Thursday, July 10, 2014

हमारी दिल्ली।

अंधेरे में डूबी हमारी ये दिल्ली।
अच्छे दिनों की है मारी ये दिल्ली।।
शतरंज के काले खानों में बैठे।
सेवेन रेसकोर्स की दुलारी ये दिल्ली।।
Power Cut in Delhi
काले रुपइये पर गंदी सियासत।
है नेताओं की दीनदारी ये दिल्ली।।
ग़ालिब की गलियों की अफ़सुर्दा रातें।
लूटियन इलाकों पे वारी ये दिल्ली।।
कहां शौक के कोई खुशियां समेटे।
बलात्कार की बेक़रारी ये दिल्ली।।
पहले मुहब्बत सिखाती है लेकिन।
है एहसास की कारोबारी ये दिल्ली।।
बेदिल की दिल्ली है, दिल्ली है बेदिल।
ज़ख़्मी तिजारत की प्यारी ये दिल्ली।।


Gali Qasim Jaan, Delhi

Tuesday, May 27, 2014

चम्मचों में बंटे वामपंथ को कड़ाही बनना होगा

Atul Kumar Anjan and Wasim Akram
सोलहवीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के साथ ही कई छोटी पार्टियों की बुरी हार हुई है। वामपंथी पार्टियां भी उनमें शामिल हैं। वाम मोरचे के गिरते हुए जनाधार को देखते हुए ऐसा माना जा रहा है कि वामपंथ अब ​हाशिये पर चला जायेगा। वामपंथी आंदोलन भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण धारा है, लेकिन पिछले कुछ समय से वामपंथी पार्टियां चुनावी अखाड़े में लगातार हाशिये पर जा रही हैं और उनके जन-संगठन भी कमजोर होते जा रहे हैं। इस बार के लोकसभा चुनावों में एक ओर जहां दक्षिणपंथी भाजपा व उसके सहयोगी दलों को भारी जीत हासिल हुई है, वहीं वाम मोरचे को गिनती की सीटें मिली हैं। वामपंथी राजनीति के वर्तमान और भविष्य के विभिन्न पहलुओं पर हमने अपने छात्र-जीवन से ही वामपंथी राजनीति में सक्रिय, वर्तमान में कम्यूनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया (सीपीआइ) के राष्ट्रीय सचिव, अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और एक तेज-तर्रार एवं मुखर राजनेता कॉमरेड अतुल कुमार अंजान से प्रभात खबर के लिए बात की...


1-  भाजपा की अप्रत्याशित जीत और कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के साथ इस चुनाव में वामपंथी दलों को भी भारी हार हुई है. गरीब-किसानों की पार्टी कहे जानेवाले वाम के जनाधार कम होने के क्या कारण हैं, जबकि देश में अब भी गरीबों की ही ज्यादा संख्या है?
          हमारी पार्टी गरीब-किसानों की पार्टी है, मजदूर और हाशिये पर पड़े लोगों की पार्टी है, अल्पसंख्यकों की पार्टी है, लेकिन अब सिर्फ गरीब-गरीब कहने से ही काम नहीं चलनेवाला है. अब जरूरत है उनके भावनाओं के साथ जुड़ने की. उनके अंदर जो परिवर्तन हो रहा है, उस परिवर्तन को अगर बारीकी से हम नहीं देखेंगे, और उस आधार पर कोई ठोस रणनीति नहीं बनायेंगे, तो वे सिर्फ हमारे नाम के लिए थोड़े हमें वोट देने जायेंगे. डायनॉमिजम और डायनॉमिक्स दोनों अलग-अलग चीजें हैं. हमारे यहां जो डायनॉमिक्स में बदलाव आ रहा है, उसके लिए एक नये डायनॉमिजम की जरूरत है.

2-  तो किस तरह का होना चाहिए वह डायनॉमिजम?

         मोर कनेक्ट टू मोर प्यूपिल... यानी गरीबों-किसानों के साथ परस्पर जुड़ाव जरूरी है. उनके साथ सहभागिता और उनके मुद्दों पर गहरी विवेचना करने की जरूरत है. वर्षों से चली आ रही पार्टी की रस्म अदायगी को छोड़ कर उनके एहसास में रच-बस जाने का दौर है. और सबसे ज्यादा जरूरी है दीर्घकालिक संघर्ष चलाना.

3-  लेकिन ये सब तो इस चुनाव में होने चाहिए थे. तो आखिर क्यों नहीं किया आपने और आपकी पार्टी ने?

        सब हो रहा था, लेकिन उसका इतना असर नहीं पड़ा. अब क्या कीजियेगा! हम लोग मूर्ख नहीं हैं. हमने पूरे आठ साल से संघर्षरत होकर पॉस्को को रोका हुआ है. ये बात और है कि इस चुनाव में उस संघर्ष का प्रतिफलन नहीं हुआ. क्योंकि संघर्ष एक अलग चीज है और चुनाव एक दूसरी चीज है. यह भी अब एक नयी परिभाषा आ गयी है. चुनाव के लिए संघर्ष आपका एक आधार बन सकता है, लेकिन चुनाव में अब जाति, धर्म और संकीर्णताओं की मूख्य भूमिका होने लगी है. धन की भूमिका तो है. अब इन तीनों से हम कैसे निपटें? इन तीनों का कम्यूनिस्ट पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है. जिस दिन हम इन तीनों के साथ जुड़ जायेंगे, उस दिन हम कम्यूनिस्ट पार्टी नहीं रह जायेंगे.

4-   भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला है. माना जा रहा है कि देश ने ऐसा जनादेश विकास के वायदों पर दिया है. अगर उन वायदों को पूरा करने में कोई कोर-कसर होगी, तो क्या भाजपा की इस प्रचंड विजय के बाद भारत की राजनीति गैरकांग्रेसवाद से अब गैरभाजपावाद की ओर रुख करेगी?

          इस मामले में कुछ चीजें बहुत महत्वपूर्ण है. उनमें से एक है देश में बदलाव की भावना. कांग्रेस कहती है कि उसने अच्छी-अच्छी नीतियां बनायी, लेकिन वह देश को बता नहीं पायी. तो सवाल है कि आपको किसने कहा था कि आप जनता को मत बताइये. आप कनेक्ट नहीं हो पाये, क्योंकि आप कलेक्ट करते रहे. जनता से कनेक्ट होना आपकी प्राथमिकता में थी ही नहीं. आप सिर्फ मलाइदार तबकों और देश के कॉरपोरेट घरानों से कलेक्ट करने में लगे थे. तो जब आप माल कलेक्ट कर रहे थे, तो हम जनता से कनेक्ट कैसे होते? कारण, आपने गैस, डीजल, तेल आदि के दाम बढ़ा दिये. आपने डाई के दाम 260 रुपये से बढ़ाके 1200 रुपये कर दिया, इसका क्या औचित्य है? देश के किसानों को तो कांग्रेस ने अपने खिलाफ कर दिया. चलते-चलते यूरिया के दाम भी 28 सौ रुपये टन कर दिये. एक साल में साढ़े आठ रुपये डीजल के दाम बढ़ाये. अब यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि किसान-मजदूर आपके साथ खड़े होंगे. आप लगातार ऐसे-ऐसे समझौते कर रहे हैं, जिससे विदेशी सामान हमारे बाजारों पर कब्जा करते जा रहे हैं. आज हिंदुस्तान के हर घर में चाइनीज उत्पाद मिलते हैं. अगर आज चीनी टॉर्च न हो तो गांव के लोग ठीक से खाना भी न खा पायें, क्योंकि गांव में बिजली मिलती नहीं और शहरों में भी गायब रहती है. राधा जी को कृष्ण जी पिचकारी से रंग डाल रहे हैं, यह भी चीन से बन के आ गया. मक्का-मदीन के पोस्टर चीन से आने लगे. शिवलिंग भी चीन के ही बिक रहे हैं. दीवाली पर अब कोई मिट्टी का दिया नहीं जलाता, बल्कि 20-30 रुपये में इलेक्ट्रॉनिक दिये की लड़ी मिल जाती है. कांग्रेस ने जो 312 नयी फ्री ट्रेड समझौते किये हैं, जो 2014-15 से लागू होंगे, जिसके तहत विदेशों से कटी-कटाई सब्जियां आयेंगी, फल आयेंगे आदि, तो क्या इससे लोग कनेक्ट हो पायेंगे. पूरा का पूरा देश का लघुउद्योग खत्म हो गया और इस मामले में यानी आर्थिक नीति के मामले में भाजपा-कांग्रेस दोनों एक जैसी ही हैं. इन दोनों में कोई फर्क नहीं है, क्योंकि आज से छह साल पहले आडवानी जी ने कहा था कि भाजपा की आर्थिक नीतियों को कांग्रेस ने चुरा लिया है. आर्थिक मामलों में इन दोनों पार्टियों के प्रेरणास्रोत विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियन डेवलपमेंट बैंक हैं. अमेरिका का मोदी को वीजा देने न देने का नारा दिखावटी है और मोदी भी दिल से भले हिंदुस्तानी हैं, लेकिन मन से अमेरिकी हैं. फिर भी अभी मैं यह नहीं कहूंगा कि देश की राजनीति अब गैरभाजपावाद की ओर रुख करेगी कि नहीं, क्योंकि अभी यह देखना बाकी है. लेकिन, इतना जरूर कहूंगा कि---
उसकी बातों पे न जा कि वो क्या कहता है।
उसके पैरों की तरफ देख वो किधर जाता है।।

5-   नरेंद्र मोदी देश के विकास को आंदोलन का रूप देने की बात कहते हैं. क्या लगता है आपको?

        उनके भाषण बहुत अच्छे होते हैं, जो ठीक ही है, और उनका हाव-भाव भी बहुत ही अच्छा होता है, लेकिन उनका भाषण इल्मी कम और फिल्मी ज्यादा लगता है. क्योंकि अगर इल्मी होता तो तक्षशिला को पटना के तट पर न पहुंचा देते. बहरहाल मैं ज्यादा कुछ न कह कर इतना ही कहूंगा कि अभी उन्हें सरकार चलाना तो शुरू करने दीजिए. आगे देखेंगे कि क्या कहा जा सकता है. लेकिन आजकल ड्रामा बहुत हो रहा है. कहा जा रहा है कि तीस साल के बाद पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला है. आखिर क्यों? ऐसा कहना क्या अटल विहारी बाजपेयी की लिगेसी को किनारे करना नहीं है? आपको यह कहना चाहिए कि यद्यपि हम पूर्ण बहुमत के साथ पहली बार आये हैं, लेकिन इसके पहले हम अटल जी के नेतृत्व में पहले गठबंधन के साथ बहुमत में आ चुके हैं. ऐसा कहना आपकी राजनीतिक ईमानदारी का यथार्थ प्रस्तुतिकरण होता. तीस साल बाद आने की बात कहने का अर्थ है कि आप अपनी आत्मश्लाघा में, खुद को महिमामंडित करने में उन तमाम लोगों की जड़ों को खोद रहे हैं, जिनके सहारे आप चढ़े थे, चाहे केशूभाई पटेल हों या अटल बिहारी वाजपेयी हों.

6-   इस हार के बड़े सबक वामपंथी दलों के लिए क्या हैं. बंगाल में लगातार सिकुड़ता जनाधार जबकि केरल और त्रिपुरा में बरकरार, ऐसा क्यों है?

        यही बहस 2004 में भी चली थी कि वाम मोरचे को लोकसभा में 63 सीट कैसे मिल गयी. जब हम जीत जाते हैं, तो ज्यादा गुदगुदी नहीं होती, लेकिन जब हम हार जाते हैं, तो भारत के वामपंथ विरोधी लोग, ज्यादा सुंदर तरीके से नृत्य पेश करते हैं. कॉरपोरेट घराने के लोग, संघ के लोग, संकीर्ण सांप्रदायिक लोग, साम्राज्यवाद की वकालत करनेवाले उनके अवधूत लंगोटा बांध कर हमको गाली देने के लिए अखाड़े में उतर आते हैं. वही स्थिति अभी फिर होनेवाली है.

7-   ऐसे में वामपंथी राजनीति की अब क्या संभावनाएं हैं. लोग कहते हैं कि यह सिर्फ विचारों की ही पार्टी है और अब यह लंबे समय के लिए हाशिये पर चली जायेगी. आप क्या सोचते हैं?

        लड़ाई होगी, फिर से हम लड़ेंगे. लड़ते रहे हैं और लड़ते रहेंगे. वामपंथ को इतना कमजोर मत समझिए. हम सिर्फ विचारों की ही पार्टी नहीं हैं, बल्कि आचार-विचार दोनों की पार्टी हैं. अगर सिर्फ विचारों की पार्टी होती तो आज भी 12-14 सीटें कैसे मिलतीं और कई जगहों पर हमारा वोट शेयर कैसे बढ़ता? अभी हम केरल में हैं, त्रिपुरा में हैं. जब-जब पूंजीवाद चरम पर पहुंचेगा, वाम मोरचा उभरेगा और लोकतंत्र की सच्ची लड़ाई लड़ेगा. वामपंथ कभी हाशिये पर नहीं जा सकता. वामपंथ को हाशिये पर भेजने की बात करनेवाले आम चेयर पॉलिटिशयन हैं, जो वामपंथ के साथ सिर्फ अपना सरोकार दिखाते हैं और कहते हैं कि- ‘आइ सिम्पैथाइज विथ लेफ्ट, बट...’ इनके लिए अकबर इलाहाबादी का एक शेर है- लीडर को रंज तो बहुत है मगर आराम के साथ। कौम के गम में डिनर लेते हैं वो काम के साथ।। ये ऐसे वामपंथी हैं, जो कमरे के अंदर से बाहर निकलना भी नहीं चाहते, जिनको पड़ोसी भी नहीं जानते कि इनका विचार वामपंथी है कि नहीं. लेकिन भरी सभाओं में इनके चित्कार को सुन कर लगता है कि ये वाम के नये अवतार हैं. वाम को सबसे ज्यादा इन्हीं से खतरा है. वाम को इनसे भी बचना होगा और इनमें से सही तथ्यों को निकालकर संघर्षों में लाठी डंडे खाने के लिए घसीटना होगा, ताकि ये बौद्धिकी समाजवाद से लेकर के प्रायोगिक समाजवाद में आ जायें.

8-   क्या किन्हीं परिस्थितियों में भाजपा-विरोध के आधार पर गैर-भाजपा राजनीतिक दलों के किसी बड़े गंठबंधन की संभावना बन सकती है?

        हमारे लिए कोई भाजपा विरोध नहीं है. हम नेताओं का विरोध नहीं करते. अगर हम ऐसा करते तो राम विलास पासवान को कभी बगल में नहीं बैठने देते. हम नीतियों के आधार पर विरोध करते हैं. कल तक वे कहते थे कि मेरी सबसे बड़ी गलती थी कि मैं एनडीए की सरकार में चला गया, लेकिन आज फिर उसी गोद में दोबारा बैठ गये. रामविलास पासवान वह निर्मल जल हैं, जो हर बरतन में ढल जाते हैं. मैं इसको इसलिए कह रहा हूं कि जब वे राजनीतिक वनवास में थे, तो कम्यूनिस्ट पार्टी की बदौलत ही आप राज्यसभा में आये. यह देखने की जरूरत है कि जो दलित राजनीति कर रहे थे और हाशिये पर पड़े दलितों की चर्चा करते हुए कहते थे कि मनुवाद ने उन्हें बरबाद किया है, वे सभी आज कहां पहुंच गये? सब के सब मनुवाद की पार्टी में पहुंच गये. अब इन्हें मनुवाद नहीं, बल्कि मनुहारवाद दिखायी दे रहा है. इनका बस एक ही नारा है- रीजन इज राइट, फ्यूचर इज ब्राइट. इसलिए इनके लिए कभी वीपी सिंह सही थे, तो आज नरेंद्र मोदी सही हैं. ये सभी आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जनवाद ढूंढ रहे हैं. और इसमें वे सफल भी हो गये हैं, क्योंकि इनका व्यक्तिवाद जो है, वही देश का जनवाद है. इनका विकास ही देश का विकास है. इनकी करोड़ों की हैसियत बढ़ती है, तो दलित समाज की हैसियत बढ़ती है, भले ही दलित हाशिये पर पड़े रहें. रामविलास पासवान जी जब रेल मंत्री थे, तब सभी रेलवे स्टेशन पर से नि:शुल्क पानी की टंकी बंद करा कर और सबके हाथ में 12 रुपये की कॉरपोरेटी बोतल पकड़ा दी. ये दलितवाद के साथ-साथ बहुत बड़े पूंजीवाद के समर्थक हैं.

9-   इस जनादेश के बाद कई क्षेत्रीय पार्टियों का सफाया हो गया. तो क्या इनका अस्तित्व अब खतरे में है? क्योंकि कई नेता कहते रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों को लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहिए, इससे स्थायी सरकार बनाने में बाधा होती है?

        मैं नहीं मानता कि छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व इतना जल्दी खत्म हो जायेगा. क्योंकि छोटी पार्टियां ‘इब्नुल वक्त’ (हवा का रुख पहचाननेवाला) की तरह हैं. एनडीए में शामिल दो दर्जन दल इसकी मिसाल हैं. दूसरी ओर, आज भी प्रतिरोध की शक्तियां अपने वैचारिक प्रतिरोध के आधार पर खड़ी हुई हैं. वे सभी उभरेंगी और जल्द ही उभरेंगी. ज्यों-ज्यों जनता के ऊपर कठिनाइयों का बोझ बढ़ेगा, त्यों-त्यों वे आंदोलन का स्वरूप अख्तियार करेंगी. जब-जब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की चोट बढ़ेगी, जितनी ही महंगाई का दंश झेलना पड़ेगा, जितना ही बेरोजगारी की समस्या का जबरदस्त छलांग उठेगा, और तब देश के अंदर दो तरह की शक्तियों का उदय दिखायी देगा कि- 125 करोड़ के देश में 25 करोड़ एक तरफ और 100 करोड़ एक तरफ होंगे. यानी हाशिये पर पड़े 100 करोड़ लोग और खाये-अघाये 25 करोड़ लोग. इन सब के बीच सच तो यह है कि वामपंथ ही उभार लेगा, जो लोकतंत्र का मोरचा संभालेगा. लेकिन आज और अभी से ही वामपंथ को एक नये तरीके से सोचना होगा कि कैसे वह इस परिस्थिति से निपटे. हमें एक पंच लाइन लेकर चलना होगा कि आजादी के बाद से जितनी भी नीतियां बनीं, सबके जरिये आज तक जनता में सिर्फ दुखों का बंटवारा हुआ, लेकिन अब यह जनता को ठानना होगा कि आइए हम सब संघर्ष करें, ताकि हमारे बीच सुखों का बंटवारा हो सके.

10-   तीसरे मोरचे के बारे में आपकी क्या राय है?

       इस शब्द जैसा कोई तत्व नहीं है. तीसरा मोरचा कोई सांप-बिच्छुओं का मेल नहीं हो सकता. वह तीसरा मोरचा हो ही नहीं सकता, जिसका कोई वैचारिक आधार न हो. बार-बार मुलायम सिंह कहते हैं कि तीसरे मोरचे की सरकार बनेगी. वे ऐसा क्यों कहते हैं, पता नहीं. मायावती ने कहा कि देश को दुखदायी बनाने में कांग्रेस की तरह बसपा को भी जनता ने जिम्मेवार मान लिया है. शुक्र है कि मायावती में यह ईमानदारी बड़ी देर से आयी, लेकिन मुलायम में तो इतनी भी ईमानदारी नहीं. देश मुलायम सिंह से जानना चाहता है कि समाजवाद और मसाजवाद में क्या अंतर है? आप कहते हैं कि कांग्रेस ने देश को बरबाद कर दिया और उसी कांग्रेस के साथ चिपके भी हुए हैं.

11-   समाजवाद और मसाजवाद! जरा इसे विस्तार से बतायेंगे क्या?

         एक बार 1963 में अपने भाषण में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि कुछ लोगों ने कुछ लोगों का मसाज करना शुरू कर दिया है. कुछ नेता अपने चेलों से मसाज करवाने लगे हैं. उन्होंने यह कहा था कि समाजवाद को मसाजवाद में मत बदलो. डॉ लोहिया अपने संबोधन गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में करते थे, लेकिन आज के समाजवादी नेता अपने संबोधन पांच सितारा होटलों में तरे हैं. पांच सितारा होटलों में पांच रुपये की चीज पचास रुपये में मिलती है और वह तो मसाज की एक बेहतरीन जगह है, जहां तमाम बड़े कॉरपोरेटी लोग और राजनीतिक लोग मसाज करते-करवाते हैं.

12-   आपने कहा कि संघर्ष और चुनाव दो अलग-अलग चीजें हैं. कॉरपोरेट के मौजूदा दौर में वाम के संघर्ष का स्वरूप क्या होगा. एक शहर के कॉलोनियों की तरह बंटने की शक्ल में आज मार्क्सवाद का क्या हाल हो गया है?

        मौजूदा दौर में चुनाव आम आदमी का नहीं, बल्कि कॉरपोरेट घरानों का चुनाव है. चुनाव-प्रचार पर, डिजिटल-प्रचार पर, सोशल मीडिया-प्रचार पर यहां तक कि स्टेज बनाने तक पर कॉरपोरेटी दखल है, जिसमें हम पिछड़ गये. हमने इन सब चीजों का इस्तेमाल ही नहीं किया. आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने से हम विरक्त रहे. लेकिन अब यह करना पड़ेगा. अब कनेक्ट होने के लिए घर-घर जाने की जरूरत नहीं, बल्कि नयी तकनीकों का इस्तेमाल करने की जरूरत है. यह विडंबनात्मक तो लगता है, लेकिन फिर भी मैं वामपंथी नेताओं से कहना चाहता हूं कि अब अंधेरे गलियारे में टहलिये मत. ज्ञानचक्षु खोलिए और देखिए कि जमाना किस ओर जा रहा है. सभी वामपंथी धड़ों से पूछना चाहता हूं कि अंधेरे गलियारे में टहलते-टहलते हम सब कहां पहुंच गये? वाम मोरचे के परहेजवाद ने उसे टुकड़ों में बांट दिया है. मार्क्सवाद एक विस्तार दर्शन है, लेकिन हमने इसे कॉलोनियों में नहीं, बल्कि चम्मचों में बांट दिया है.

13-   तो क्या भविष्य में कोई ऐसी सूरत बनेगी, जब सारे वामपंथी दल एक साथ आ जायेंगे या चम्मचों से होते हुए कांटेदार चम्मचों में तब्दील हो जायेंगे?

        मुझे अब समझ में आता है कि अतिसंकीर्णतावाद, घनघोर साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिक उन्माद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी जब मजबूर करेगी, तो चम्मचों में बंटे हुए तमाम वामपंथी दल इकट्ठा होकर एक बड़ी कड़ाही में तब्दील होंगे. चम्मच से इन्हें कांटेदार चम्मच नहीं, बल्कि कड़ाही बनना होगा, तभी आंदोलन का विस्तार होगा और मार्क्स के विस्तृत दर्शन को एक नया स्थान मिलेगा. गरीबों के लिए लड़ाई लड़ी जायेगी और विकल्प की राजनीति के नये रास्ते खुलेंगे. अकेले लड़ने के स्थान पर तमाम लोगों के एक साथ, तमाम धर्मों-वर्गों के लोगों के एक साथ इकट्ठा होकर लड़ाई लड़ने कोशिश होनी चाहिए. क्योंकि मार्क्सवाद का पर्याय परहेजवाद में नहीं है. कल तक 24 कैरेट का सोना खोजते-खोजते अपने हाथ में पीतल लेकर टहलने लगे हैं, यह कैसी हमारी परिणति है और यह कैसा परहेजवाद है?

14-   अन्ना आंदोलन के समय ऐसा माना जा रहा था कि अरविंद केजरीवाल ने वामपंथ के हथियार को छीन लिया है. ऐसा है क्या?

        अन्ना आंदोलन का हस्र भी तो आपको पता होगा ना. जनरल वीके सिंह को पहुंचाकर अन्ना रालेगण पहुंच गये ना. ममता बनर्जी के पास भी गये थे, लेकिन वहां से भी वापस आकर फिर रालेगांव पहुंच गये. अन्ना ने तो जर्म्स कटर का प्रचार किया. अब यह कौन जानता है कि जर्म्स कटर दाद-खाज-खुजली मिटाता है कि नहीं. किसी ने अंदर जाकर देखा थोड़ी. अन्ना को यह बात समझनी चाहिए थी. जहां तक केजरीवाल की बात है, तो उन पर कुछ कहना अभी मुनासिब नहीं है. क्योंकि उनकी पार्टी के एक बड़बोले नेता ने कहा कि हमारी कोई धारा नहीं है- न हम सेंटर हैं, न लेफ्ट हैं और न राइट हैं. यानी वे अभी अंतरिक्ष में घूम रहे हैं.

15-  अब तो नरेंद्र मोदी जी हमारे देश के प्रधानमंत्री बन गये हैं. चुनाव-प्रचार के दौरान अपने भाषणों से उन्होंने जो लहर बनायी, उससे क्या एक नयी राजनीति का सूत्रपात हुआ. क्या कहेंगे आप?


         पहले तो प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें ढेरों बधाइयां. पिछले सात-आठ वर्षों में नरेंद्र मोदी ने एक कला सीखी है, जिसे हम ‘क्लास एलिनिएशन’ (वर्ग उन्मूलन) कहते हैं- यानी अपने वर्ग शत्रुओं का सफाया करना, किनारे करना या हटा देना. 2007 में फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी जी ने इस कला के जरिये अपने विरोधियों को हटाना शुरू कर दिया था. इतनी सुंदर राजनीति कि जिन हाथों में कभी शमसीर थी, वे हाथ दया के लिए भीख मांग रहे थे. अब ऐसे में लहर तो बननी ही थी. मैं कभी नहीं कहता कि भारतीय इतिहास के शास्त्रों में शाम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. और वैसे भी राजनीति में मित्र कम, शत्रु ज्यादा होते हैं, इसलिए शाम-दाम-दंड-भेद अपनाने की जरूरत तो पड़ेगी ही. ऐसी राजनीति के लिए नरेंद्र मोदी जी को दाद तो देनी होगी और उनसे भारतीय राजनीतिक दलों को ऐसी राजनीति भी सीखनी भी होगी. उनके चातुर्य और उनके शब्दों के प्रयोग करने के तरीके पर उनकी प्रशंसा तो बनती है. लेकिन साथ ही यह भी कि निजता की नीचता और नीचता में निजता हमारी भारतीय राजनीति में उनके आने से शुरू होती है. अब आगे देखते हैं कि इस पूरे चुनावी गतिविधियों से उपजी नयी-नयी चीजों के साथ ही नयी सरकार के काम-काज का तरीका क्या होता है. इंतजार कीजिए...

Wasim Akram and Atul Kumar Anjan

Wednesday, April 23, 2014

शौक बड़ी चीज़ है... सच्ची

Sanjiv Saraf
कभी ग़ालिब ने मीर के लिए कहा था, ‘रेख़्ता के तुम ही उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था...’  तब यह मीर की शायरी के लिए कहा गया था, लेकिन आज संजीव सराफ को उनकी उर्दू शायरी से मुहब्बत के लिए कहा जा सकता है कि सचमुच वे ‘रेख़्ता’ के उस्ताद हैं, जिन्होंने उर्दू शायरी का सबसे बड़ा आनलाइन ख़ज़ाना ‘रेख़्ता’ की नींव रखी...प्रभात ख़बर के लिए जब मैंने संजीव सराफ जी से बात की, तो उन्होंने अपने उर्दू शायरी के शौक और जुनून को कुछ इस तरह बयान फरमाया...

मेरी मुहब्बत का नज़राना है रेख़्ता : संजीव सराफ

         मौजूदा दौर इंटरनेट का दौर है. किसी भी हाल में हम इससे अछूते नहीं रह सकते. इसकी मकबूलियत की तस्दीक इस बात से होती है कि आज पूरी दुनिया इंटरनेट पर मौजूद है और हर काम के लिए लोग इंटरनेट का ही सहारा लेते हैं. इत्तेफाकन एक दिन मैं भी अपनी पसंदीदा गज़लें ढूंढ रहा था, लेकिन वे उस सलीके में मौजूद नहीं थीं, जैसा कि उन्हें होना चाहिए. मुझे इस दुश्वारी ने एक मशवरा दिया कि मैं एक ऐसी वेबसाइट शुरू करूं, जो पूरी तरह से देवनागरी लिपि में उर्दू शायरी की प्रमाणिकता का प्रतिमान बन जाये. मेरी इसी कोशिश ने रेख़्ता को जन्म दिया. उर्दू जबान से मेरी मोहब्बत का यह सबसे बड़ा सबूत है कि रेख्ता वेबसाइट तीन सौ साल से लेकर आज तक की शायरी का एक अनमोल ख़ज़ाना बन गयी है. आज अगर किसी फनकार की कोई किताब छपती है, तो वह कुछ लाइब्रेरियों तक ही सीमित होकर रह जाती है. लेकिन अगर कोई गजल रेख्ता पर पहुंचती है, तो वह पूरी दुनिया में मकबूलियत पाती है. यह नये फनकारों के लिए तो है ही, साथ ही मुल्क से बाहर बैठे हमारे अपनों के लिए भी है, जो शायरी से मुहब्बत करते हैं. मेरा मानना है कि किसी भी चीज़ को पाने के लिए जब तक आपके दिल में शिद्दत भरी मुहब्बत पैदा नहीं होगी, तब तक उसे आप हासिल नहीं कर सकते. मेरी मुहब्बत का नजराना आपके सामने है, अगर आपकी मुहब्बत का नज़राना भी हमें मिले, तो इससे बेहतर कोई और बात नहीं होगी.


कैसे हुई रेख़्ता वेबसाइट की शुरुआत
एक बड़े शायर का एक बेहतरीन शे’र है- 
                          उर्दू हमारे मुल्क की वाहिद ज़बान है। 
                       गंगा की जिसमें रूह तो जमुना की जान है।। 
आखिर जिस ज़बान में गंगा और जमुना जैसी पाकीज़ा नदियों की तासीर मिल रही हो और जिसके अशआरों, गजलों, नज्मों को पढ़-सुन कर गंगा-जमुनी तहज़ीब की महफिल में खुद के इज़हार-ओ-ख्यालात का मौका मिलता हो, तो भला कौन है जो इससे महरूम रहना चाहेगा. लेकिन वहीं अगर शायरी का इंतेहाई शौक रखनेवाले किसी शख्स को कोई शे’र, कोई ग़ज़ल या कोई नज़्म ढूंढने में मुश्किल हो रही हो, तो वह इस हद तक तो जायेगा ही कि उसका शौक मुकम्मल हो जाये. अपने इसी शौक को पूरा करने के लिए संजीव सराफ ने  www.rekhta.org  वेबसाइट की नींव रखी, ताकि उनके जैसा शायरी का इंतेहाई शौक रखनेवाला दुनिया का कोई भी शख्स एक अदद शे’र से महरूम न रह सके. मौजूदा वक्त में यह वेबसाइट पूरी दुनिया में सर्च की जा रही है और दुनिया भर में फैले उर्दूदां लोग इससे अपने शे’र पढ़ने के शौक को पूरा कर रहे हैं. 
         ‘रेख़्ता : बाब-ए-सुखन’ पर उर्दू के एक हजार मकबूल शायरों (ग़ालिब से लेकर अब तक) की तकरीबन दस हजार गजलें मौजूद हैं. महज दो लोगों से शुरू हुई इस वेबसाइट की खूबसूरती को बढ़ाते रहने के लिए आज 35 से ज्यादा लोग इसके नोएडा दफ्तर में काम कर रहे हैं. संजीव सराफ बताते हैं कि इस वेबसाइट से उन्हें कोई आमदनी नहीं हो रही है, फिर भी वे इसके लिए खर्च करने से जरा भी नहीं हिचकते. कारोबारी संजीव सराफ पॉलीप्लेक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड नाम की कंपनी के मालिक हैं, जो पीइटी फिल्में बनानेवाली दुनिया की बड़ी कंपनियों में शुमार की जाती है. यह एक गैर-उर्दू तरबियत से वास्ता रखनेवाले सराफ की उर्दू शायरी से बेपनाह मुहब्बत ही है, जिसने उन्हें ऐसी वेबसाइट खड़ी करने के लिए मजबूर कर दिया. 

रेख़्ता की खासियत
जनवरी, 2013 में शुरू हुई इस वेबसाइट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह उर्दू शायरी का सबसे बड़ा आनलाइन खजाना है. संजीव का मकसद रेख्ता के जरिये लोगों तक सिर्फ उर्दू शायरी पहुंचाना ही नहीं है, बल्कि देवनागरी, उर्दू और अंगरेजी, तीनों ज़बानों में उर्दू शायरी को मकबूलियत बख्शना है, जिससे गैर-उर्दूदां लोग भी बड़ी आसानी से उर्दू ज़बान की शहद जैसी तासीर को समझ सकें. 
          कहते हैं कि उर्दू मुहब्बत की जबान है. यकीनन इस बात का सबसे ज्यादा ख्याल रखा है संजीव ने. यही नहीं, इस पर मौजूद अशआरों, ग़ज़लों, नज़्मों की पुख़्तगी का खासा ख्याल रखा गया है, जो संजीव की उर्दू से रूहानी लगाव की तस्दीक करता है. कहते हैं कि नुक्ते के हेर-फेर से खुदा जुदा हो जाता है. नुक्ता यानी बिंदी, लेकिन संजीव ने नुक्ते का हेर-फेर नहीं होने दिया है, ताकि खुदा जुदा न हो सके. काबिल-ए-गौर है कि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होते हुए भी वहां उर्दू शायरी को लेकर इतनी बड़ी वेबसाइट मौजूद नहीं है. 


वेबसाइट की पहुंच
किसी भी तहजीब में उसकी ज़बान का हम किरदार होता है. ठीक वैसे ही हिंदुस्तानी तहजीब में उर्दू जबान का है. मौजूदा वक्त में रेख्ता पर शायरी का लुत्फ उठानेवालों में दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा मुल्कों के लोग शामिल हैं, यह सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है. इस वेबसाइट की शुरुआत से लेकर अब तक दुनिया के तकरीबन तीन लाख लोग इसे देख चुके हैं. रेख्ता की इस पहुंच को बरकरार रखने के लिए इसमें नयी तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है. नयी तकनीक के तहत डेस्कटॉप-लैपटॉप से लेकर मोबाइल-टैबलेट तक इसकी मौजूदगी दर्ज कराने की जी-तोड़ कोशिश जारी है. 

सोशल मीडिया पर रेख्ता
मौजूदा वक्त में जिस तरह से सोशल मीडिया अपने शबाब पर है, ठीक उसी तरह इस पर गलत-सही चीजों की बाढ़ भी है. देखने में आता है कि अक्सर लोग सोशल साइटों पर कोई शे’र पोस्ट करते हुए यह ख्याल नहीं रखते हैं कि किस हर्फ पर नुक्ता होना चाहिए. लोगों की इस गलती को भी रेख्ता ने सुधारा है और कई लोग तो अपने दोस्त के गलत शे’र पोस्ट करने पर कमेंट में रेख्ता का वेब पता लिख कर मशवरा तक देते हैं कि पहले शे’र को सही-सही लिखना सीख लो. 

रेख़्ता की इ-लाइब्रेरी
इस सेक्शन में उर्दू की ऐसी पुरानी किताबों को जगह मिली है, जिनकी दुनिया में सिर्फ कुछ प्रतियां ही मौजूद हैं. आनलाइन आर्काइव में जाकर पुरानी जर्जर हो चुकी किताबों की स्कैन प्रति को देख कर जेहन खुद-ब-खुद उर्दू के गोल्डेन पीरियड में चला जाता है. मौजूदा वक्त में रेख़्ता की इ-लाइब्रेरी में उर्दू शायरी की एक हजार से ज्यादा पुरानी किताबें दर्ज हैं. 

नये फनकारों के लिए प्लेटफॉर्म
रेख़्ता के आफिस में एक स्टूडियो भी है, जहां नये फनकारों की गजलों को उनकी आवाज़ में रिकॉर्ड कर अपलोड किया जाता है. इसके अलावा बहुत से पुराने शायरों का कलाम पढ़ते हुए आडियो-वीडियो भी मौजूद है, जिसे सही-सही तलफ्फुज यानी उच्चारण के साथ देख-सुन कर सुहाने दौर की सच्ची शायरी का एहसास होने लगता है. नौजवान शायरों-फनकारों के लिए यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म मुहैया करता है, जिसके जरिये वे दुनिया भर में अपनी शायराना पहचान बना सकते हैं. जाहिर है, इतनी सारी खूबियों वाली इस वेबसाइट की पहुंच और पहचान तो बढ़नी ही है. अगर आपको भी शायरी का शौक है, तो पर अपनी शिरकत फरमाइए...

Office of Rekhta in Noida

Tuesday, November 5, 2013

चार दिनों का प्यार ओ रब्बा, बड़ी लंबी जुदाई...


Reshma Ji
अपनी मखमली आवाज के लिए पूरी दुनिया में मशहूर पाकिस्तानी गायिका रेशमा अब हमारे बीच नहीं रहीं रेशमा राजस्थान के चुरू के लोहा गांव में 1947 में पैदा हुईं थीं, लेकिन उनका गायन कभी सरहदों का मोहताज नहीं रहा। रेशमा ने बॉलीवुड में जब ‘लंबी जुदाई’ गाना गाया तो यह गाना लोगों की जुबान पर चढ़ गया। संगीत के कद्रदानों के लिए इस साल यह दूसरा झटका है पहले शहंशाह-गजल मेहंदी हसन विदा हुए और अब रेशमा ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। जब रेशमा जी गाती थीं तो थार मरुस्थल का ज़र्रा-ज़र्रा कुंदन सा चमकने लगता था। पाकिस्तान के लाहौर में 3 नवंबर, 2013 को उनकी वफात पर अफसोस जाहिर करते हुए प्रभात खबर के लिए मशहूर शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल ने मुझसे बात की। 

Shubha Mudgal

बड़ी लंबी जुदाई दे गयीं रेशमा जी  

    सबसे पहले तो रेशमा जी को दिल से खिराज-ए-अकीदत! रेशमा जी का इस दुनिया से विदा लेना सिर्फ हम कलाकारों के लिए ही तकलीफदेह नहीं है, बल्कि सरहदों से बंटे मुल्कों में हर उस शख्स के लिए तकलीफदेह है, जो अलगाव के दर्द को समझते हैं और इस दर्द को कम करने के लिए रेशमा जी के नग्मों को गुनगुनाते हैं हम जैसे क्लासिकल और सूफियाना संगीत के आलम में खुद को डुबो देनेवालों के लिए तो यह बहुत ही अफसोस की बात है कि अब वह रेशमी आवाज फिर से कोई नग्मा नहीं छेड़ेगी उन्होंने यह साबित किया था कि फनकार किसी मुल्क का नहीं होता, बल्कि वह पूरी कायनात का होता है कलाकारों के लिए कोई सरहद नहीं हुआ करती और रेशमा जैसी सरबलंद आवाज की गायिका के लिए तो और भी नहीं
       इस दुनिया में जितने भी कलाकार-फनकार हैं, उनका अपना एक खास लहजा और अंदाज होता है, जिससे उनकी पहचान बनती है हालांकि यह कोई जरूरी नहीं कि सभी का अंदाज इतना पुरअसर हो कि दुनियाभर के लोगों के दिलों में घर कर जाये लेकिन रेशमा जी की आवाज में वह तासीर थी, वह कशिश थी, एक खनक थी, जिसकी बदौलत वे सुनने वाले हर खास-ओ-आम के दिल में सीधे उतर जाती थीं सबसे बड़ी खासियत यह है कि उनकी आवाज में कोई बनावटीपन नहीं था लफ्जों की अदायगी का एक खालिस फोक (गंवई) अंदाज था. जब भी उनका नग्मा, ‘लंबी जुदाई...’ कहीं बजता है, तो उसे सुनते हुए सचमुच हमारे दिल के गोशे तक किसी से गहरे जुदाई का, महबूब से बिछड़ने का, रुसवा होने का, किसी अपने से बहुत दूर चले जाने का एक दर्द भरा एहसास होने लगता है ऐसा इसलिए, क्योंकि उनके गले में एक रूहानी तासीर थी, जिसे कहीं से सीखा या बनाया नहीं जा सकता 
       रेशमा जी की फनकारी ईश्वर की अमानत है, गुरुओं की दुआएं हैं कोई शख्स किसी चीज को सीखने के लिए लाख कोशिश कर ले, लेकिन जब तक उसके अंदर वह ‘गॉड गिफ्टेड’ चीज न हो, तो उसकी सारी कोशिश बेकार हो सकती है उनका गाया नग्मा ‘अंखियां नू रहने दे अंखियों दे कोल कोल...’ को आप सुनिए, ऐसा लगता है कि कितनी निडर और अपनी ओर बरबस ही खींच लेने वाली आवाज नजर आती है रेशमा जी की आवाज की वह तासीर ही थी, जिसके लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने उनको ‘सितारा-ए-इम्तियाज’ और ‘लेजेंड्स आफ पाकिस्तान’ के लकब से नवाजा सचमुच एक लंबी जुदाई दे गयी हैं रेशमा जी ऊपर वाला उनकी रूह को बेशुमार इज्जत से नवाजे

Wednesday, July 24, 2013

दि मेकिंग आफ दि इंडियन नेशन

रेजिस्टिंग कोलोनियलिज्म एंड कम्यूनल पालीटिक्स: 
मौलाना आजाद एंड दि मेकिंग आफ दि इंडियन नेशन 
रिजवान कैसर 


           भारत रत्न, स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षामंत्री, एक महान कवि, लेखक, पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम भारत की उन चुनिंदा शख्सियतों में शुमार किया जाता है जिन्होंने 20वीं शताब्दी की कमजोरियों को पहचान कर उसकी बुनियाद पर 21वीं शताब्दी की संभावनात्मक ताकतों की इमारत खडी करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। मौलाना आजाद भारतीय कलाओं में छुपी इंसानियत और पश्चिमी सभ्यता के बुद्धिवाद का बेहतरीन संयोजन करते हुए आधुनिक, उदार एवं सार्वभौमिक शिक्षा के जरिये एक ऐसे प्रबुद्ध और सभ्य समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसके धर्मनिरपेक्ष ढांचे में सांप्रदायिक सौहार्द के मजबूत स्तंभ लगे हों।
          मौलाना आजाद की जिंदगी को एक किताब की शक्ल देना कोई आसान काम नहीं है, क्यूंकि भारत के निर्माण में मौलाना आजाद से जुडे बहुत से ऐसे राजनीतिक पहलू हैं, जिन पर इतिहास और इतिहासकार दोनों आज भी मौन हैं। साक्ष्यों का अभाव और कुछ पूर्वाग्रहों के चलते हम उनकी राजनीतिक जिंदगी को सही-सही जानने-समझने में नाकाम रहे हैं। इसकी दो वजहें बहुत ही अहम हैं। एक तो यह कि मक्का में पैदा होने के कारण मौलाना आजाद उर्दू नहीं जानते थे, जिससे उनके ख्यालात पूरी तरह से इतिहास के आईने में उतर नहीं पाये। राजनीतिक गतिविधियों को वे अंग्रेजी में करते थे और उस वक्त के लोगों में अंग्रेजी को लेकर इतनी जागरुकता नहीं थी। मगर साक्ष्यरहित इतिहास के उन्हीं धुंधले पन्नों से, मौलाना आजाद के बारे में उस वक्त छपे रिसालों और अखबारों के पीले पड चुके कतरनों से जामिया मिल्लिया इसलामिया के प्रोफेसर रिजवान कैसर ने उन हकीकतों को और सच्चाइयों को खोज निकाला है। इस किताब को पढकर मौलाना आजाद की जिंदगी से हम रूबरू तो होते ही हैं, साथ ही भारत निर्माण के इतिहास को बहुत करीब से देखने और समझने का एक बेहतरीन मौका भी पाते हैं।
         कमजोरी या पूर्वाग्रह चाहे जिस चीज की हो नुकसान पहुंचाती है। इन्हीं दो चीजों ने भारत की राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक राजनीति के बीच मौलाना आजाद की उपलब्धियों को अभी तक दबाये रखा है। लेकिन प्रोफ़ेसर रिजवान कैसर ने मौलाना आजाद की भाषाई कमजोरी और हिंदुस्तान के राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों के मौलाना आजाद के प्रति पूर्वाग्रह को न सिर्फ सामने लाया है, बल्कि भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के वक्त मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी को चिन्हित करते हुए मौलाना आजाद की कारगुजारियों के आईने में मौजूदा वक्त की मुस्लिम राष्ट्रवाद की ऐसी हकीकत भरी तस्वीर पेश की है, जिसे देखने और जानने के बाद हम मौलाना अजाद पर लगने वाले सांप्रदायिक राजनीति करने के आरोप को सिरे से खारिज कर देते हैं। इस किताब ने यह बताने की पुरअसर कोशिश की है कि मौलाना आजाद ने किसी मुस्लिम राजनीति या सांप्रदायिक राजनीति की वकालत बिल्कुल नहीं की थी, बल्कि उन्होंने तो मुसमानों में राष्ट्रवाद की भावना को इस कदर प्रबल बनाया था, जो आज भी हमारे लिए किसी मिसाल से कम नहीं। भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद की जिंदगी और कारगुजारियों को सांप्रदायिक चश्में से देखने वालों को यह किताब एक बार जरूर पढ़नी चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि यह आजाद की जिंदगी को बयान करती है, बल्कि इसलिए कि इस किताब की बदौलत हम इतिहास की उन सच्ची घटनाओं को जान सकेंगे, जिसे सांप्रदायिकता का अमली जामा पहनाकर हमारे सामने पेश किया जाता रहा है।

Thursday, July 18, 2013

अमानुल्लाह कुरैशी उर्फ अमान फैजाबादी की एक गजल


 रोजा बगैर लीडर! 
Amaan Faizabadi

  

रोजा बगैर लीडर अफ्तार कर रहे हैं। 
अफ्तार की नुमाइश जरदार कर रहे हैं। 

मुफलिस घरों से अपने आला मिनिस्टरों का 

खुशआमदीद कहकर दीदार कर रहे हैं।

कमजर्फियों से होती महफिल की सारी जीनत

रोजा नमाज घर में खुद्दार कर रहे हैं।
  
नाम व नमूद शोहरत मिलती है महफिलों से
उम्मीद आखिरत की बेकार कर रहे हैं।

महफिल का हुस्न कोई कैसे खराब कर ले

बेवा यतीम शिकवा बेकार कर रहे हैं। 

Wednesday, June 26, 2013

समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन का इंटरव्यू

Shiv Viswanathan

देश की जो मौजूदा हालत है, उसे देखते हुए कुछ लोगों का कहना है कि हम एक अघोषित आपातकाल के दौर से होकर गुजर रहे हैं। क्या ऐसा सचमुच है, इसी मसले पर मैंने प्रभात खबर के लिए बात की देश के मशहूर समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन से। पेश है बातचीत का मुख्य अंश...



बेशक! ऐसा माना जा सकता है कि आज हम जिस हिंदुस्तान में रह रहे हैं, वह अपनी छवि से अब तक कि सबसे भ्रष्ट लोकतंत्र होने की कगार पर खड़ा है, लेकिन ऐसा नहीं माना जा सकता कि इस हिंदुस्तान को किसी भी तरह से किसी आपातकाल की जरूरत है, जैसा 1975 में हुआ था। अगर हम आज के अराजक माहौल को देख रहे हैं और आपातकाल जैसे हालात की संभावनात्मक बातें कर रहे हैं तो हमें इसकी भी चर्चा करनी चाहिए कि वास्तव में उस दौर में आपातकाल से हमें किन-किन चीजों का नुकसान उठाना पडा था। आपातकाल के तकरीबन वह डेढ महीने भारत के आधुनिक इतिहास के नजरिये से न सिर्फ काले दिनों के रूप में दर्ज है, बल्कि हमारे लिए और किसी भी बडे लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए एक सबक भी है। जाहिर है, किसी हादसे से मिली सबक से हम सीख लेना बेहतर समझते हैं, बजाय इसके कि उस सबक को ही दोहराया जाये।
वैसे तो आपातकाल खामियों से भरा हुआ है। लेकिन इसकी सबसे बडी खामी की बात की जाये तो यह कि इसने तमाम संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया था। एक नजर से देखें तो संजय गांधी ने लोकतंत्र की सभी आधारस्तंभ संस्थाओं पर ऐसा कुठाराघात किया, जिससे कि लोकतंत्र की सारी मर्यादाएं शर्मसार हो गयी थी। प्लानिंग को उसने व्यक्तिगत बना दिया था, मानो लोकतंत्र न हो, कोई राजतंत्र हो। हालांकि राजतंत्र भी जनता के अधिकारों का ख्याल करता है। किसी भी लोकतंत्र में उसकी संवैधानिक संस्थाओं का आधारस्तंभ के रूप में बने रहना निहायत ही जरूरी होता है। इस नजरिये से देखें तो आज के हालात को जब हम आपातकाल की संज्ञा देने की अर्थहीन कोशिश करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि अभी भी इसी अव्यवस्था में कई संवैधानिक संस्थाएं मौजूदा सरकार से पूरी शिद्दत से लड रही हैं। 
आपातकाल को मैं ‘फाल्स नोशन आफ गवर्नेंस’ की संज्ञा देता हूं। यह वो स्थिति है, जो अराजकता को जन्म देती है, हिंसा को जन्म देती है, आपराधिक प्रवृत्तियों को जन्म देती है, लोगों में विक्षोभ को जन्म देती है, कुप्रबंधन और अव्यवस्था को जन्म देती है, अराजकता को बढावा देती है और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन लेती है। ऐसा लगता है कि लोकतंत्र एक पिंजरे में बंद हो गया है और वहीं से देश को किसी आटोक्रेटिक फेनोमेना में जकडे हुए बेबसी से देख रहा है। गवर्नेंस को लोकतांत्रिक होना चाहिए, न कि टेक्नोक्रेटिक या आटोक्रेटिक। गवर्नेंस तभी लोकतांत्रिक रह सकता है, जब उसकी सभी संवैधानिक संस्थाएं ईमानदारी से अपना काम करें। सरकार की एनार्की का मुकाबला करें और जनता के अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा ख्याल रखें। 
लोगों में अगर ऐसी अवधारणा पल रही है कि इस देश की स्थिति आपातकाल जैसी हो गयी है, तो उन्हें अब यह सोचना शुरू कर देना चाहिए कि अब इस देश में गवर्नेंस की एक नयी अवधारणा की दरकार है। यह नयी अवधारणा दिल्ली से तो नहीं पैदा हो सकती, क्योंकि मौजूदा हालात में व्यवस्था का जो केंद्रीयकरण हुआ है, उसके लिए यह दिल्ली ही जिम्मेदार है। अब चीजों का विकेंद्रीकरण जरूरी हो गया है, तभी इस नयी अवधारणा को बल मिलेगा। अब दिल्ली से काम चलाना मुश्किल है। ऐसा लग रहा है कि देश साउथ ब्लाक से गवर्न हो रहा है। ऐसे में राज्यों और लोकजन के अधिकारों का हनन तो होगा ही। यह अधिकारों का हनन ही है जो आपातकाल जैसी अवस्था को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। जनअधिकारों को लेकर लोगों में खीज और गुस्सा बढ रहा है। यमुना की सफाई भी इन्हीं अधिकारों में से एक है। अगर देश में विकेंद्रीकरण हो तो यमुना जैसी तमाम नदियों को साफ और स्वच्छ रखना आसान हो जायेगा। दिल्ली यह काम नहीं कर सकती, वह सिर्फ लोकतंत्र और गुड गवर्नेंस की दुहाई देते हुए जनता के सभी बुनियादी मसलों पर राजनीति कर सकती है। देश के हर चीज का विकेंद्रीकरण होना जरूरी, तभी देश के आखिरी सिरे पर बैठे लोगों तक उनके मूलभूत अधिकार पहुंच पायेंगे। फिर कोई आपातकाल की बात नहीं करेगा।
हर अच्छे बुरे दौर को हमें सिर्फ याद करने की या उसको सही गलत ठहराने की बात नहीं करनी चाहिए। हमें चाहिए कि उससे सबक सीखें और प्रयासरत रहें कि लोकाधिकारों का हनन न हो। जब जब लोकाधिकारों का हनन होगा, जय प्रकाश नारायण जैसे लोकनायकों का जनम होगा और क्रांति होगी जो संपूर्ण क्रांति की मांग करेगी। आज संपूर्ण क्रांति की बात भले ही न हो, लेकिन गुड गवर्नेंस की एक नयी अवधारणा का विकसित होना बहुत जरूरी है।