Sunday, July 15, 2012

किसान

पांव में तेज दर्द है
और फटी बिवाई से खून झांक रहा है
पूरा बदन 
थकन के बोझ से दबा हुआ है
घुटने यूं रूठे हैं
कि अब उठने नहीं देंगे
मगर फिर भी 
उठना तो पड़ेगा
सूरज उगाने की
जिम्मेदारी जो ले रखी है मैने...

यह किसी आफिस की मुलाजिमत नहीं
जो दरवाजे पर छुट्टी का बोर्ड लगाकर
झूठी बीमारी के बहाने
घर पर आराम फरमाए,
पानी सरक गया तो तो न जाने 
कितने दिनों के बाद लौटेगा
और ऐसे इंतजारों में
फसलें गुजर जाया करती हैं...

पेट को रोज
दो वक्त की तन्ख्वाह चाहिए
यह किसी महकमे का नौकर नहीं
जो महीनों की तन्ख्वाह न पाकर भी
अपना काम करता रहता है...

मुंह अंधेरे से लेकर
शाम तक के सारे लम्हों से होकर
धीरे-धीरे कई रोज में 
पकता है एक दाना... 

Thursday, June 14, 2012

सूफी गायिका बेग़म आबिदा परवीन से बातचीत का एक टुकड़ा


खिराज-ए-अकीदत - शहंशाह-ए-गजल मेहदी हसन 
18 जुलाई, 1927- 13 जून, 2012
कायनात ने खो दिया सुरों का नूर-ए-मुजस्सम
Mehdi Hasan & Abida Parveen
बेहद अफसोस है कि जनाब मेहदी हसन साहब इस दुनिया से रुखसत हो गये. आज सारा आलम सोगवार सा बैठा उनके जनाजे को ऐसे देख रहा है जैसे वे अभी अपनी गहरी नींद से बेदार होंगे और फरमायेंगे, जरा मेरा हारमोनियम लाना, एक सुर खटक रहा है... मगर काश ऐसा होता. इसी एहसास को शिद्दत से महसूस करते हुए और चश्म-ए-नम से सराबोर हुईं मशहूर-ओ-मआरूफ सूफी गायिका आबिदा परवीन से जब मैंने बात की तो लग्जिशी जुबान में उन्होंने अपने दर्द को कुछ यूं बयान किया...
        शहंशाह-ए-गजल जनाब मेहदी हसन का इस दुनिया से जाना महज एक इंसानी हयात का जाना नहीं है, बल्कि पूरी कायनात से एक ऐसी रूह का जाना है जो मौसिकी के लिए एक नूर-ए-मुजस्सम थे. अल्लाह उनकी रूह को जन्नत में आला से आला मुकाम अता फरमाए. आज पूरी कायनात ने जो खोया है, मैं समझती हूं कि शायद इससे पहले फन की किसी दुनिया ने कोई भी ऐसी नायाब चीज नहीं खोयी होगी. वे इस दुनिया के तमाम गुलोकारों से बहुत अलग थे. गजल व नज्म को गाने के लिए जिस मिजाज की जरूरत होती है, वे उसी मिजाज को शिद्दत से जीते थे. उनकी आवाज को सुनकर ही हमें ये एहसास होने लगता है कि वह गजल यह नज्म अब सिर्फ गजल एक नज्म नहीं रह गयी, बल्कि उसने अपनी रूहानियत को जी लिया. गजलें और नज्में उनकी जुबान पर उतरने के लिए अपने वजूद को पाने के लिए बेकरार रहा करती थीं. 
कम से कम मेरे लिए तो यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि उनके बाद गजल की इस रूहानी विरासत को कोई संभाल पायेगा नहीं, महज जिंदा रखने की रवायत तो दूर की बात है. गजल और मौसिकी को लेकर उनके अंदर जो सलाहियत  थी, जो कैफियत थी, वह दुनियावी  नहीं थी, बल्कि हकीकी थी. गजल के हर एक शे‘र और शे‘र के हर एक लफ्ज को वो अपनी जुबान नहीं, बल्कि अपनी रूह दे देते थे, जिसे सुनने के बाद शायारी और शायर की कैफियत का अंदाजा लगाना आसान हो जाता है. मेहदी साहब की यही वह सबसे मखसूस सलाहियत थी, जिसे महसूस कर मशहूर शायर फैज अहमद फैज ने अपनी गजल-गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले... को उनके नाम करते हुए कहा था, 'इसके मुगन्नी (गायक) भी आप, मौसिकार (संगीतकार) भी आप और इसके शायर भी आप ही हैं.‘
          मुझे उनकी हर मुलाकात का एक-एक रूहानी मंजर बाकायदा ऐसे याद है जैसे कि एक बच्चा अपना सबक याद रखता है. वे जब भी मिलते थे, सिवाय मौसिकी यानि संगीत के किसी और मसले पर बात ही नहीं करते थे. मुख्तलिफ शायरों की सादा-मिजाज गजलों को भी वे अपनी जुबान देकर उसे बाकमाल नग्मगी में तब्दील कर देते थे. ऐसा इसलिए, क्योंकि वे गजलों को गाने से पहले खूब रियाज़ करते थे. दिन-दिन भर हारमोनियम लिए बैठे रहते थे और एक ही गजल को मुख्तलिफ रागों पर कसा करते थे. गजलों के जरिये रूह में उतरने की वो कूवत सिर्फ मेहदी साहब में ही थी. परवीन शाकिर की गजल- कू-ब-कू फैल गयी बात शनासाई की... को गाते हुए वे खुद भी इतने शनास हो जाते थे कि प्रोग्राम पूरी तरह से खुश्बूजदा हो जाता था. रंजिश ही सही... तो उनका माइलस्टोन ही है. मीर की गजल- ये धुआं कहां से उठता है को गाते हुए वे पूरे माहौल को शादमानी के ऐसे आलम में लेकर चले जाते थे, जिसे अब कहीं पर तलाश करना बहुत ही मुश्किल है. गजल सुनने-सुनाने का अब वैसा मंजर शायद ही मिले. जिंदगी के आखिरी वक्त तक अपने सीने में बंटवारे का दर्द समेटे रहे और उफ तक न किया. ऐसा खुदा की सल्तनत का एक नायाब इंसान ही कर सकता है. उनको दिल से जज्बाती खिराज-ए-अकीदत. अल्लाह उनकी रूह को जन्नत बख्शे... आमीन...!

Saturday, April 14, 2012

मौलाना मोहम्मद वली रहमानी का इंटरव्यू


प्रेमचंद की कहानियों में बदलाव


          यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि प्रेमचंद ने अपनी आखिरी कहानी ‘कफन’ मूलतः उर्दू में लिखी थी और हिंदी में इसका अनुवाद प्रकाशित हुआ था। लेकिन अनुवाद के दौरान कफन की कहानी में बदलाव आ गया। दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पाक्षिक पत्रिका ‘जौहर’ के अप्रैल, 2012 अंक के एक लेख में प्रेमचंद की आखिरी कहानी ‘कफन’ के हिंदी रूपांतरण के बारे में कहा गया है कि यह मूल कहानी से कुछ अलग है। आज से तकरीबन आठ साल पहले जामिया में हिंदी के प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्ला ने यह बात सामने लायी थी और अपने लेखों के जरिये कफन के मूल कथानक से छेड़छाड़, शाब्दिक बदलाव और वाक्य विन्यास में बदलाव की बात की थी। अब्दुल बिस्मिल्ला कहते हैं- ‘दरअसल, कई साल पहले जब मुझे इस बात की जानकारी हुई, तो सबसे पहले मैंने जामिया की लाइब्रेरी से वह मूल पांडुलिपि निकलवायी। उसको पढ़ने के बाद मैंने पाया कि मौजूदा वक्त में लगातार छप रही कहानी ‘कफन’ अपनी मूल पांडुलिपि से कुछ अलग है। तब मैंने इसके बारे में और ज्यादा जानकारी इकट्ठा करने के बाद कई लेख लिखे। दोनों में फर्क वाक्य विन्यास और उर्दू शब्दों के हिंदी अर्थ के रूप में है और कहीं-कहीं अनावश्यक शब्दों को भी जोड़ दिया गया है, जिससे उसके भाव में फर्क नजर आता है।’
          गौरतलब है कि प्रेमचंद ने ‘कफन’ कहानी को 1935 में अपने जामिया प्रवास के दौरान जामिया की तात्कालिक पत्रिका ‘रिसाला जामिया’ के लिए लिखा था। रिसाला जामिया-दिसंबर, 1935 में मूल रूप से उर्दू में प्रकाशित कहानी ‘कफन’ हिंदी में पहली बार अप्रैल, 1936 में ‘चांद’ नामक पत्रिका में छपी। तब से लेकर आजतक वही हिंदी वाली कहानी ही छपती चली आ रही है। एक से दूसरी भाषा में अनुदित किताबों के बारे में अक्सर यह बात सामने आती रही है कि अनुदित रचना अपनी मूल रचना से कुछ अलग हो जाती है। लेकिन यह समस्या उर्दू और हिंदी जैसी भाषाओँ के लिए नहीं आनी चाहिए, जो एक दूसरे से बेहद करीब ही नहीं, बल्कि सहोदर मानी जाती हैं। ऐसे में प्रेमचंद की रचनाओं में भाषाई अंतर के साथ-साथ कथानक में अंतर आ जाना मौलिकता की दृष्टि से अखरता है। 
              प्रेमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत में उर्दू में कहानियां लिखीं। बाद में वे हिंदी में लिखने लगे। इसकी वजह आर्थिक थी। खुद उन्होंने 1915 में अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम को पत्र में लिख- ‘अब हिंदी लिखने का मश्क कर रहा हूं। उर्दू में अब गुजर नहीं।’ कायाकल्प से पहले तक के उनके उपन्यासों की मूल पांडुलिपि उर्दू में ही है। बाद में जब उनकी उर्दू की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद हुआ, तो कहीं-कहीं मौलिकता खोती नजर आयी। हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार कहते हैं- ‘अनुवादकों ने अनुवाद करते समय कहीं-कहीं वाक्यों में बदलाव कर दिया है, ताकि पाठक प्रेमचंद को पूरी तरह समझ सके।’ हालांकि, अब्दुल बिस्मिल्ला इस बदलाव को गलत मानते हैं और कहते हैं- ‘अनुवाद के समय सिर्फ लिपि पर ध्यान दिया जाना चाहिए, उसकी कहानी पर नहीं। जैसा कि कहानी ‘पूस की रात’ के साथ हुआ। मौजूदा पूस की रात में कहानी का नायक हल्कू पूस की ठंडी रात में सो जाता है और जानवर उसका सारा खेत चर जाते हैं। जबकि मूल कहानी में वह अपने घर जाता है। वहां उसे निराश देखकर उसकी पत्नी कहती है कि अब तुम खेती-बाडी छोड दो। इस पर हल्कू कहता है कि मैं एक किसान हूं, किसानी नहीं छोड़ सकता। मौजूदा कहानी में हल्कू को इस तरह सोते दिखाने के लिए प्रेमचंद की आलोचना भी हुई। अनुवाद किसने किया यह तो नहीं पता, लेकिन प्रेमचंद अपनी कहानियों का अनुवाद खुद कम और अपने मित्रों से ज्यादा करवाया करते थे। उनके एक खास मित्र थे इकबाल बहादुर वर्मा ‘सहर’ जो उनकी कहानियों का अनुवाद किया करते थे। जो भी हो इन अनुवादों ने प्रेमचंद की कहानियों की आत्मा को वैसा नहीं रहने दिया, जैसी कि वे उर्दू में नजर आती हैं।

Wednesday, March 14, 2012

चलता, बोलता, गाता साहित्य है सिनेमा

Prabhat Khabar Link
http://www.prabhatkhabar.com/node/138679
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            कहते हैं कि बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है, क्योंकि किताबें देशकाल और समाज का आईना होती हैं, जिसमें उसका इतिहास-भूगोल नजर आता है. किताबें अपने पाठकों से संवाद करती हैं. हालांकि, यही किताबें जब सिनेमा के परदे पर उतरती हैं तो ये भी अपने देखने वालों से संवाद ही करती हैं, लेकिन माध्यमों के फर्क के कारण कई दृश्य पाठकों तक हू-ब-हू पहुंच नहीं पाते. सिनेमा की इसी नाकामी में एक तरह से किताबों की कामयाबी छिपी है. सिनेमा में जो छूट जाता है उसे किताबें बयां करती हैं और उससे जुडे अनछुए पहलुओं को हमारे सामने लाती हैं.  
            इसे इत्तेफाक ही कहा जा सकता है कि इस साल की शुरुआत में हमने दिल्ली के भारत की राजधानी बनने के सौ साल पूरा होने का जश्न मनाया था और अब इसी साल के अंत में हिंदी सिनेमा के भी सौ साल पूरे हो जायेंगे. इस ऐतबार से 2012 हिंदी सिनेमा का शताब्दी वर्ष भी है. इसीलिए इस बार दिल्ली में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित 20वें अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले का थीम ’भारतीय सिनेमा‘ रखा गया था. एशिया के सबसे बड़े प्रदर्शनी स्थल-प्रगति मैदान, दिल्ली में 25 फरवरी से 4 मार्च तक चले इस मेले में भारतीय सिनेमा और सिनेमा पर आयी किताबों की अद्भुत छटा देखने को मिली. भारत में सिनेमा और साहित्य के बीच एक अनूठे संबंध को दर्शाती भारतीय सिनेमा पर तकरीबन 80 प्रकाशकों की हिंदी, अंगरेजी, उर्दू एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में चुनिंदा 400 किताबों का प्रदर्शन किया गया. सिनेमा को केंद्र में रखकर हाल नंबर सात में थीम पवेलियन बनाया गया था, जहां इन किताबों के साथ-साथ सिनेमा संबंधी उपकरण-कैमरा, लाइट, रील, छतरी, प्लेयर, रिकार्ड, ग्रामोफोन और भारतीय फिल्मों के ब्लैक एंड व्हाइट पोस्टरों को सलीके से सजाया गया था. मोबाइल, हैंडी कमरे, लैपटाप और सीडी-डीवीडी के इस दौर के दर्शकों के लिए थीम पवेलियन के वे उपकरण किसी अद्भुत नजारे से कम नहीं थे. दर्शकों के बीच सरगोशियां भी हो रही थीं कि शायद हमारी अगली पीढ़ी इस अद्भुत नजारे से महरूम रहेगी. उन दर्शकों में किताबों के शौकीन विदेशी मेहमान भी शामिल थे. सिनेमा थीम की जानकारी पाकर जर्मनी से आये भारतीय फिल्मों के दीवाने स्टीफेन हाक और कैटी हाक दंपति ने बताया कि, 'भारतीय फिल्मों को देखकर हमने भारतीय सिनेमा यानि बालीवुड के बारे में उतना नहीं जाना, जितना उसके बारे में आयी किताबें पढकर जाना.' 
In Book Fair
            बुकशेल्फ में प्रदर्शन के लिए लगी किताबों में लिजेंड्री सत्यजीत रे पर सबसे ज्यादा किताबें मौजूद थीं. क्लासिक सिनेमा की दृष्टि से भारतीय सिनेमा में रे का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. जिस तरह से बालीवुड में क्लासिक सिनेमा को अपने साहित्यिक योगदान से गुरु रवींद्र नाथ टैगोर और प्रेमचंद ने प्रभावित किया है, ठीक वैसे ही सत्यजीत रे ने भी किया है. आक्सफोर्ड प्रेस की 'फिल्मिंग फिक्शन-टैगोर, प्रेमचंद एंड रे' नामक किताब को खरीदने और उसकी उपलब्धता के लिए दर्शक मेला व्यवस्थापकों से आग्रह करते नजर आये. सत्यजीत रे की फिल्मी जिंदगी के अनछुए पहलुओं को बयां करती किताब 'स्पीकिंग आफ फिल्म्स' सुधी पाठकों के हाथों में बारहा आ जाती थी. इसी सिलसिले में एक दूसरी किताब 'डीप फोकस-रिफ्लेक्शन आन सिनेमा' में सत्यजीत रे की सिनेमाई कलात्मकता और दूरदर्शिता का जिक्र शामिल है. इसकी भूमिका मशहूर निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल की कलम से है. हिंदी सिनेमा की बात हो और गुरुदत्त का जिक्र न आये, ऐसा कैसे हो सकता है. 'लीजेंड आफ इंडियन सिनेमा-गुरुदत्त' नामक किताब में गुरुदत्त की शख्सियत और अदाकारी की तमाम बारीकियां मौजूद हैं, जिसके लिए उन्हें भारतीय सिनेमा का लिजेंड्री कलाकार माना जाता है. गुरुदत्त की शख्सीयत को हिंदी सिनेमा के कवि के रूप में भी जाना जाता है, जिसे बालीवुड को करीब से देखने वाली लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर ने अपनी किताब में बहुत बारीकी से बयां किया है. ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार, सदाबहार हीरो देवानंद, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और कई फिल्मी हस्तियों के जीवन को दर्शाती किताबें खासा आकर्षित करती रहीं और दर्शक उनसे रूबरू होकर खुशी का एहसास करते रहे. 
          सिनेमा पर किताबों की पठनीयता के बीच एक बात बहुत ही काबिलेगौर नजर आयी कि फिल्मी दर्शक जब पाठक बनते हैं, तो वे परदे पर नजर आने वाले नायाकों की अपेक्षा परदे के पीछे के तमाम किरदारों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर एक फिल्म के निर्माण में किन लोगों का कितना योगदान होता है. क्योंकि परदे पर दिखने वाले कलाकारों के बारे में उन्हें ज्यादा जानने की जरूरत नहीं होती. यही वजह है कि रूपा प्रकाशन के स्टाल पर हर वक्त फिल्म सेक्शन में खडे होने की जगह ही नहीं होती थी. धक्का-मुक्की के बीच लोग किताबों को खरीदने के लिए बेताब थे. क्योंकि रूपा ने परदे के पीछे काम करने वाले बालीवुड के लीजेंड निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, गीतकार, गायक, पटकथा लेखक, कैमरामैन और तकनीशियन पर एक सीरीज प्रकाशित की है. इन शख्सीयतों की जिंदगी की ऐसी तसवीर, जिसे फिल्म देखते हुए ढूंढना बहुत मुश्किल है, को रूपा ने इस सीरीज में शामिल कर सिनेमा और साहित्य दोनों की दृष्टि से बहुत ही सराहनीय काम किया है. इसी कड़ी में इस साल उर्दू भाषा से भी कई किताबें आयी, जिनमें सज्जाद राशिद की 'इंडियन सिनेमा' खासी चर्चित रही. अवराक, अदबिस्तान और अर्शिया जैसे उर्दू के नये प्रकाशनों में बालीवुड पर कई किताबें देखने को मिलीं. उर्दू प्रकाशकों का कहना है कि कुछ साल पहले तक वे गजल, नज्म, कहानी और उपन्यासों के अलावा सिनेमा पर किताबें छापने से हिचकते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. उर्दू पाठकों को भी अब सिनेमा पर किताबें पसंद आने लगी हैं. 'जौहर-ए-अदाकारी' और 'उर्दू और बालीवुड' के स्टाक से बाहर होने से इस बात को समझा जा सकता है. उर्दू प्रकाशनों में एक खास बात यह नजर आयी कि वे सिनेमा के अंदर तहजीब और ज़ुबान को लेकर हमेशा संवेदनशील रहते हैं और उनको सजाने-संवारने की आवाज बुलंद करते रहते हैं. 
          साहित्य एक मौन अभिव्यक्ति है और सिनेमा एक ध्वनित अभिव्यक्ति है. साहित्य जब परदे पर चलता है, बोलता है और गाता है, तब यह सिनेमा बन जाता है. लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि सिनेमा की मौन अभिव्यंजना भी साहित्य बन जाये. सिनेमा की खामोशी का जिक्र हुआ नहीं कि 1931  में बनी पहली फिल्म 'आलम आरा' की तसवीर आंखों में मचल पड़ी. सिनेमा थीम पवेलियन में दाखिल होते ही गेट के ठीक ऊपर लगे फिल्म 'आलम आरा' के उस पोस्टर को देखकर उसकी अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है. भारतीय सिनेमा यानि बालीवुड का यह शताब्दी वर्ष चल रहा है. ऐसे में जब हम उस तसवीर को देखते हैं तो सौ साल पहले शुरू हुई उस सिनेमाई परंपरा को देखते हैं, जिसके पहलू में क्लासिक फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त है. इत्तेफाक देखिये कि उस क्लासिक जीनत को देखने के हम कितने शुक्रगुजार हैं, जिसका मुकाबला आज की अति आधुनिक और तकनीक से लबरेज फिल्म भी नहीं कर पाती. 
          सिनेमा थीम पवेलियन में तीन चीजें बहुत अहम थीं, जिसको लेकर दर्शक खासे उत्साहित रहे. एक तो एरीफ्लेक्स-2सी माडल कैमरा, जिससे तपन सिन्हा, सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन और उत्तम कुमार जैसे लिजेंड्री निर्माता-निर्देशकों ने कालजयी फिल्मों का निर्माण किया था. दूसरी खास बात थी, एक दर्जन क्लासिक फिल्मों का प्रदर्शन. उसके साथ ही मेले में हर रोज बालीवुड की हस्तियों की शिरकत भी काबिलेगौर थी. तीसरी चीज थी बाइस्कोप. 
            बहरहाल, पहले कैमरे की बात करते हैं. इमेज इंडिया फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने इस कैमरे का निर्माण 50 के दशक में किया था. एरीफ्लेक्स-2सी माडल के उस कैमरे में रील की मैगजीन का इस्तेमाल होता था. एक मैगजीन की समयावधि साढ़े चार से पांच मिनट की होती थी. इसे चलाने के लिए 18 वोल्ट की बैटरी का इस्तेमाल होता था, जिससे तकरीबन 10 मैगजीन यानि 40 से 50 मिनट तक की शूटिंग पूरी होती थी. यह वही कैमरा था, जिससे सत्यजीत रे ने 'सिक्किम- डाक्यूमेंट्री, 'सीमाबद्ध्', 'गोपीगाईन', 'जनारण्य' और 'घरे-बाहिरे' जैसी कालजयी फिल्मों की परिकल्पना को सेलुलाइड के परदे पर उतारा था. डिस्को डांसर मिथुन चक्रवर्ती का फिल्मी कॅरियर भी 1976 में इसी कैमरे से शुरू हुआ था. वह फिल्म थी मृणाल सेन की 'मृगया', जिसके लिए मिथुन को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला. उत्तम कुमार की 'सन्यासी', ऋत्विक घटक की 'पुरुलिया छोऊ', तपन सिन्हा की 'हास्पीटल' और 'महतो' आदि फिल्मों के बेहतरीन शाट भी इसी कैमरे से लिये गये थे. हालांकि प्रदर्शन के लिए रखे गये इस कैमरे को दर्शकों के लिए छूना मना था, लेकिन दर्शकों की ख्वाहिशें इस कैमरे को छूने के लिए मचल रही थीं. इसके आस-पास पुरानी बिखरी हुई रील की मैगजीन और उसमें इस्तेमाल किये जानेवाले उपकरणों को तरतीब से सजाया गया था.  
60 सीटों वाले उस थिएटर जैसे हाल में मेले के दौरान एक दर्जन फिल्में दिखायी गयीं. इन फिल्मों की सबसे खास बात यह थी कि ये सभी फिल्में साहित्यिक कृतियों पर बनी थीं. पहले ही दिन 1955 में आयी सत्यजीत रे की फिल्म 'पाथेर पांचाली' का प्रदर्शन किया गया. विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास 'पाथेर पांचाली' पर बनी यह फिल्म भारतीय सिनेमा की एक क्लासिक फिल्म है. दूसरे दिन 1962 में प्रदर्शित फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम', विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित थी. 1905 में छपे मिर्जा हादी रुसवा के उपन्यास 'उमराव जान अदा' पर 1981 में मुजफ्फर अली ने 'उमराव जान' बनायी. यह फिल्म लखनवी तहजीब को नायाब तरीके से बयां करती है. इसके गीत आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर मकबूलियत पाते हैं. इसके बाद के एल सहगल अभिनीत फिल्म 'देवदास' का भी प्रदर्शन किया गया. आरके नारायण की कहानियों पर बने धारावाहिक 'मालगुडी डेज' को भी दिखाया गया, जिसमें प्रख्यात रचनाकार गिरीश कर्नाड ने भी भूमिका निभायी थी. इसी सिलसिले में फिल्म 'सूरज का सातवां घोडा', 'माटी माय', 'चारूलता', 'उसकी रोटी' और 'अतिथि' आदि फिल्मों ने भी दर्शकों के बीच अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करायी. साथ ही तरक्की पसंद शायरी को मकबूलियत दिलाने वाले शायर और बालीवुड के गीतकार साहिर लुधियानवी की 91वीं जयंती पर 'साहिर  लुधियानवी की याद में' नामक कार्यक्रम का आयोजन भी हुआ और उन पर एक डाक्यूमेंट्री भी दिखायी  गयी. उस दौरान साहिर की किताब 'तल्खियां' की कुछ नज़्मे पढ़ी और गायी गयी. शेर-ओ-शायारी के उस कार्यक्रम में किसी मुशायरे की सी कशिश महसूस करते हुए दर्शक तालियों से दाद और नवाजिश भेज रहे थे. मेले की थीम सिनेमा होने से इस बार दर्शकों की संख्या में 2010 के मुकाबले इजाफा दर्ज किया गया, जिसकी बदौलत यह मेला बहुत ही कामयाब रहा. 
           हालांकि यह कहना मुश्किल है कि यह मेला सिनेमा के साहित्य को कितना लोकप्रिय बना पाया, लेकिन इसने आम दर्शकों को सिनेमाई परदे के पीछे की भरी पूरी दुनिया से रूबरू कराने का काम जरूर किया....   
International Book Fair, Delhi-2012

Saturday, January 21, 2012

शब और शबनम


अजीब शब है
हाथों में चांद का कटोरा लिए
तारों के सिक्के मांगती-फिरती है....

अजीब शब है
मेरी आंखों को
नींद की आगोश में सुलाकर
ख्वाब बिखेर देती हैं वहां....

अजीब शब है
जैसे समंदर की सतह पर भाप
अभी तो नहीं मगर
बरसेगी जरूर एक दिन
अजीब शब है....है न.....


अलसुबह लान में टहलते हुए
शबनम की बूंदों ने
ऐसे हौले से छुआ मुझको
जैसे कि तुमने छुआ हो...

मद्धम हवा के झोंके से फिसलकर
गुलाब की पंखुरी से गिरते हुए 
उस शबनम की बूंद को
अपनी उंगलियों पर ऐसे संभाला मैंने
जैसे लहराकर गिरते हुए 
तुमको संभाल लिया हो मैंने...


Tuesday, January 17, 2012

मशहूर अदीब चित्रा मुदगल साहिबा से एक मुलाक़ात


जब हम घर से दूर होते हैं तो हमारा घर हमें अपनी तरफ खींचता है... ऐसा क्यों?
          जब मैं मुंबई में रहती थी, तब ऐसा लगता था कि वहां मनाया जाने वाला कोई भी त्यौहार मुझे अपने घर वापस जाने के लिए कह रहा हो. गणेश उत्सव चल रहा है, लोग पूजनोत्सव में लगे हुए रहते थे, मगर मेरा मन मेरे गांव की ओर भागता था. मैं यही सोचती थी कि मेरे घर पर भी आज गणेश पूजनोत्सव की धूम होगी और मेरे सभी घर वाले एक साथ मिलकर पूजन कर रहे होंगे. उस वक्त मेरे घर की सभी पुरानी यादें ताजा हो जाती थीं और मैं बिल्कुल उदास हो जाती थी. इसका एक ही कारण है, यह कि मेरी यादों में संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी थीं. सचमुच संस्कृति और परंपराएं हमें अपनी जड़ों से बांधे रखती हैं.

हमारी यादों के लिए हमारी प्रकृति कितनी जिममेदार होती है?
             मनुष्य एक ऐसा सामाजिक प्राणी है, जो सामाजिकता से विच्छिन्न होकर जीने की ललक खोने लगता है. क्योंकि जिस समाज में वह जीता है, वहां की प्रकृति के साथ उसका साहचर्य होता है, एक गहरा नाता होता है. उस प्राकृतिक परिवेश में रहते हुए जो संस्कार उसके अंदर आते हैं, वही उसकी सांस्कृतिक जडें होती हैं. हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एकांतवासी होते हैं, लेकिन जनविहीनता की स्थिति में वे भी अवसादग्रस्त हो जाते हैं. उनके अवसादग्रस्त होने का कारण यह है कि उनकी संस्कृति उन्हें अपनी जड़ों की ओर खींचती तो है, लेकिन वह उससे जुड़ नहीं पाता है. हमारी संस्कृति ही हमें बांधे रखती है. 

शहर और गांव की संस्कृति में बुनियादी फर्क क्या है?
             भारतीय जनमानस अपनी सामाजिकता को कहीं न कहीं सांस्कृतिक पक्ष के भीतर महसूस करता है. क्योंकि हमारी जड़ें हमारे परिवार में होती हैं. भारतीय परिवार की संस्कृति एक साझी संस्कृति है. इस ऐतबार से दो बातें हो सकती हैं. एक तो भारतीय शहरों में संस्कृति तो है, लेकिन साझी संस्कृति नहीं है. जबकि, भारत का ग्रामीण व्यक्ति साझी संस्कृति की विरासत को जीता है. वह उससे दूर होते ही छटपटाने लगता है. यही छटपटाहट उसे उसके घर-परिवार की ओर खींचती हैं. वह खुद को उस अविच्छिन्नता के परिवेश से बाहर निकालने की सोचने लगता है. इसी सोचने के बीच एक ऐसा मौका आता है जब उसे घर जाने की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस होती है, तब वह भाग के घर पहुंच जाता है. 

हमारी संस्कृति और परम्पराएं खोती जा रही हैं. वजह क्या है?
            आज का भारत एक ऐसा भारत है जिसमें उदारीकरण, वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण के पैबंद लग गये हैं. इन्हीं कारणों के चलते हम किसी गांव यह शहर के नहीं रह गये हैं. हमारी संस्कृति में बाहरी संस्कृतियों का ऐसा फ्यूजन हो गया है जिससे हम खुद से जरा सा दूर होने लगे हैं. यहीं रहते हुए हम खुद को तलाशने लगे हैं कि आखिर हम हैं कहां? यह फ्यूजन की ऐसी स्थिति है जिससे हम एक विकल्प तो जरूर ढूंढ लेते हैं, लेकिन विडंबना देखिये कि हम उनके साथ भी नहीं हो पाते. क्योंकि तब हम अपनी सामाजिकता से कट जाते हैं. हम अपनी सांस्कृतिक विरासत से विमुख हो जाते हैं. यह तो जगजाहिर है कि दूरी चाहे जिस चीज की हो, यादों को जन्म देती है. इन यादों में सबसे पहले आता है हमारा घर-परिवार. उसके बाद वहां की प्रकृति, संस्कृति, परंपरा और पास-पड़ोस के भाई-बंधु. हिंदुस्तान अब धीरे-धीरे एक कंक्रीट के जंगल में तब्दील होता जा रहा है. इससे हमारे समाज में जो सबसे बडा नुकसान हुआ है, वह है संवेदना का क्षरण. संवेदना का क्षरण समाज में कई तरह की विकृतियों को जन्म देता है. इससे जड़ें कमजोर होती हैं और हमारे काम करने की ऊर्जा घटने लगती है. इसलिए जरूरी है कि हमारी संवेदनशीलता बरकरार रहे. हम इसे बरकरार रखकर ही अपनी संस्कृति को बचाये रख सकते हैं. 

Friday, January 13, 2012

मंडी हाउस की शाम


मंडी हाउस की शाम
रोज़ एक नया रंग लेके आती है
संगीत, साहित्य, कला
और संस्कृति के पैरोकार
रोज़ इकट्ठा होते हैं यहां
सुरों, लफ़्ज़ों, अदाकारी के
खूबसूरत पौदों को
दोस्तों के क़हक़हों से सींचते हैं
स्नैक्स और चाय की चुस्कियों से
क्कविता फूट के निकलती है जब
‘फिक्की’ सर उठाये सुनने लगता है
मगर गाडि़यों के शोर में
हर्फ नहीं पहुंच पाते उस तक
और कविता
वापस लौट आती है उनके होठों पर।

त्रिवेणी सभागार, एनएसडी और
रविंद्र भवन की कुर्सियों पर बैठकर कविता
खबरचियों से कहती है
कल ‘प्रेमचंद’ आये थे
अपने हाथों में ‘कफ़न’ और ‘गोदान’ लिये
आज शायद टैगोर आयेंगे
बंगाली मार्केट में काफी पीने
और कल हो सकता है
‘ग़ालिब के ख़याल’ की दावत है
तो वो भी आयें।

मंडी हाउस की शाम
सचमुच!
रोज़ एक नया रंग लेके आती है....


Saturday, January 7, 2012

दिल्ली मेट्रो पर एक उदास लड़की


मेट्रो पर एक उदास लड़की को
देखकर ये ख़याल आता है
चांद से उसके हंसी चेहरे पर
क्यों ये रंग-ए-मलाल आता है
ज़ुल्फ़ को शानों पे गिराये हुए
कोई नंबर मिला रही है कहीं
ऐसे अंदाज़ में परीशां है
जैसे ख़ुद को भुला रही है कहीं
खोई-खोई सी आलम-ए-नौ में
जाने वो क्यों उदास बैठी है
या किसी कि तलाश है उसको
होके वो बेशनास बैठी है
कान में नगमा-ए-साहिर की धुन
कह रही बात एक ज़रूरी है
अजनबी बनने का तकाज़ा है
पर मुलाक़ात एक ज़रूरी है
कौन है, कैसा है, ये क्या मालूम
के जिसे अजनबी बनाना है
बस एक बार जिससे मिलना है
आखि़री वादा एक निभाना है
सोचता हूं कि पूछ लूं उससे
ये इंतज़ार का आलम क्यों है
जिसके होठों पे फूल खिलते हों
आंख उसकी ये पुरनम क्यों है

Thursday, January 5, 2012

मेरी तहज़ीब मेरी पहचान


        इस दुनिया के चाहे जिस हिस्से में चले जाएँ, सुकून हमें अपने घर में ही मिलता है. दुनिया की सारी खुशियाँ एक तरफ और हमारे घर की थोड़ी सी खुशी एक तरफ. हम नौकरी के सिलसिले में घर से बाहर होते हैं, यह किसी और मुल्क में होते हैं, हमारा दिल--दिमाग घर में लगा रहता है. उस घर से हमारी संस्कृति, परंपरा और धर्म की सभी बुनियादी चीजें जुड़ी होती हैं, जो कदम-दर-कदम जिंदगी के हमारे साथ होती हैं. ये चीजें हमारी परवरिश के साथ धीरे-धीरे जिंदगी में शामिल होती हैं और यही हमारी पहचान भी बनती हैं. इसी पहचान का नाम संस्कृति है. जब हम अपना घर छोड़ किसी और जगह पर जाते हैं तो यह संस्कृति हमारे साथ हो लेती है. ऐसे में, घर से दूर होते हुए हम महसूस करते हैं कि कुछ चीजें हैं जो हमें हमारे घर की ओर खींच रही हैं. हमसे वापस लौट आने के लिए गुज़ारिश कर रही हैं.
         इस्लामी हदीस बुखारी शरीफ में पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब ने फरमाया, 'जिसने मुंह मोड़ा अपने बाप-दादा से, उसने कुफ्र किया और काफिर का काम किया.' आदमी अपना मजहब तो बदल सकता है, लेकिन अपनी तहजीब, अपने पूर्वज, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं को नहीं बदल सकता. मिसाल के तौर पर आजादी से पहले बहुत से हिंदुस्तानियों को अंग्रेजों ने काम का छलावा देकर यूरोपीय देशों में भेजा और वहां उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया. वे वहां जाकर वापस न आने के लिए मजबूर हो गये, लेकिन उन्होंने अपनी संस्कृति, परंपरा और धर्म को नहीं छोड़ा. आज भी यूरोप के कई हिस्सों में भारतीय संस्कृति की झलक देखी जा सकती है. भारतीय हिंदू परंपरा के तहत होने वाले उत्सवों में भारतीय गीतों के साथ बैले डांस का फ्यूज़न सनातन संस्कृति के जिंदा रहने की बेहतरीन मिसाल है. त्रिनिदाद के चटनी सोसा संगीतकार और गायक रिक्की जय के पूर्वज भारतीय थे. रिक्की जय भारतीय शादियों में महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले गीतों को वेस्टर्न म्यूजिक के साथ मिक्स कर पश्चिमी बाजार में कई एल्बम ला चुके हैं. वे कहते हैं कि मैं भले ही त्रिनिदाद में पैदा हुआ हूं, लेकिन मेरे पूर्वज भारतीय थे, इसलिए मैं भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अपने गीत-संगीत के जरिये जिंदा रखना चाहता हूं. यह ऐसी मिसाल है जिससे यह समझा जा सकता है कि इंसान भले ही सात समंदर पार जाकर रहने लगे, लेकिन वह अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ता. यही वजह है कि बहुत से भारतीयों ने विदेश में बसने के बाद भी वहां की संस्कृति को अपनी संस्कृति में मिला लिया है. यह सिर्फ भारतीय संस्कृति की जड़ों के गहरी होने की बात नहीं है, बल्कि दुनिया की सभी संस्कृति के मानने वालों की बात है.
          हिंदुस्तान के मशहूर इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान अपने एक दीनी तकरीर के सिलसिले में एक बार पाकिस्तान गये. तकरीर के बाद रात के खाने का इंतजाम एक घर की छत पर किया गया था. उस वक्त आसमान में निकले चौदहवीं के चांद को देखकर मौलाना वहीदुद्दीन ने फरमाया, 'यह चांद यहाँ जितना खूबसूरत दिखता है, हिंदुस्तान में भी उतना ही खूबसूरत दिखता होगा.' जाहिर है चांद की खूबसूरती किसी मुल्क के ऐतबार से नहीं बदलती. ठीक ऐसी ही होती है हमारी तहजीब यानि संस्कृति. हम चाहे जहां रहें हमारे दिलों के नाजुक एहसासों में हमारी तहजीब उस चांद की तरह ही चमकती रहती है. यही वजह है कि हिंदुस्तान का कोई शख्स जब अमेरिका नौकरी के लिए जाता है तो घर से निकलते वक्त महफूज़ सफ़र के लिए नारियल फोड़ता है और अपनी मां के हाथों से दही खाकर ही निकलता है. जब वह अमेरिका में नौकरी कर रहा होता है तो उसे मां के हाथों से खाई हुई दही की याद आती है और मां के हाथों के मस को महसूस कर उसकी आंखें नम हो जाती हैं. अगर संस्कृति की जडें गहरी नहीं होतीं तो शायद कुछ ही पलों में वह अपने काम में लग जाता और इसी तरह जीते हुए कुछ ही दिनों बाद एक दिन सबकुछ भूलकर वहीं रच-बस जाता.
           मशहूर साहित्यकार महीप सिंह किसी मुल्क के सफ़र पर थे. कार्यक्रम के दौरान वहां के एक बुजुर्ग ने जब यह सुना कि महीप सिंह उनके वतन भारत से आये हैं तो वह बुजुर्ग उनसे लिपट के फूट-फूट कर रोने लगा. वह बुजुर्ग बनारस का रहने वाला था. उसका धर्म महीप सिंह के धर्म से बिलकुल अलग था, लेकिन उसकी संस्कृति भारतीय संस्कृति थी. इसलिए जब उसने एक भारतीय को देखा तो उससे लिपटकर रोने लगा. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी शायद यही महसूस किया होगा तभी तो उन्होंने आखिरी ख्वाहिश रखी थी कि उनकी अस्थियों को इलाहबाद के संगम में विसर्जित किया जाये. दुनिया के लगभग सभी मुल्कों में हिंदुस्तान के लोग रहते हैं, लेकिन वे अपने पारंपरिक त्योहारों में शामिल होने के लिए परदेस छोड़ देस लौट आते हैं. यही होता है वतन की मिट्टी की खुशबू का आकर्षण. ऐसा कौन है जो इस आकर्षण से बच पाया है?