोड़ दिया गया है, जिससे उसके भाव में फर्क नजर आता है।’
          गौरतलब है कि प्रेमचंद ने ‘कफन’ कहानी को 1935 में अपने जामिया प्रवास के दौरान जामिया की तात्कालिक पत्रिका ‘रिसाला जामिया’ के लिए लिखा था। रिसाला जामिया-दिसंबर, 1935 में मूल रूप से उर्दू में प्रकाशित कहानी ‘कफन’ हिंदी में पहली बार अप्रैल, 1936 में ‘चांद’ नामक पत्रिका में छपी। तब से लेकर आजतक वही हिंदी वाली कहानी ही छपती चली आ रही है। एक से दूसरी भाषा में अनुदित किताबों के बारे में अक्सर यह बात सामने आती रही है कि अनुदित रचना अपनी मूल रचना से कुछ अलग हो जाती है। लेकिन यह समस्या उर्दू और हिंदी जैसी भाषाओँ के लिए नहीं आनी चाहिए, जो एक दूसरे से बेहद करीब ही नहीं, बल्कि सहोदर मानी जाती हैं। ऐसे में प्रेमचंद की रचनाओं में भाषाई अंतर के साथ-साथ कथानक में अंतर आ जाना मौलिकता की दृष्टि से अखरता है। 
              प्रेमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत में उर्दू में कहानियां लिखीं। बाद में वे हिंदी में लिखने लगे। इसकी वजह आर्थिक थी। खुद उन्होंने 1915 में अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम को पत्र में लिख- ‘अब हिंदी लिखने का मश्क कर रहा हूं। उर्दू में अब गुजर नहीं।’ कायाकल्प से पहले तक के उनके उपन्यासों की मूल पांडुलिपि उर्दू में ही है। बाद में जब उनकी उर्दू की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद हुआ, तो कहीं-कहीं मौलिकता खोती नजर आयी। हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार कहते हैं- ‘अनुवादकों ने अनुवाद करते समय कहीं-कहीं वाक्यों में बदलाव कर दिया है, ताकि पाठक प्रेमचंद को पूरी तरह समझ सके।’ हालांकि, अब्दुल बिस्मिल्ला इस बदलाव को गलत मानते हैं और कहते हैं- ‘अनुवाद के समय सिर्फ लिपि पर ध्यान दिया जाना चाहिए, उसकी कहानी पर नहीं। जैसा कि कहानी ‘पूस की रात’ के साथ हुआ। मौजूदा पूस की रात में कहानी का नायक हल्कू पूस की ठंडी रात में सो जाता है और जानवर उसका सारा खेत चर जाते हैं। जबकि मूल कहानी में वह अपने घर जाता है। वहां उसे निराश देखकर उसकी पत्नी कहती है कि अब तुम खेती-बाडी छोड दो। इस पर हल्कू कहता है कि मैं एक किसान हूं, किसानी नहीं छोड़ सकता। मौजूदा कहानी में हल्कू को इस तरह सोते दिखाने के लिए प्रेमचंद की आलोचना भी हुई। अनुवाद किसने किया यह तो नहीं पता, लेकिन प्रेमचंद अपनी कहानियों का अनुवाद खुद कम और अपने मित्रों से ज्यादा करवाया करते थे। उनके एक खास मित्र थे इकबाल बहादुर वर्मा ‘सहर’ जो उनकी कहानियों का अनुवाद किया करते थे। जो भी हो इन अनुवादों ने प्रेमचंद की कहानियों की आत्मा को वैसा नहीं रहने दिया, जैसी कि वे उर्दू में नजर आती हैं।