Thursday, March 24, 2011
Monday, March 21, 2011
Saturday, March 12, 2011
तेरी तस्वीर
शर्ट की जेब में रखकर,
भूल गया था मैं
और दिन भर ये सोचता रहा
कि चुपके-चुपके कौन
खेलता रहा मेरी धड़कनों से,
हौले-हौले कौन
गुदगुदी करता रहा मेरे सीने में
और दिन भर कौन
अपनी मासूम हरकतों से
परेशान करता रहा मुझको
अजब दिल्लगी है!
परेशान होकर भीडांट नहीं सकता तेरी तस्वीर को
डर लगता है
कहीं तुम रो न पड़ो
और तुम्हारे आंसुओं से
शर्ट के भीतर छुपा मेरा मासूम दिल
बेवजह, भीग जाये कहीं
Sunday, March 6, 2011
Monday, February 21, 2011
Wednesday, February 16, 2011
पुरस्कृत कविता: लोकतंत्र में लोक
पुरस्कृत कविता: लोकतंत्र में लोक
प्रतियोगिता की दूसरी कविता वसीम अकरम की है। यूनिप्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागी वसीम की कविताओं के केंद्र मे सामाजिक और आर्थिक विसंगतियाँ होती हैं, रूढियों और अन्याय के प्रतिरोध का स्वर हो्ता है और सामाजिक परिवर्तन का आह्वान भी होता है। नवंबर माह के यूनिकवि रह चुके वसीम अकरम की एक ग़ज़ल पिछले माह भी शीर्ष दस मे रही थी।
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http://kavita.hindyugm.com/2010/12/blog-post_06.html
http://kavita.hindyugm.com/2010/07/dahshatgardi.html
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तुम अनाज उगाओगे
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तुम अनाज उगाओगे
तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओं
कलमाडियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी ज़बान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनितिक खेल बनकर रह जाती है।
Saturday, February 12, 2011
Tuesday, February 8, 2011
Friday, February 4, 2011
Tuesday, February 1, 2011
नज़रे इलाहाबाद विश्वविद्यालय
![]() |
| Allahabad University |
जहां आकर अदब के साथ जीना हमने सीखा है
तभी लोगों ने इसका नाम माहो-मश्रिक रखा है
मीलों दूर से आते ईल्म के पासबां सारे
फूटे जिनकी पेशानी से अहले-ईल्म के तारे
चमन है ये अदीबों का, बग़ावत का, मोहब्बत का
के सारे मुल्क में फैला है चर्चा जिसकी अज़मत का
चमन है ये बग़ावत का जहां बाग़ी हैं हम सारे
हमारी ठोकरों में हैं फ़लक़ के चांद और तारे
चमन है ये मोहब्बत का प्यार के फूल हम सारे
हमारे इश्क़ के दम से हैं ये पुरनूर नज़्ज़ारे
चमन है ये अदीबों का वो रूहानी-इदराक़ है
यहीं महफ़िल है‘बच्चन’ की यहीं बज़्में फ़िराक़’है
हज़ारों माहो-अख़्तर की शोख़ अंगड़ाइयां भी हैं
कहीं बज़्मे-मोहब्बत है कहीं तन्हाइयां भी हैं
यहां की शाम ‘लखनऊ की शाम’ से नहीं कमतर
यहां की सुबह तो है ‘सुबहे बनारस’ से भी बढ़कर
यहीं है ईल्म की गंगा यही तहज़ीब की यमुना
यहीं है संगमो-प्रयाग की पाकीज़गी जाना
सलाम तुझको तेरी शान व शौकत को है सलाम
मिला दर्जा तुझे सेंट्रल की उस अज़मत को है सलाम।।
Saturday, January 29, 2011
Sunday, January 23, 2011
Friday, January 21, 2011
अधूरी साँस
चाँद के आंगन में
कितनी रातें काट दी तुमने
तारों के दाने चुनते-चुनते
तेरा इंतज़ार आवाज देकर
बुलाता रहा मुझको
मैने भी कितनी बार चाहा
कि तुम तक
लम्हों के सन्देश भेज दूँ
मगर इत्तफाक ने
कभी मौका ही नहीं दिया
अधूरी सांस लिए
हम जी तो सकते हैं
मगर मौत को तो
पूरी की पूरी साँस चाहिए
हिसाब की बहुत पक्की है वो
और वक़्त की पाबंद भी।
देखो न!
कितनी देर से
खड़ी है वो मेरे पास
अब, आ भी जाओ
के एक पल के लिए ही सही
हम पूरी साँस तो जी लें।
कितनी रातें काट दी तुमने
तारों के दाने चुनते-चुनते
तेरा इंतज़ार आवाज देकर
बुलाता रहा मुझको
मैने भी कितनी बार चाहा
कि तुम तक
लम्हों के सन्देश भेज दूँ
मगर इत्तफाक ने
कभी मौका ही नहीं दिया
अधूरी सांस लिए
हम जी तो सकते हैं
मगर मौत को तो
पूरी की पूरी साँस चाहिए
हिसाब की बहुत पक्की है वो
और वक़्त की पाबंद भी।
देखो न!
कितनी देर से
खड़ी है वो मेरे पास
अब, आ भी जाओ
के एक पल के लिए ही सही
हम पूरी साँस तो जी लें।
Saturday, January 15, 2011
Tuesday, January 11, 2011
बेबुनियाद है ईशनिंदा कानून
दुनिया के किसी भी मुल्क में जहां धर्म आधारित राजनीति की दोहरी व्यवस्था है वहां धर्म के नाम पर उदारवादी सोच के लोगों या नीतियों का विरोध करने वाले लोगों की हत्या या उनकी मौत की सजा मुकर्रर करना एक आम बात सी होती है. फिर अगर बात पाकिस्तान की हो तो कोई अचंभे वाली बात नहीं है कि वहां सलमान तासीर की हत्या क्यों हुई. पाकिस्तान एक लोकतांत्रिक मुल्क जरूर है, लेकिन उसकी कुछ राजनैतिक नीतियां धर्म आधारित हैं. आज तक वहां जितनी भी हत्याएं हुई हैं, उनके पीछे राजनीतिक कारण कम और धार्मिक कारण ज्यादा रहे हैं. धार्मिक कानून को मानने वाले मुल्कों में तरक्कीपसंद लोगों के लिए अपनी बात कह पाना बहुत मुश्किल होता है. उनकी प्रोग्रेसिव सोच को या तो दबा दिया जाता है या लोगों के बीच पहुंचने से पहले ही उनकी हत्या कर दी जाती है. ऐसी हत्य्ओं के लिए पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के और भी कई मुल्क हैं, जहां प्रोग्रेसिव सोच के लोगों की हत्याएं होती रहती हैं. पाकिस्तान के इतिहास पर एक नजर डालें, तो पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मंत्री शाहबाज़ भट्टी की हत्या से पहले जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो और लियाकत खान जैसे नेताओं की हत्या में कहीं न कहीं धार्मिक कट्टरता शामिल थी. गौरतलब है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून के तहत पाकिस्तानी ईसाई महिला आसिया बीबी के पक्ष में बोलने के कारण हत्या कर दी गयी. पाकिस्तान में आसिया बीबी को ईशनिंदा कानून के तहत मौत की सजा सुनायी जा चुकी है और वे जेल में हैं. ऐसा कहना कि ईशनिंदा (पैगम्बर मुहम्मद या इस्लाम के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करना) करने पर इसलाम में मौत की सजा का फरमान दिया गया है, तो यह गलत है और बेबुनियाद है.
ईष निंदा कानून क्या है, इसे जानने के लिए इतिहास के पन्नों में झांकने की जरूरत है. इसलामी तारीख के मुताबिक ईशनिंदा कानून पहली बार अब्बासी काल में आया. सन ७५॰ में दुनिया के कई मुल्कों जैसे उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण यूरोप, सिंध और मध्य एशिया में अब्बासी वंश का कब्जा था. अब्बासियों के ही राज में इस्लाम का स्वर्ण युग शुरु हुआ. अब्बासी खलीफा ज्ञान को बहुत महत्त्व देते थे. मुस्लिम दुनिया बहुत तेजी से विश्व का बौद्धिक केंद्र बनने लगी और उस दौरान मुसलमान और मुसलिम शासक राजनीतिक उच्चता के शिखर पर थे. उनके सत्ता के इस गुरूर ने ईशनिंदा जैसे कानून को जन्म दिया. यह एक नयी कानूनी इजाद थी, जिसे र्कुआन और हदीस दोनों इनकार करते हैं. मतलब यह कि र्कुआन या हदीस में कही गयी बात को तोड-मरोड कर या गलत व्याख्या कर कोई नया कानून बनाने की इजाजत इसलाम में नहीं है. इसलिए पाकिस्तान को भी चाहिए कि इस कानून को फौरन खत्म करे, क्योंकि यह वही ईशनिंदा कानून है जिसे अब्बासियों ने इजाद की थी. ईशनिंदा लोगों को मिली अभिव्यक्ति की आजादी का गलत इस्तेमाल है और इसके लिए कोई कानूनी सजा मुकर्रर नहीं है. अगर कोई शख्स किसी को चोट पहुंचाता है या शारीरिक रूप से नुकसान पहुचाता है, तो उस पर सजा का मामला बनता है, लेकिन वह भी मौत की सजा का नहीं. अगर कोई ईशनिंदा करता है, तो उस पर तो कोई कानूनी सजा का मामला ही नहीं बनता, क्योंकि वह उसकी मानसिक सोच का मामला है. इस ऐतबार से हम किसी को ऐसा करने पर सजा कैसे दे सकते हैं? इस तरह का कानून इस्लाम में कहीं नहीं है. यह कानून इस्लाम के खिलाफ है. पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून जनरल जियाउल हक के शासनकाल में लागू किया गया था. हदीस के जमाने के बाद यानी पैगम्बर मुहम्मद के बाद के जमाने में अरब में कुछ ऐसे शासक हुए, जिन्होंने इस्लामीकरण के नाम पर कुरआन और हदीस की गलत व्याख्या की और मनमाने ढंग से तरह-तरह के कई कानून बनाए , जिन्हें ’फोकहा‘ कहा गया. आज इसको मानने वालों की पूरी दुनिया में एक लंबी फेहरिस्त है, जिसके परिणाम स्वरूप लोगों की हत्याएं होती रही हैं. और जबतक इस कानून को खत्म नहीं किया गया तबतक ऐसा होता रहेगा.
इस्लाम के हवाले से यह बात कही गयी है कि अगर कोई पैगम्बर मुहम्मद साहब या इसलाम के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता है, तो यह उसकी नासमझी है. मुसलमान विद्वानों को चाहिए कि उस शख्स को समझाएं और इस्लाम की अच्छी बातों को उसके जेहन में उतारने की कोशिश करें. बजाय इसके कि उसकी मौत का फरमान जारी कर दें. पैगम्बर मुहम्मद के बारे में या इस्लाम के बारे में अगर कोई किसी भी तरह की टिप्पणी करता है, यह उसकी जातीय सोच का मामला है जिसके लिए उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. ऐसे घृणित काम के लिए उसे सजा या माफी सिर्फ अल्लाह ही दे सकता है, इंसान नहीं. इस पूरे मसले के मद्देनजर इस्लामी तारीख का एक वाक्या बयान करना मुनासिब होगा. पैगम्बर मुहम्मद जब रास्ते से गुजरते थे तो उनके दुश्मन उनको और इस्लाम के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते थे. सहाबा किराम यानी मुहम्मद साहब के साथी गुस्सा होकर कहते थे कि हुजूर, अगर आप इजाजत दें तो हम उनको सबक सिखाएं. लेकिन पैगम्बर मुहम्मद ने उन्हें मना करते हुए अपने सहाबी साबित अल अंसारी से कहा कि उनके अंदर समझ की कमी है. मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि अल्लाह उन्हें अच्छी हिदायत दे. पैगम्बर मुहम्मद ने उनके खिलाफ किसी भी तरह की सजा से इनकार कर दिया. इस्लाम हमेशा किसी मसले की जड तक जाकर कोई फैसला देने की बात करता है. र्कुआन में आया है- ’किसी भी मसले के पीछे के कारणों को ढूंढकर लोगों को समझाने की कोशिश करनी चाहिए. फौरन उनकी आलोचना नहीं करना चाहिए जो अल्लाह के अलावा किसी और की प्रार्थना करते हैं’’. यहां तक कि र्कुआन में यह भी आया है कि अल्लाह का फरमान है कि अगर कोई किसी दूसरे ईष्वर की पूजा करता है तो उसकी आलोचना और उसके ईश्वर की आलोचना मत करो, नहीं तो वो तुम्हारे ईश्वर की आलोचना करेंगे.
इस्लाम में किसी शख्स की सजा को लेकर बहुत गहराई से बताया गया है. इस्लाम सिर्फ हत्या के मामले में ही सजा की इजाजत देता है. इसके अलावा किसी भी तरह के अपराध के लिए इसलाम में कहीं भी मौत या मौत जैसी सजा मुकर्रर नहीं है. अगर कहीं ऐसा होता है तो एस मुल्क की सरकार को चाहिए कि पहले वो इसलाम को समझने की कोशिश करे, फिर कोई सजा का प्रावधान बनाए और वो सजा भी मौत की नहीं होनी चाहिए. इसलाम तो साफ-साफ कहता है कि अगर किसी ने कोई अपराध किया है तो उसको सजा कोर्ट से ही दी जानी चाहिए और वह भी जूर्म साबित हो जाने के बाद. कोई भी आम नागरिक ऐसा नहीं कर सकता, जैसा कि सलमान तासीर की हत्या मुमताज कादरी ने किया. ऐसे लोग इस्लाम को अच्छी तरह नहीं समझे होते हैं.
मुसलमानों के लिए पाक र्कुआन का बड़ा उंचा मर्तबा है. र्कुआन में अल्लाह ने अपने रसूल, पैगम्बर मुहम्मद को हुक्म देते हुए कहा है कि- ’ऐ मुहम्मद! आप लोगों को इस्लाम के बारे में बताइये . आपका काम सिर्फ लोगों को बताना है, क्योंकि आप निगहबान नहीं हैं’’. इससे यह साबित होता है कि ईशनिंदा जैसे जुर्म में भी किसी को मौत की सजा नहीं दी जा सकती. इस्लाम का दायरा बहुत बडा है. इसलाम सजा से पहले किसी शख्स को दीनी बातों के तहत समझाकर उसे दीन की तरफ आने की दावत देने की बात करता है, न कि फौरन सजा की. लोगों के दिमाग में एक धारणा बन गयी है कि कुरआन एक फरमान जारी करने वाली किताब है. यह बहुत ही गलत धारणा है.कुरआन कोई क्रिमिनल कोड यानी अपराध संहिता नहीं है, बल्कि यह तो एक आस्था वाली किताब है. इस्लाम के सारे तर्क और उपदेश स्थितिजन्य कारणों पर आधारित होते हैं, कि कोई मसला क्यों और कैसे हल किया जाना चाहिए. कुरआन सामाजिक और राजनैतिक दायरे को अच्छी तरह बताता है. इसलिए विद्वानों को चाहिए कि लोगों के अंदर कुरआन और इस्लाम की अच्छी समझ पैदा करें.
ईष निंदा कानून क्या है, इसे जानने के लिए इतिहास के पन्नों में झांकने की जरूरत है. इसलामी तारीख के मुताबिक ईशनिंदा कानून पहली बार अब्बासी काल में आया. सन ७५॰ में दुनिया के कई मुल्कों जैसे उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण यूरोप, सिंध और मध्य एशिया में अब्बासी वंश का कब्जा था. अब्बासियों के ही राज में इस्लाम का स्वर्ण युग शुरु हुआ. अब्बासी खलीफा ज्ञान को बहुत महत्त्व देते थे. मुस्लिम दुनिया बहुत तेजी से विश्व का बौद्धिक केंद्र बनने लगी और उस दौरान मुसलमान और मुसलिम शासक राजनीतिक उच्चता के शिखर पर थे. उनके सत्ता के इस गुरूर ने ईशनिंदा जैसे कानून को जन्म दिया. यह एक नयी कानूनी इजाद थी, जिसे र्कुआन और हदीस दोनों इनकार करते हैं. मतलब यह कि र्कुआन या हदीस में कही गयी बात को तोड-मरोड कर या गलत व्याख्या कर कोई नया कानून बनाने की इजाजत इसलाम में नहीं है. इसलिए पाकिस्तान को भी चाहिए कि इस कानून को फौरन खत्म करे, क्योंकि यह वही ईशनिंदा कानून है जिसे अब्बासियों ने इजाद की थी. ईशनिंदा लोगों को मिली अभिव्यक्ति की आजादी का गलत इस्तेमाल है और इसके लिए कोई कानूनी सजा मुकर्रर नहीं है. अगर कोई शख्स किसी को चोट पहुंचाता है या शारीरिक रूप से नुकसान पहुचाता है, तो उस पर सजा का मामला बनता है, लेकिन वह भी मौत की सजा का नहीं. अगर कोई ईशनिंदा करता है, तो उस पर तो कोई कानूनी सजा का मामला ही नहीं बनता, क्योंकि वह उसकी मानसिक सोच का मामला है. इस ऐतबार से हम किसी को ऐसा करने पर सजा कैसे दे सकते हैं? इस तरह का कानून इस्लाम में कहीं नहीं है. यह कानून इस्लाम के खिलाफ है. पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून जनरल जियाउल हक के शासनकाल में लागू किया गया था. हदीस के जमाने के बाद यानी पैगम्बर मुहम्मद के बाद के जमाने में अरब में कुछ ऐसे शासक हुए, जिन्होंने इस्लामीकरण के नाम पर कुरआन और हदीस की गलत व्याख्या की और मनमाने ढंग से तरह-तरह के कई कानून बनाए , जिन्हें ’फोकहा‘ कहा गया. आज इसको मानने वालों की पूरी दुनिया में एक लंबी फेहरिस्त है, जिसके परिणाम स्वरूप लोगों की हत्याएं होती रही हैं. और जबतक इस कानून को खत्म नहीं किया गया तबतक ऐसा होता रहेगा.
इस्लाम के हवाले से यह बात कही गयी है कि अगर कोई पैगम्बर मुहम्मद साहब या इसलाम के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता है, तो यह उसकी नासमझी है. मुसलमान विद्वानों को चाहिए कि उस शख्स को समझाएं और इस्लाम की अच्छी बातों को उसके जेहन में उतारने की कोशिश करें. बजाय इसके कि उसकी मौत का फरमान जारी कर दें. पैगम्बर मुहम्मद के बारे में या इस्लाम के बारे में अगर कोई किसी भी तरह की टिप्पणी करता है, यह उसकी जातीय सोच का मामला है जिसके लिए उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. ऐसे घृणित काम के लिए उसे सजा या माफी सिर्फ अल्लाह ही दे सकता है, इंसान नहीं. इस पूरे मसले के मद्देनजर इस्लामी तारीख का एक वाक्या बयान करना मुनासिब होगा. पैगम्बर मुहम्मद जब रास्ते से गुजरते थे तो उनके दुश्मन उनको और इस्लाम के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते थे. सहाबा किराम यानी मुहम्मद साहब के साथी गुस्सा होकर कहते थे कि हुजूर, अगर आप इजाजत दें तो हम उनको सबक सिखाएं. लेकिन पैगम्बर मुहम्मद ने उन्हें मना करते हुए अपने सहाबी साबित अल अंसारी से कहा कि उनके अंदर समझ की कमी है. मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि अल्लाह उन्हें अच्छी हिदायत दे. पैगम्बर मुहम्मद ने उनके खिलाफ किसी भी तरह की सजा से इनकार कर दिया. इस्लाम हमेशा किसी मसले की जड तक जाकर कोई फैसला देने की बात करता है. र्कुआन में आया है- ’किसी भी मसले के पीछे के कारणों को ढूंढकर लोगों को समझाने की कोशिश करनी चाहिए. फौरन उनकी आलोचना नहीं करना चाहिए जो अल्लाह के अलावा किसी और की प्रार्थना करते हैं’’. यहां तक कि र्कुआन में यह भी आया है कि अल्लाह का फरमान है कि अगर कोई किसी दूसरे ईष्वर की पूजा करता है तो उसकी आलोचना और उसके ईश्वर की आलोचना मत करो, नहीं तो वो तुम्हारे ईश्वर की आलोचना करेंगे.
इस्लाम में किसी शख्स की सजा को लेकर बहुत गहराई से बताया गया है. इस्लाम सिर्फ हत्या के मामले में ही सजा की इजाजत देता है. इसके अलावा किसी भी तरह के अपराध के लिए इसलाम में कहीं भी मौत या मौत जैसी सजा मुकर्रर नहीं है. अगर कहीं ऐसा होता है तो एस मुल्क की सरकार को चाहिए कि पहले वो इसलाम को समझने की कोशिश करे, फिर कोई सजा का प्रावधान बनाए और वो सजा भी मौत की नहीं होनी चाहिए. इसलाम तो साफ-साफ कहता है कि अगर किसी ने कोई अपराध किया है तो उसको सजा कोर्ट से ही दी जानी चाहिए और वह भी जूर्म साबित हो जाने के बाद. कोई भी आम नागरिक ऐसा नहीं कर सकता, जैसा कि सलमान तासीर की हत्या मुमताज कादरी ने किया. ऐसे लोग इस्लाम को अच्छी तरह नहीं समझे होते हैं.
मुसलमानों के लिए पाक र्कुआन का बड़ा उंचा मर्तबा है. र्कुआन में अल्लाह ने अपने रसूल, पैगम्बर मुहम्मद को हुक्म देते हुए कहा है कि- ’ऐ मुहम्मद! आप लोगों को इस्लाम के बारे में बताइये . आपका काम सिर्फ लोगों को बताना है, क्योंकि आप निगहबान नहीं हैं’’. इससे यह साबित होता है कि ईशनिंदा जैसे जुर्म में भी किसी को मौत की सजा नहीं दी जा सकती. इस्लाम का दायरा बहुत बडा है. इसलाम सजा से पहले किसी शख्स को दीनी बातों के तहत समझाकर उसे दीन की तरफ आने की दावत देने की बात करता है, न कि फौरन सजा की. लोगों के दिमाग में एक धारणा बन गयी है कि कुरआन एक फरमान जारी करने वाली किताब है. यह बहुत ही गलत धारणा है.कुरआन कोई क्रिमिनल कोड यानी अपराध संहिता नहीं है, बल्कि यह तो एक आस्था वाली किताब है. इस्लाम के सारे तर्क और उपदेश स्थितिजन्य कारणों पर आधारित होते हैं, कि कोई मसला क्यों और कैसे हल किया जाना चाहिए. कुरआन सामाजिक और राजनैतिक दायरे को अच्छी तरह बताता है. इसलिए विद्वानों को चाहिए कि लोगों के अंदर कुरआन और इस्लाम की अच्छी समझ पैदा करें.
इश्क का कैंसर
फेंक दिया था तुमने गुस्से में
ये कहते हुए कि
छि:! कितने गंदे हो आप
और कैंसर का हवाला देकर
कभी न पीने का
एक मासूम सा
मशवरा भी दिया था तुमने
तेरे उस मशवरे ने
बचा लिया मुझको कैंसर से
अब जो तेरे इश्क का कैंसर
पल पल खाए जा रहा है मुझे
और तुम खामोश हो ऐसे
कुछ नहीं जानती जैसे........
Sunday, January 9, 2011
Saturday, January 8, 2011
कमबख्त वक़्त
उस गली से गुज़रे
अब तो शायद वो भी
मेरी राह नहीं देखती होगी
कहाँ ठहरता है
कोई इतने दिनों तक
कहते हैं प्यार के लिए
वक़्त देना पड़ता है
वक़्त देना पड़ता है
मगर पेट ने
खरीद लिया है वक़्त को
खरीद लिया है वक़्त को
अब मेरे पास जो वक्त है
वो पेट के लिए है
और ये वक्त बहुत ज़ालिम है
दिन भर
काम कराता रहता है मुझसे
काम कराता रहता है मुझसे
कमबख्त! वक़्त
उसको याद भी नहीं करने देता
उसको याद भी नहीं करने देता
Monday, January 3, 2011
Sunday, December 26, 2010
Monday, December 20, 2010
Friday, December 17, 2010
Tuesday, December 7, 2010
यूनिकविता: संवाद ज़रूरी है
Monday, December 06, 2010
जरूरी संवादों के संग नवंबर यूनिप्रतियोगिता के परिणाम
संक्रामक गति से से बढते बाजारीकरण के बीच जहाँ कि हमारे जीवन की मूलभूत चीजें भी उत्पादों मे तब्दील होती जा रही हों और आर्थिक ताकतें हमारे विचारों पर भी कब्जा जमाती जा रही हों, वहाँ साहित्य बाजारवाद के इन बढ़ते खतरों से परे नही है। पठनीयता के क्षरण के इस दौर मे जबकि सार्थक लेखन हाशिये पर धकेला जा रहा है, शब्दों का अपने अस्तित्व के प्रति संघर्ष और ज्यादा अहम होता जा रहा है। साहित्य की तमाम विधाओं के संग कविता भी बाजारी-अतिक्रमण के इसी संकट से जूझ रही है। नितदिन बढ़ती चुनौतियों के बीच तमाम गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं का कोमा मे पहुँचते जाना, समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं मे कविता के सिकुड़ते कॉलम, कविता-संग्रहों के संस्करणों के घटते प्रकाशन और साहित्यिक मंचों पर लोकप्रिय कविताओं का जमीनी सरोकारों से परे होते जाना कविता के इसी संक्रमण-काल के संकेत हैं।
घटती पठनीयता के इस दौर मे इंटरनेट संचार और संवाद के सबसे त्वरित और ग्लोबल माध्यम के रूप मे उभरा है। हिंद-युग्म पर हमारा प्रयास इंटरनेट की इसी ताकत का सहारा लेते हुए सामयिक साहित्य को आम पाठक से जोड़े रखने का रहा है। हमारी मासिक यूनिप्रतियोगिता इसी की एक कड़ी है जिसकी लोकप्रियता ही इसकी सफ़लता का सबूत है। प्रतियोगिता को हर माह तमाम प्रतिभागियों और पाठकों से मिलता समर्थन हमारे लिये अत्यधिक उत्साह की बात है। यह इंटरनेट के वैश्विक पाठक वर्ग के बीच हिंदी के प्रचार के हमारे प्रयासों के सफ़लता ही है कि हिंद-युग्म के कविता पृष्ठ को प्रतिदिन एक हजार से कहीं अधिक हिट्स मिलते हैं। मगर इंटरनेट पर सार्थक पठनीयता की मशाल जलाये रखने के लिये और वर्तमान कविता के अपने समय के साथ आम आदमी और उसके सरोकारों से जुड़े रहने के इन प्रया्सों के लिये हमारे पाठकों का समर्थन और सक्रिय मार्गदर्शन सबसे जरूरी शर्त है।
इस बार यूनिप्रतियोगिता के नवंबर-2010 संस्करण के परिणाम ले कर हम उपस्थित हैं। परिणामों पर जाने से पहले हम सभी प्रतिभागियों और सारे पाठकों का आभार प्रकट करना चाहेंगे जिनके निरंतर समर्थन और मार्गदर्शन से यूनिप्रतियोगिता अपने 47 संस्करण निर्बाध पूरे कर सकी है। नवंबर माह मे कुल 41 कवियों ने भाग लिया। पिछले माहों की तरह इस बार भी अंक-निर्धारण दो चरणों मे किया गया। इस बार कविताओं की कुल संख्या भले ही पिछले महीनों से कुछ कम रही हो, मगर एक साथ कई समान रूप से अच्छी कविताएँ आने से निर्णायकों का काम कुछ मुश्किल रहा और कविताओं के बीच अंकों का अंतर भी कम रहा। पहले चरण के 3 निर्णायकों के दिये अंकों के आधार पर कुल 21 कविताएं दूसरे चरण मे गयीं। दूसरे चरण मे दो निर्णायकों ने उन कविताओं को उनके शिल्प, विषय की सामयिकता, कथ्य की नवीनता और स्रजनशीलता जैसे मानकों पर आँक कर उन्हे अंक दिये। इस तरह अंतिम वरीयता के आधार पर कुल 14 कविताएं हिंद-युग्म पर प्रकाशन के लिये छाँटी गयीं। नवंबर माह के यूनिकवि का सम्मान वसीम अकरम को मिला जिनकी कविता ’संवाद जरूरी है’ इस माह की यूनिकविता बनी है।
यूनिकवि: वसीम अकरम
वैसे हिंद-युग्म के नियमित पाठकों के लिये वसीम अकरम कोई नया नाम नही हैं। इससे पहले इनकी दो कविताएं हिंद-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी पहली कविता ’खाप सरपंच’ मई माह मे चौथे स्थान पर रही थी, फिर जून माह मे इनकी कविता ’दहशतगर्दी’ भी बारहवें स्थान पर प्रकाशित हुई थी। वसीम अकरम का जन्म उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद मे हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साहित्यिक अंग्रेजी मे स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल करने वाले वसीम बचपन से ही पठन-पाठन मे सक्रिय रहे हैं। इन्होने गज़ल, कविता, लेख, कहानी आदि कई विधाओं मे हाथ आजमाया है और इनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित भी होती रही हैं। इनकी रुचि लेखन के अलावा गायन मे भी रही है और इनके शब्दों और सुरों से सजा हुआ एक एलबम ’नैना मिला के’ भी रिलीज हो चुका है और एक अन्य एल्बम पर काम चल रहा है। अभी दिल्ली मे स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से कार्य कर रहे हैं और मयूर विहार, दिल्ली मे निवास कर रहे हैं। इनके लेख तमाम समाचार पत्रों मे आते रहते हैं।
वसीम अकरम की ज्यादातर कविताएं हमारे बीच मौजूद सामयिक समस्याओं को अपना विषय बनाती हैं और सामाजिक विसंगतियों के मुकाबिल अपनी आवाज बुलंद करती हैं। प्रस्तुत कविता भी शोषण के खिलाफ़ वंचितों के संघर्ष के इसी स्वर को परवाज देते हुए हमारे समय के सबसे जरूरी प्रश्नों को टालने की बजाय उनका सामना करने की जरूरत पर बल देती है।
संपर्क: 9899170273
यूनिकविता: संवाद ज़रूरी है
संवाद ज़रूरी है
सुबह, शाम और रात के उन लम्हों से
जो ख़ूबसूरत होते हुए भी
कुछ के लिए
किसी भयानक टीस की तरह हैं।
संवाद ज़रूरी है
उन मुट्ठियों से
जो हक़ के लिए तनने से पहले ही
डर जाती हैं कि कहीं
पूरा हाथ ही न काट दिया जाये।
संवाद ज़रूरी है
उस घर से
जिस घर में "युवराज" के
छद्म कदम तो पड़ते हैं
मगर रोटी के चंद टुकड़ों के
लड़खड़ाते क़दम भी नहीं पड़ते।
संवाद ज़रूरी है
उस पैसे से
जो अनाज के दानों पर लिखे
ग़रीब, मज़दूर के नामों को काट कर
उस पर अमीरों का नाम लिख देता है।
संवाद ज़रूरी है
उन आर्थिक नीतियों से
जो देश को महाशक्ति तो बनाती हैं
मगर भूखों के पेट में
दो दाने भी नहीं उड़ेल पातीं।
संवाद ज़रूरी है
धर्म के उन ठेकेदारों से
जो ईंट, पत्थर से बनी बेजान इमारतों के लिए
इंसान को इंसान के ख़ून का
प्यासा बना देते हैं।
संवाद ज़रूरी है
उस आधी दुनिया से
जिसका दामन हक़ से खाली है,
और जो बाजारवाद की बलिबेदी पर
मजबूर है चढ़ने के लिए।
संवाद ज़रूरी है
उन ग़रीब के बच्चों से
जिनकी आंखों में
आसमां छूने का ख़्वाब तो है
मगर जूठे बरतन धोने के सिवा
कोई पंख नहीं है उनके पास।
संवाद ज़रूरी है
हर उस शय से
जिसकी ज़द में आकर
तहज़ीब, रवायत और इंसानियत
सब अपना वजूद खो रहे हैं।
______________________________________________________________
पुरस्कार और सम्मान- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।
घटती पठनीयता के इस दौर मे इंटरनेट संचार और संवाद के सबसे त्वरित और ग्लोबल माध्यम के रूप मे उभरा है। हिंद-युग्म पर हमारा प्रयास इंटरनेट की इसी ताकत का सहारा लेते हुए सामयिक साहित्य को आम पाठक से जोड़े रखने का रहा है। हमारी मासिक यूनिप्रतियोगिता इसी की एक कड़ी है जिसकी लोकप्रियता ही इसकी सफ़लता का सबूत है। प्रतियोगिता को हर माह तमाम प्रतिभागियों और पाठकों से मिलता समर्थन हमारे लिये अत्यधिक उत्साह की बात है। यह इंटरनेट के वैश्विक पाठक वर्ग के बीच हिंदी के प्रचार के हमारे प्रयासों के सफ़लता ही है कि हिंद-युग्म के कविता पृष्ठ को प्रतिदिन एक हजार से कहीं अधिक हिट्स मिलते हैं। मगर इंटरनेट पर सार्थक पठनीयता की मशाल जलाये रखने के लिये और वर्तमान कविता के अपने समय के साथ आम आदमी और उसके सरोकारों से जुड़े रहने के इन प्रया्सों के लिये हमारे पाठकों का समर्थन और सक्रिय मार्गदर्शन सबसे जरूरी शर्त है।
इस बार यूनिप्रतियोगिता के नवंबर-2010 संस्करण के परिणाम ले कर हम उपस्थित हैं। परिणामों पर जाने से पहले हम सभी प्रतिभागियों और सारे पाठकों का आभार प्रकट करना चाहेंगे जिनके निरंतर समर्थन और मार्गदर्शन से यूनिप्रतियोगिता अपने 47 संस्करण निर्बाध पूरे कर सकी है। नवंबर माह मे कुल 41 कवियों ने भाग लिया। पिछले माहों की तरह इस बार भी अंक-निर्धारण दो चरणों मे किया गया। इस बार कविताओं की कुल संख्या भले ही पिछले महीनों से कुछ कम रही हो, मगर एक साथ कई समान रूप से अच्छी कविताएँ आने से निर्णायकों का काम कुछ मुश्किल रहा और कविताओं के बीच अंकों का अंतर भी कम रहा। पहले चरण के 3 निर्णायकों के दिये अंकों के आधार पर कुल 21 कविताएं दूसरे चरण मे गयीं। दूसरे चरण मे दो निर्णायकों ने उन कविताओं को उनके शिल्प, विषय की सामयिकता, कथ्य की नवीनता और स्रजनशीलता जैसे मानकों पर आँक कर उन्हे अंक दिये। इस तरह अंतिम वरीयता के आधार पर कुल 14 कविताएं हिंद-युग्म पर प्रकाशन के लिये छाँटी गयीं। नवंबर माह के यूनिकवि का सम्मान वसीम अकरम को मिला जिनकी कविता ’संवाद जरूरी है’ इस माह की यूनिकविता बनी है।
यूनिकवि: वसीम अकरम
वैसे हिंद-युग्म के नियमित पाठकों के लिये वसीम अकरम कोई नया नाम नही हैं। इससे पहले इनकी दो कविताएं हिंद-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी पहली कविता ’खाप सरपंच’ मई माह मे चौथे स्थान पर रही थी, फिर जून माह मे इनकी कविता ’दहशतगर्दी’ भी बारहवें स्थान पर प्रकाशित हुई थी। वसीम अकरम का जन्म उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद मे हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साहित्यिक अंग्रेजी मे स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल करने वाले वसीम बचपन से ही पठन-पाठन मे सक्रिय रहे हैं। इन्होने गज़ल, कविता, लेख, कहानी आदि कई विधाओं मे हाथ आजमाया है और इनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित भी होती रही हैं। इनकी रुचि लेखन के अलावा गायन मे भी रही है और इनके शब्दों और सुरों से सजा हुआ एक एलबम ’नैना मिला के’ भी रिलीज हो चुका है और एक अन्य एल्बम पर काम चल रहा है। अभी दिल्ली मे स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से कार्य कर रहे हैं और मयूर विहार, दिल्ली मे निवास कर रहे हैं। इनके लेख तमाम समाचार पत्रों मे आते रहते हैं।वसीम अकरम की ज्यादातर कविताएं हमारे बीच मौजूद सामयिक समस्याओं को अपना विषय बनाती हैं और सामाजिक विसंगतियों के मुकाबिल अपनी आवाज बुलंद करती हैं। प्रस्तुत कविता भी शोषण के खिलाफ़ वंचितों के संघर्ष के इसी स्वर को परवाज देते हुए हमारे समय के सबसे जरूरी प्रश्नों को टालने की बजाय उनका सामना करने की जरूरत पर बल देती है।
संपर्क: 9899170273
यूनिकविता: संवाद ज़रूरी है
संवाद ज़रूरी है
सुबह, शाम और रात के उन लम्हों से
जो ख़ूबसूरत होते हुए भी
कुछ के लिए
किसी भयानक टीस की तरह हैं।
संवाद ज़रूरी है
उन मुट्ठियों से
जो हक़ के लिए तनने से पहले ही
डर जाती हैं कि कहीं
पूरा हाथ ही न काट दिया जाये।
संवाद ज़रूरी है
उस घर से
जिस घर में "युवराज" के
छद्म कदम तो पड़ते हैं
मगर रोटी के चंद टुकड़ों के
लड़खड़ाते क़दम भी नहीं पड़ते।
संवाद ज़रूरी है
उस पैसे से
जो अनाज के दानों पर लिखे
ग़रीब, मज़दूर के नामों को काट कर
उस पर अमीरों का नाम लिख देता है।
संवाद ज़रूरी है
उन आर्थिक नीतियों से
जो देश को महाशक्ति तो बनाती हैं
मगर भूखों के पेट में
दो दाने भी नहीं उड़ेल पातीं।
संवाद ज़रूरी है
धर्म के उन ठेकेदारों से
जो ईंट, पत्थर से बनी बेजान इमारतों के लिए
इंसान को इंसान के ख़ून का
प्यासा बना देते हैं।
संवाद ज़रूरी है
उस आधी दुनिया से
जिसका दामन हक़ से खाली है,
और जो बाजारवाद की बलिबेदी पर
मजबूर है चढ़ने के लिए।
संवाद ज़रूरी है
उन ग़रीब के बच्चों से
जिनकी आंखों में
आसमां छूने का ख़्वाब तो है
मगर जूठे बरतन धोने के सिवा
कोई पंख नहीं है उनके पास।
संवाद ज़रूरी है
हर उस शय से
जिसकी ज़द में आकर
तहज़ीब, रवायत और इंसानियत
सब अपना वजूद खो रहे हैं।
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पुरस्कार और सम्मान- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।
Monday, December 6, 2010
Wednesday, December 1, 2010
मजाज को नज्र एक नज़्म
तू दर्दे-दिल को आईना बना लेती तो अच्छा था
मोहब्बत की कशिश दिल में सजा लेती तो अच्छा था
बचाने के लिए तुम खुद को आवारा-निगाही से
निगाहे-नाज को खंजर बना लेती तो अच्छा था
तेरी पल्कों के गोशे में कोई आंसू जो बख्शे तो
उसे तू खून का दरिया बना लेती तो अच्छा था
सुकूं मिलता जवानी की तलातुम-खेज मौजों को
किसी का ख्वाब आंखों में बसा लेती तो अच्छा था
ये चाहत है तेरी मरजी, मुझे चाहे न चाहे तू
हां, मुझको देखकर तू मुस्कुरा देती तो अच्छा था
तुम्हारा हुस्ने-बेपर्दा कयामत-खेज है कितना
किसी के इश्क को पर्दा बना लेती तो अच्छा था
तेरी निगहे-करम के तो दिवाने हैं सभी लेकिन
झुका पल्कें किसी का दिल चुरा लेती तो अच्छा था
किसी के इश्क में आंखों से जो बरसात होती है
उसी बरसात में तू भी नहा लेती तो अच्छा था
तेरे जाने की आहट से किसी की जां निकलती है
खुदारा तू किसी की जां बचा लेती तो अच्छा था.
Sunday, November 28, 2010
मरासिम
वक़्त
Sunday, November 21, 2010
Saturday, November 20, 2010
खाप सरपंच
कानून और संविधान को
ठेंगे पर रखकर
फैसला सुनाते हो तुम
मानो किसी की जिंदगी
तुम्हारे ही हाथ में हो जैसे।
नये हो तुम
मगर तुम्हारे लिबास
बर्बर परंपराओं के
रूढ़ धागों से बने हैं,
तुम इन्हें नहीं उतारते
कहीं तुम आदमी न बन जाओ
तुम इन्हें नहीं फेंकते
कहीं तुम आधुनिक न हो जाओ
वो इसलिए कि फिर
पुरातनपंथी और रुढ़ियों की
बंजर हो रही तुम्हारी दुकान
कौन चलायेगा तुम्हारे बाद।
सगोत्र विवाह की सज़ा के नाम पर
उस लड़की के साथ
सामूहिक बलात्कार करते हो तुम
और ये भूल जाते हो
कि वो तुम्हारे ही गांव की
तुम्हारे ही गोत्र की
तुम्हारी ही बहन है।
यह कैसी ठेकेदारी है
परंपरा की और धर्म की
जहां किसी ग़लती की सज़ा
सामूहिक बलात्कार के बाद
सरे आम मौत है।
Friday, November 19, 2010
दहशतगर्दी
अभी तो शहर को पूरी तरह से शहर होना था
अभी तो रौनक़े-बाज़ार मुग्रो-सहर होना था
अभी तो धूप की तासीर का आगाज़ होना था
अभी तो रुख़ हवा का और बेअंदाज़ होना था
अभी तो शाम के सारे मनाजिर रक्स करने थे
अभी तो माहो-अख़्तर के दिलों में रंग भरने थे
अभी तो बुलबुलों के परों का परवाज़ बाक़ी था
अभी तो शहरे-मौसिक़ी का हसीं साज़ बाक़ी था
अभी तो वक्त के सारे तकाज़े आने थे बाक़ी
अभी तो लम्हों-लम्हों के जनाज़े आने थे बाक़ी
के तुमने ख़ुश हवा में ज़हर बमों का मिला डाला
ये गलियों में मिला डाला,वो कूचों में मिला डाला
लगाकर मौत का सामान ख़ुद परवाज़ कर बैठे
बहाकर ख़ून इंसां का ख़ुदी पर नाज़ कर बैठै
न तुमने ये कभी सोचा कि ख़ूं इंसान का होगा
न तो हिंदू का ख़ूं होगा न मुसलमान का होगा
बिछाकर मज़हबी शतरंज चाल दहशत की चलते हो
जेहादी नाम से इंसानियत का सर कुचलते हो
मासूमियत का तुम जो क़त्लेआम करते हो
ख़ुदा वाले ख़ुदा की ज़ात को बदनाम करते हो
ख़ून मज़लूम का हो ये मेरा ईमां नहीं कहता
करो तुम दीन को रुसवा कोई कुर्आँ नहीं कहता
इस जेहाद से रब की मुहब्बत मिल नहीं सकती
बहाकर ख़ून इंसां का वो जन्नत मिल नहीं सकती
२६-११- २००८ को मुंबई हादसे के बाद
हम भारत के लोग तो हम हैं! – वसीम अकरम
मिसाल के तौर पर, ओबामा के आने के पहले की भारतीय राजनीति और जनमानस की तस्वीरों पर गौर करें तो इस आदत की इबारत बिल्कुल साफ समझ में आ जायेगी. ''यूनियन कार्बाइड, डाउ केमिकल के खिलाफ कार्रवाई करें ओबामा. 26/11 के दोषियों को सज़ा दिलायें ओबामा। संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सीट दिलायें ओबामा. इरान पर ठोस कार्रवाई करें ओबामा. कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करें ओबामा. पाकिस्तान में आतंकवाद पर रोक लगायें ओबामा. पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करे ओबामा. वर्ल्ड तिब्बत कांग्रेस की मांगचीन पर अंकुश लगायें ओबामा. संसद पर हमले के आरोपी को फांसी दिलायें ओबामा. सिख समुदाय की मांग 1984 के सिख दंगों के आरोपियों को न्याय के दायरे में लायें ओबामा.’’ ये हमारी मांगने की आदतों की ऐसी तस्वीरें हैं जिसे देखसमझकर आसानी से ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम अपने राष्ट्र को समर्पित अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कितने वफादार हैं.
हाल ही में हुए भारतअमेरिका के सामरिक समझौते के मद्देनजर भरत को कोई ऐसा फायदा नहीं होने वाला जिससे कि भारत की गरीबी के आंकड़ों में कुछ कमी आ जाये. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है जो इस बात की गवाही देता है कि अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए वादों को तोड़ना उनकी पुरानी फितरत रही है और ओबामा ने ही इसे ही सिद्ध किया है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में किसी तरह का गठजोड़ या समझौता हमेशा बरकरार नहीं रह सकता. ओबामा की नाकामयाबी की एक लम्बी फेहरिस्त है. मसलन, ओबामा चाहे होते तो अपने 27 फरवरी 2009 के उस बयान ''अमेरिका 31 अगस्त 2010 तक इराक से अपने सारे सैनिक वापस बुला लेगा’’ पर कायम रह सकते थे, मगर नहीं रह सके. जो देश ग्रीन हाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करता हो और ग्लोबल वार्मिंग के लिए विकासशील राष्ट्रों को जिम्मेदार ठहराता हो, उसके इस रवैये से समझना चाहिए कि वो सिर्फ अपना हित देखता है. ओबामा अफगान में भी विफल रहे क्योंकि आज भी वहां अमेरिकी सेना की जमातें गश्त कर रही हैं, जबकि राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कहा था कि वो 16 महीनों के भीतर अपने सारे सैनिकों को वापस बुला लेंगे.
ओबामा के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बनने की बुनियाद को देखें तो अंदाजा लगाया जा रहा था कि अब अमेरिका में कालेगोरे का भेद खत्म होने वाला है. अमेरिका में 14 प्रतिशत के करीब अश्वेत हैं. ओबामा ने इन अश्वेतों के लिए कुछ भी नहीं किया जिससे कि गैलाप की एक ताजा रिपार्ट के मुताबिक ओबामा की स्वीकार्यता का आंकड़ा 2008 के 31 प्रतिशत के मुकाबले 13 प्रतिशत रह गयी है. इस गिरावट का कारण पैंथर्स पार्टी से जुड़े एक अश्वेत पत्रकार मुमिआ अबु जमाल का जेल में होना है जिन्हें फिलाडेल्फिया में एक गोरे पुलिस अधिकारी डेनियल फक्नर की हत्या के झूठे केस में फांसी की सज़ा सुनायी जा चुकी है. मुमिआ को अमेरिका में बेज़ुबानों की ज़बान का दर्जा प्राप्त है. हालांकि, जनदबाव के कारण ये फांसी अभी तक नहीं हो सकी है. अहम बात ये है कि अमेरिका जिस आर्थिक मंदी से जूझ रहा है, वहां बेरोजगारी ब़ रही है, इसके लिए ओबामा कोई जरूरी कदम तक नहीं उठा पाये. अब अगर वो ये कहें कि वो दुनिया को आर्थिक मंदी से मुक्त करना चाहते हैं तो ये बहुत ही हास्यास्पद लगता है. लेकिन इसके बावजूद भी हम तो हम हैं. विशुद्ध भारतीय! जिसके बारे में बहुत पहले साहित्य पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद ने कहा था कि ''हम भारतीय रेलगाड़ी के डब्बे हैं जिन्हें कोई इंजन खींचता है’’.
बुश हो या ओबामा अमेरिकी नीतियां हमेशा अमेरिकी हितों के रूप में कार्य करती हैं. यही कारण है कि अमेरिका के लिए दूसरे राष्ट्रों से सामरिक, आर्थिक समझौतों की ये नीतियां सिर्फ उन्हीं के लिए तर्क संगत लगती हैं. ऐसे में भारत अमेरिका के लिए एक बाजार है, जहां वो अपनी सौदागरी करना चाहता है, न कि साझेदारी. साझेदारी शब्द का प्रयोग तो कूटनीतिक है जिसे अमेरिका शाब्दिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता चला आ रहा है. आज भारत ये मानता है कि अमेरिका से हमारे रिश्ते इस सौदेबाजी से मजबूत होंगे, तो शायद गलत होगा, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय संबंध अपनेअपने देशों के हितों पर निर्भर करता है. अमेरिका अपना हित साधने के लिए ही भारत, पाकिस्तान और अमेरिका के मजबूत रिश्तों की दुहाई देता है, क्योंकि वो जानता है कि जिस तरह से चीन की ताकत ब़ढ रही है, उसके मद्देनजर पाकिस्तान ऐसा देश है जहां से वो अपनी सैनिक गतिविधियों को अंजाम दे सकता है. यही कारण है कि ओबामा ने भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान के कामयाब राष्ट्र बनने की बात भारत के हित में की.
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