Thursday, March 3, 2016

उर्दू ज़बान से मुहब्बत का जश्न है जश्न-ए-रेख़्ता

वसीम अकरम/ प्रियंका सिंह 
Priyanka and Wasim in Jashn-e-Rekhta 2016 Delhi


मुल्क में उर्दू से बेपनाह मुहब्बत करने वाले लोगों का नाम जब भी लिया जायेगा, तो बड़े अदब से उसमें एक नाम संजीव सराफ का भी आयेगा, जिन्होंने नोएडा में रेख़्ता फाउंडेशन की नींव रखी और उर्दू ज़बान को शिद्दत से महसूस करने वालों के लिए https://rekhta.org/  नाम की वेबसाइट की बुनियाद डाली। अपनी इस कोशिश और कामयाबी पर संजीव सराफ कहते हैं- ‘उर्दू जबान से मेरी मुहब्बत का एक हसीन-ओ-तरीन नज़राना है रेख़्ता।’ संजीव ने बिना किसी मुनाफे के रेख़्ता वेबसाइट के ज़रिये उर्दू शायरी को तीन ज़बानों- उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी- में पेश कर दुनिया भर में उर्दू के दायरे को बढ़ाया है। संजीव सराफ यहीं नहीं रुके, बल्कि इसे और आगे ले जाने के लिए ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ नाम से एक प्रोग्राम का आगाज भी कर दिया, जो पिछले साल दो दिन (14-15 मार्च, 2015) को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में अपने कामयाब अंजाम को पहुंचा। इस बार ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ का यह प्रोग्राम दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर दि आर्ट्स (आइजीएनसीए) में 12 फरवरी से शुरू होकर मुहब्बत के खास दिन 14 फरवरी को खत्म हुआ। जश्न-ए-रेख़्ता में लोगों की भीड़ को देख कर ऐसा महसूस हुआ कि हमारी मौजूदा पीढ़ी को उर्दू से बेपनाह मुहब्बत तो है ही, लेकिन अगर ऐसे प्रोग्राम होते रहे तो आने वाली पीढि़यां भी उर्दू ज़्बान से मुहब्बत करती रहेंगी। तीन दिन तक चले जश्न-ए-रेख़्ता के खूबसूरत अदबी माहौल में 50 से ज्यादा शायरों, कवियों, फनकारों, विचारकों, लेखकों और अदबी शख्सियतों ने अपनी शिरकत से आइजीएनसीए को ही नहीं, बल्कि पूरी दिल्ली पर अदब का रंग चढ़ा दिया।
Jashn-e-Rekhta 12-14 Feb 2016, Delhi
         जहां जश्न उर्दू का हो, वहां गुलज़ार साहब न हों, ऐसा कैसे हो सकता है? युवा लेखकों को संबोधित करते हुए गुलज़ार साब ने कहा, ‘फकीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू!’ ऐसा कहते हुए उनके चेहरे पर सूफियों वाली मुस्कुराहट थी। सभी उनकी मखमली आवाज़ और उर्दू की जादुई महक में खो से गये थे। सिनेमा में उर्दू की मौजूदगी पर फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली ने कहा, ‘गीतकार इरशाद कामिल मुझे इसलिए अच्छे लगते हैं, क्योंकि गानों में बहुत खूबसूरत उर्दू इस्तेमाल करते हैं.’ तीन दिन तक चले इस जश्न में प्यार-मोहब्बत और आम लोगों की भाषा का जादू वाकई सिर चढ़कर बोला। लोगों का हुजूम देखकर सब यही कह रहे थे कि रेख़्ता फाउंडेशन के संस्थापक संजीव सराफ ने इस जबान को बहुत ही लाजवाब दर्शक दिए हैं। लुटियन्स दिल्ली में आइजीएनसीए में इस प्रोग्राम के लिए उसके विभिन्न हिस्सों को अलग-अलग नाम दे दिया गया था: दीवान-ए-आम (स्टेज लॉन), दीवान-ए-खास (ऑडिटोरियम), बज्म-ए-रवां (एंफीथिएटर) और कुनूज-ए-सुखन (स्पीकिंग ट्री) वगैरह। एक साथ इन सभी जगहों पर अलग-अलग प्रोग्राम चल रहे थे। दास्तानगोई, प्ले, मुशायरा, कव्वाली, परिचर्चा, बैतबाजी, कैलीग्राफी, लेक्चर, प्रदर्शनी, नस्र और नज्म (गद्य और पद्य) का पाठ, बच्चों के लिए अलग से प्रोग्राम, उर्दू से जुड़ी हर शय पर कुछ न कुछ खास जरूर था।
पहले दिन की शुरुआत एक ऐसी हसीन शाम से हुई, जब दिल्ली के उपराज्यपाल ने इस कार्यक्रम का उद्घाटन किया। उसके बाद शायर जावेद अख्तर और शबाना आजमी ने ‘कैफी और मैं’ नाटक पेश किया। यह शौकत और कैफी आजमी के संघर्ष की कहानी है, जिसमें बीच-बीच में कैफी के लिखे गाने गाए जाते हैं। आखिर में, शबाना ने जिस तरह से कैफी की मौत के बाद अपनी मां की लिखी लाइनों को अपनी लरजती आवाज़ में अदा किया, उससे वहां मौजूद उन्हें सुनने वाले जज्बाती होकर अपनी पलकें भीगो बैठे। शबाना और जावेद की इस पेशकश से ऐसा लगा मानो हम कैफी आजमी और शौकत आजमी को अपने रूबरू देख रहे हैं।
Gulzar in Jashn-e-Rekhta 2016
        दूसरे दिन की सुबह में गुलजार साहब की महक पहले से ही थी, तभी तो दीवान-ए-आम में 11बजे से पहले ही गुलजार साहब को सुनने के लिए लोग अपनी सीटों को चुन चुके थे। गुलजार ने सुकृता पॉल कुमार के साथ बातचीत में उस जबान के जादू के बारे में बताया, जिसमें वे लिखते-पढ़ते रहे हैं। इसके बाद हर आधे घंटे के वक्फे के साथ रात के 11 बजे तक वहां चार और प्रोग्राम भी हुए। एक्टर टॉम आल्टर की जबरदस्त भूमिका से सजा वह नाटक भी हुआ, जो गालिब के खतों पर आधारित, एम. सईद आलम जैसे मशहूर शायर के नजरिए से लिखा गया उस जमाने की घटनाओं पर राय रखता था। शाम करिश्माई हो गयी, जब पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल साबरी ब्रदर्स ने कव्वाली शुरू की। साबरी ब्रदर्स ने ‘हम सब हाजी हैं, लेकिन हिंदुस्तान का दम भरते हैं।’ ‘देर न हो जाए, कहीं देर न हो जाए’ और ‘छाप तिलक सब छीनी’ जैसे कलाम पेश किए। इसके बाद मुशायरा ‘बज्म-ए-सुखन’ से पहले उर्दू के अदीब इंतिजार हुसैन और शायर निदा फाजली को याद किया गया। ये दोनों इस बार जश्न-ए-रेख़्ता में शामिल होने वाले थे, लेकिन किस्मत को यह मंजूर नहीं था और इससे पहले ही इन दोनों का इंतकाल हो गया। शायर अब्बास ताबिश, अनवर मकसूद, सुखबीर सिंह शाद और राजेश रेड्डी को लोगों ने खूब सराहा। रेड्डी के शे’र ‘सर कलम होंगे कल यहां उनके, जिनके मुंह में जबान बाकी है’ और अब्बास ताबिश के शे’र ‘एक मुद्दत से मेरी मां नहीं सोई ताबिश, मैंने एक बार कहा था, मुझको डर लगता है’ को खूब दाद मिली. वहीं दूसरी तरफ, दीवान-ए-खास में पांच कार्यक्रम थे, जिनकी शुरुआत ‘इस्मत चुगताई- रिवायत शिकन औरत की आवाज’ से हुई और आखिर में ‘मुगल-ए-आजम’ दिखाया गया। ठीक दूसरी तरफ, एंफीथिएटर में किताबों का विमोचन और विभिन्न विषयों पर बातचीत चलती रही।
Wasim with Sanjiv Saraf, Founder of Rekhta,
in Jashn-e-Rekhta 2016 Delhi
  दीवान-ए-आम में सुबह 11 बजे से ‘जिंदगी, आशिकी और शायरी’ पर कौसर मुनीर के साथ जावेद अख्तर की बातचीत से शुरुआत हुई और इसके बाद छह कार्यक्रम हुए। इस बार दास्तानगोई में देश के बंटवारे और उसके दर्द को दारेन शाहिदी और अंकित चड्ढा बहुत खूबसूरती के साथ पेश किया। इसके बाद एम.एस. सथ्यू निर्देशित ‘दारा शिकोह’ का मंचन किया गया। बड़े-बड़े टीवी स्क्रीन पर यह ड्रामा ऐसा लग रहा था मानो कोई फिल्म दिखाई जा रही है। इसके बाद रफाकत अली खान ने अपनी गायकी से जश्न-ए-रेख़्ता को अपने शबाब पर पहुंचा दिया। दीवान-ए-खास में कार्यक्रम की शुरुआत ‘उर्दू-हिंदी अदबः मुख्तलिफ लफ्जों में मुशतरका ख्वाब’ पर चर्चा से हुई और फिर एक के बाद एक विषय पर चर्चा हुई। 
इस जश्न की सबसे अच्छी बात यह रही कि यहां आने वाले वे लोग भी बड़ी तादाद में थे, जो उर्दू पढ़ना-लिखना तक नहीं जानते थे। लेकिन उर्दू शायरी के तलबगार थे। इस जश्न की कामयाबी के लिए संजीव सराफ की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। प्रोग्राम का पूरा माहौल हिंदुस्तानी तहजीब को पेश करता नजर आया। जगह-जगह पर लगायी गई उर्दू की नज्में, गजलें और शे’र या फिर मंटो, इस्मत चुगताई, परवीन शाकिर की पेंटिंग थीं। सबसे दिलचस्प दिल्लू राम कौसरी का ‘शनाख्वाने मुस्तफा’ लगा, जिसमें उन्होंने दोजख को बताया है कि उसकी आग उन्हें क्यों न जला सकी- ‘हिंदू सही मगर हूं शनाख्वाने मुस्तफा, इस वास्ते तेरा शोला न मुझको जला सका/है नाम दिल्लू राम तखल्लुस है कौसरी, अब क्या कहूं बता दिया जो कुछ बता सका।’
एक जगह पर उर्दू प्रकाशकों ने अपनी किताबों की स्टॉल भी लगा रखी थी। इसके अलावा, कई किस्म के खाने-पीने का इंतजाम था, जिनमें अवधी, कश्मीरी, दक्कनी, पंजाबी, मुगलई खाने थे। एक ही स्टॉल पर 20 तरह की चाय का स्वाद लिया जा सकता था। स्टैंडर्ड पान भंडार पर हर तरह का पान मौजूद था। जश्न का आखरी दिन खास रहा। संजीव सराफ और उनकी रेख़्ता टीम ने जश्न-ए-रेख़्ता की शक्ल में उर्दू के चाहने वालों के लिए एक बेहतरीन तोहफा दिया है। ऐसे जज्बे को सलाम।

Wasim Akram in Jashn-e-Rekhta 2016 Delhi

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