Friday, July 15, 2011

मुंबई हमले के बाद

अभी तो शहर को पूरी तरह से शहर होना था
अभी तो रौनक़े-बाज़ार मुर्गे-सहर होना था

अभी तो धूप की तासीर का आगाज़ होना था
अभी तो रुख़ हवा का और बेअंदाज़ होना था

अभी तो शाम के सारे मनाजिर रक्स करने थे
अभी तो माहो-अख़्तर के दिलों में रंग भरने थे

अभी तो बुलबुलों के परों का परवाज़ बाक़ी था
अभी तो शहरे-मौसिक़ी का हसीं साज़ बाक़ी था

अभी तो वक्त के सारे तकाज़े आने थे बाक़ी
अभी तो लम्हों-लम्हों के जनाज़े आने थे बाक़ी

के तुमने ख़ुश हवा में ज़हर बमों का मिला डाला
ये गलियों में मिला डाला,वो कूचों में मिला डाला

लगाकर मौत का सामान ख़ुद परवाज़ कर बैठे
बहाकर ख़ून इंसां का ख़ुदी पर नाज़ कर बैठै

न तुमने ये कभी सोचा कि ख़ूं इंसान का होगा
न तो हिंदू का ख़ूं होगा न मुसलमान का होगा

बिछाकर मज़हबी शतरंज चाल दहशत की चलते हो
जेहादी नाम से इंसानियत का सर कुचलते हो

मासूमियत का तुम जो क़त्लेआम करते हो
ख़ुदा वाले ख़ुदा की ज़ात को बदनाम करते हो

ख़ून मज़लूम का हो ये मेरा ईमां नहीं कहता
करो तुम दीन को रुसवा कोई कुर्‌आँ नहीं कहता

इस जेहाद से रब की मुहब्बत मिल नहीं सकती
बहाकर ख़ून इंसां का वो जन्नत मिल नहीं सकती

Friday, July 8, 2011

नाज़ुक ख्यालों वाला एक पहलवान शायर


Qateel Shifai

ज़िन्दगी  में तो सभी प्यार किया करते हैं... मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे  चाहूंगा...    जैसी दिल की नाजुक रगों को छू लेने वाली नज्म लिखने वाले उर्दू के मशहूर व मआरूफ शायर कतील शिफाई की 11 जुलाई को दसवीं बरसी है. पाकिस्तान के हजारा जिले में 24 दिसंबर, 1919 को पैदा हुए कतील शिफाई का असली नाम औरंगजेब खान था. ’कतील‘ इसलिए कि जिसका कत्ल हो गया  हो, यानि  इश्क में फना हो गया  हो और ’शिफाई‘ इसलिए कि वे अपने उस्ताद शायर  शिफा कानपुरी से अपनी बाकमाल शायरी  और कलाम पर इसलाह लिया करते थे. इन दोनों मौजूं ने मिलकर औरंगजेब खान को कतील शिफाई जैसे शायर  की शक्ल दे दी, जिसने उर्दू शायरी को आला मकाम अता करने में अपनी जिंदगी तो लगा दी. मगर अपनी जिंदगी फिल्म एक्ट्रेस चंद्रकांता से बिछडने के बाद तो जैसे सदमें आ गये. लेकिन जुदाई के उस गम ने उनकी शायरी में बेइंतहा रूमानियत भर दी.
सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे  जुदा हूं मैं
लेकिन ये सोचता हूं कि तेरा क्या हूं मैं...
इस बात का वे खुद भी इकरार करते हुए कहते हैं कि, ’अगर चंद्रकांता मुझे छोड़कर नहीं गयी  होती तो मैं अभी तक एक ढर्रे वाली ही शायरी कर रहा होता, जिसमें हकीकत की बजाय् बनावट ज्यादा होती. चंद्रकांता से बिछडने के बाद की शायरी में कल्पनाओं के लिए कोई जगह नहीं है.‘ सचमुच दर्द में डूबी उनकी गजलों में जिंदगी का फलसफा साफ दिखायी देता है, जब वे फरियाद करते हुए कहते हैं...
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह...
और इस फरियाद का असर यह हुआ कि कतील की मकबूलियत  दिन पर दिन बढती गयी. शायरी  के लिए उनकी दीवानगी का आलम यह था कि बीवी-बच्चों की परवरिश के लिए जी-तोड मेहनत करने वाले कतील कलम उठाना कभी नहीं भूलते. उनके इस अंदाज ने जमाने की रुसवाईयों को दरकिनार कर दिया...
चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वगरना हम जमाने भर को समझाने कहां जाते...
कतील शिफाई वैसे तो पाकिस्तान के थे, लेकिन उन्हें पाकिस्तान से ज्यादा हिंदुस्तान में मकबूलियत  हासिल हुई. उनकी मकबूलियत ने उन्हें फिल्मों में गीत लेखन का बेहतरीन मौका दिया. इस मौके को भुनाते हुए कतील ने एक से बढकर एक बेहतरीन गीत लिखे. बालीवुड में बडे दिलवाला, औजार, पेंटर बाबू, फिर तेरी कहानी याद आई, शीरी फरहाद, गुमान जैसी कामयाब फिल्मों के गीतकार रहे कतील शिफाई को भारत और पाकिस्तान के कई अकादमिक पुरस्कारों से भी नवाजा गया. जगजीत सिंह, चित्रा सिंह और गुलाम अली जैसे गजल गायकों  ने तो उनकी गजलों से अपनी आवाज को और शीरी बनाया है. 
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूं तेरा नसीब अपना बना ले मुझको... 
अंग्रेजी के मशहूर कवि वर्ड्स्वर्थ ने कहा था कि, ’पोएट्री इज स्पोंटेनियस ओवरफ्लो आफ पावरफुल इमोशन‘, यानि  शायरी जेहनो-दिल में दफ्फतन उठे जज्बात का नाम है, जिसे काफिया-रदीफ के पैमाने में उतारकर लय और बहर के साथ किसी खूबसूरत गजल या नज्म की शक्ल दी जाती है. मगर कतील शिफाई इससे बिलकुल अलग मिजाज रखते थे. हर लेखक या शायर  के लिखने का ढंग अलग-अलग होता है. मसलन, अल्लामा इकबाल के बारे में बात कही जाती है कि वे फर्शी हुक्का भरकर पलंग पर लेट जाते थे और अपने मुंशी को शेर लिखवाना शुरू कर देते थे. जोश मलीहाबादी अलसुबह सैर को निकल जाते थे और कुदरत के नायाब मनाजिर को देखकर उनके वजूद को शायरी बना लेते थे. बाज शायरों के बारे में यह भी आता है कि वे शराब की घूंट लिये बगैर तो लिख ही नहीं सकते. गोया उनके जेहनो-दिल के गोशे में छुपे नाजुक खयालात कलम के रास्ते बाहर आने के लिए शराब की कीमत मांगते हों. लेकिन कतील शिफाई इन सब पैमानों से बिलकुल अलग सुबह चार बजे ही उठकर दंड-बैठक और तेल मालिश करते थे, फिर शेर लिखना शुरू करते थे. अब ताज्जुब की बात यह है कि जिस्म से हट्टे-कट्टे, पहलवान नजर आने वाले और सुबह-सवेरे दंड-बैठक करने वाले इस शख्स की शायरी में झरनों का सा संगीत, फूलों जैसी महक, महबूबा की कमर जैसी लोच और दर्द में डूबी एक बेवा की जवानी जैसी गमजदा सलाहियतें  कहां से आती थीं. खम ठोंकने और पैंतरे बदलने वाले कतील शिफाई के कमरे से आने वाली आवाज की जगह दर्द भरी मुहब्बत में डूबी हुई गजलों और नज्मों की गुनगुनाहट मचलती थी...
किया है प्यार जिसे हमने जिंदगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह...
किसी की याद में रातभर जागने की बेचैनी और सुबह उठकर पहलवानी करने की आदत के दरमियान वे कैसे अपने दर्द भरे लम्हे को जीते थे, उसकी एक बानगी देखिए...
परेशां रात सारी है सितारे तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारे तुम तो सो जाओ...

Monday, May 9, 2011

आस्था पर भारी धर्मान्धता


हिदुंस्तान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट है हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने की पूरी आजादी है और यह आजादी भारत के वहद संविधान ने दी है जितनी तेजी से आधुनिकता और पश्चिमी सभ्यता अपनी जडे फैला रहे हैं उतनी ही तेजी से धर्मांधता भी बढ रही है आज हिंदूस्तान का कोई युवक अगर अमेरिका नौकरी के लिए जाता है तो घर से दही खाकर और नारियल फोडकर निकलता है क्योंकि यह एक धार्मिक और सांस्कतिक परपंरा है अगर हम अपनी संस्कति और परपरा से सच्चाई से विश्वास करते हैं तो ये बहुत ही अच्छी बात हैं क्योंकि यही चीजें राष्ट को पहचान देती हैं लेकिन जब इनमें रूढियां, आडबंर, कटटरता और हठधर्मिता जैसे तत्व आ जाते हैं तो फिर यही संस्कृति और परंपरा हमारे मानव मूल्यों और दैनन्दिन जीवन पर बोझ सा लगने लगती है
किसी इंसान को भगवान मान लेने का एक चलन सा चल पडा है कुछ साल पीछे अगर जाएं तो ओशो भगवान रजनीश, शिरडी के साईं बाबा, मथुरा के जयगुरूदेव आदि ऐसे कई नाम है जिन्हें हम भगवान का दर्जा दे चुके हैं और अभी आशाराम बापू, सत्य साईं बाबा, संत निंरकारी महाराज, श्री श्री रविशंकर, दक्षिण भारत की अम्मा आदि ऐसे कई नाम हैं जो मुमकिन है कि आने वाले दिनों में ये भी भगवान कहलाए हमारी अगली पीढी जो इनके कुकृत्यों से अंजान होगी और इनको भगवान मान बैठेगी क्या चैरासी लाख देवता कम पड गये थे जो हम खुदाओं की फेहरिस्त लंबी करते जा रहे हैं 
एक अंग्रेज फिलासफर ने कहा है कि " the God, who is prooved, is not the God"  यानी अगर ये सिद्व हो जाए कि फलां व्यक्ति भगवान है तो वो भगवान हो ही नहीं सकता. भगवान की सत्ता इतनी कमजोर नहीं कि किसी भी उपदेशक, धर्मगुरू या दार्शनिक को ही भगवान मान लिया जाए ऋगवेद कहता है "एकुम ब्रहम दूति नि: नि: नास्ति, ना किं चन्न" जिसका अर्थ है ईश्वर एक है, दूसरा नहीं है और न कभी होगा.
काबिले गौर बात यह है कि ऐसी धर्मांधता को बढावा देने वाला हमारा धनाढय और कुलीन वर्ग र्है आज सारे बाबाओं को पूजींपतियों का संरक्षण प्राप्त है। जो हाई प्रोफाइल सोसाइटी के नीति नियंता है और इस  कलियुग में बाबाओ, मुल्लाओं की कुछ बातों का अनुसरण कर उनको भगवान के अवतार के रूप में मानने लगते हैं और धार्मिक टीवी चैनलों के जरिए इसका प्रचार प्रसार भी करते हैं दरअसल ऐ बाबा लोग कुछ धार्मिक किताबों को पढकर, उन्हीं का उद्वरण अपने स्वयं से करते हैं और जनता ये समझती है कि बाबा न कोई चमत्कारिक बात बताई है 
इंसान कैसे कुछ संयोगों के कारण भगवान बन जाता है इसकी एक घटना यहां प्रस्तुत है पिछले साल उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में एक साधारण सा व्यक्ति अपनी मोटर साइकिल पर होकर कहीं जा रहा था अचानक एक मोड आया और उसकी बाइक फिसल कर सडक के किनारे खडड में गिर पडी वो आदमी तुरंत वहीं पर मर गया यह घटना आई गई हो गई कुछ दिनों के बाद उस घटनास्थल पर एक्सीडेंट की घटनाएं रोज होने लगी क्योंकि लोगों के दिलोदिमाग में उस के भूत बनने का भ्रम भर गया था एक दिन एक बाबा जी आए और वहां के सीधे साधे निवासियों से कहने लगे कि अब इस मोटरसाइकिल वाले बाबा की पूजा करनी होगी तभी ये घटनाए रूकेंगी और आज स्थिति ये है कि वहां बाकयदा एक मोटर साइकिल वाले बाबा के नाम से मदिर है और एक पुजारी भी है। लोग रोज वहां पूजा करने जाते है
यह घटना संयोगवश जिस तरह से देवत्व की कहानी का रूप ले चुकी है उससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह बेचारी जनता इन चंद ढोंगी बाबाओ और कठमुल्लाओं के चंगुल में फंस चुकी है आस्था का सवाल आने पर हमारा प्रशासन भी कुछ नहीं करता क्योकि उसमें भी तो ढेर सारे अंधभक्त हैं 
 आज हिदुंस्तान में कोई ऐसा बाबा नहीं जिस पर यौनशोषण और सेक्स रैकेट चलाने का आरोप न हो ऐसे हालात को देखते हुए प्रशासन को एक ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे घर्म की आड में इस तरह के ढोंगी तत्व देश में पैदा न हो सकें।

Saturday, April 30, 2011

जल है तो कल है


रोज अखबारों में कहीं न कहीं खबर छपता है कि आज फलां जगह पर पानी के लिए लड़ाई हुई। पिछले 17 अप्रैल को मुंबई के कुलावा में पानी को लेकर हुई मार पीट में एक व्यक्ति की जान चली गई। राजस्थान में तो औरतें पानी के लिए तीन से चार किलोमीटर तक पैदल चलकर गड्ढों, तालाबों, बावडि़यों तक पहुंचती हैं। इसके बावजूद भी उन्हें गंदा पानी ही नसीब होता है। देश की राजधानी दिल्ली में भी आए दिन पानी को लेकर हंगामा होता ही रहता है। रोज ब रोज पानी की बढ़ती हुई कमी को देखते हुए दैनिक भास्कर का ‘जल है तो कल है’ वैचारिक अभियान बहुत सराहनीय है। एक सर्वे के मुताबिक आधुनिक सुख सुविधाओं से संपन्न शहर के मकानो में रहने वाले लोग कमोड को फ्लश करने में जितना पानी एक बार में खर्च कर देते हैं, उतना एक आदमी के लिए दिन भर के पीने के लिए काफी होता है। आंकड़ों की मानें तो भारत में लगभग 40 करोड़ घरों में इस आधुनिक सुविधा की व्यवस्था है। और एक आदमी दिन भर में कम से कम चार से पांच बार छोटी बड़ी शंका समाधान के लिए बाथरूम जाता है, और हर बार जरूरत से ज्यादा पानी डालता है। इस तरह देखा जाए तो एक व्यक्ति लगभग चार से पांच लोगों के पीने के बराबर यानी 25 से 30 लीटर पानी दिन भर में सिर्फ बाथरूम में बहा देता है, और रोज लगभग 750 करोड़ लीटर से 900 करोड़ लीटर पानी बाथरूम के हवाले हो जाता है। 


अगर इस्तेमाल करने की बात होती तो ठीक था लेकिन यह तो पूरी तरह से गैरजरूरतन पानी की बरबादी है। आए दिन लोग अपनी गाडि़यो को नहलाते मिल ही जाते हैं। अगर वो चाहते तो एक बाल्टी पानी में कपड़ा भिगोकर अच्छी तरह सफाई कर सकते हैं, मगर ऐसा करना वो अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। जितनी तेजी से शहरीकरण बढ़ रहा है उतनी ही तेजी से पानी की कमी भी बढ़ रही है। आज भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा शुद्ध पानी से वंचित है। 


इस पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग पानी से भरा है। इस पानी का 97.3 प्रतिशत भाग महानगरों में है जबकि सिर्फ 2.7 प्रतिशत भाग भूतल पर मौजूद है। युनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के कुल जल संसाधन का 97.3 प्रतिशत समुद्र्री जल के रूप में, 2.1 प्रतिशत बर्फ के रूप में तथा .6 प्रतिशत भूमिगत यानी मृदु जल के रूप में मौजूद है। इस तरह देखा जाए तो पृथ्वी पर पाए जाने वाले कुल जल का सिर्फ .6 प्रतिशत भाग ही मानव प्रयोग हेतु मृदु जल के रूप में मौजूद है।


माना ये जा रहा है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। हो सकता है आपको यह बात कोई अतिशयोक्ति लगे। लेकिन इतना स्पष्ट है कि पानी की कमी अब वैश्विक समस्या बनती जा रही है। आज विश्व की लगभग सात अरब जनसंख्या में से सवा अरब से भी अधिक लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। संयुक्त राष्ट संघ ने भारत को पानी की गुणवत्ता और उपलब्धता के मानकों के आधार पर 120वां स्थान दिया है कि भारत के 38 प्रतिशत शहरों और 82 प्रतिशत गांवों में शुद्ध पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। 


आमिर खान कहते हैं कि रोज अपनी दैनिक जरूरत में से 15 प्रतिशत पानी बचाईए। मुझे नहीं पता वो ऐसा करते हैं या नहीं लेकिन देश का ये 15 प्रतिशत पानी तो फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मों की शूटिंग में बरबाद हो जाता है जो बेवजह, बेजरूरत ही होता है। इमरान हाशमी और सोहा अली खान अभिनीत एक फिल्म आई थी ‘तुम मिले’, जिसमे तकरीबन दो लाख लीटर से ज्यादा पानी शूटिंग में बरबाद किया गया था, जिस पर मीडिया ने एक बहस भी चलाई थी। 15 से 20 प्रतिशत पानी तो भारत में लापरवाहियों के चलते बूंद बूंद गिरते टोटी से बरबाद हो जाता है। हमें सलाम करना चाहिए उस लेखक आबिद सुरती को जिन्होने अपनी लेखकीय धर्म से इतर मंुबई के गली मुहल्ले में बूंद बूंद कर गिरते टोटियों को खुद ठीक करने लिए चल पड़े। भारत के हर नागरिक से ऐसे ही एक सार्थक कदम की जरूरत है। मगर सवाल ये है कि वहां ये कैसे संभव होगा जहां घर की टोटी से टपकते बूंदों के लिए दोष भी सरकार को दिया जाता है। कागज, प्लास्टिक, कूड़ा करकट हम नालियों में फेंकते रहते हैं, और जब बरसात मे पानी सड़कों से होकर घरों में घुसने लगता है, तब हम लोग पानी पी पी कर सरकार को कोसने लगते हैं। यही कूड़ा कचरा आज नालियों और गटरों से होकर हमारी नदियों को मैला कर रहा है जिसके परिणाम स्वरूप कुछ नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं और पानी की किल्लत दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। 


अगर हम नहीं चेते तो सचमुच ये संभव है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए ही हो। इसके लिए भारत के हर नागरिक को अपना नैतिक कर्तव्य समझकर पानी बचाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए, क्योंकि परंपरागत जलश्रोतों को बचाने का दावा तो सरकार बहुत करती है लेकिन सारी घोषणाएं सिर्फ कागजों पर ही होती हैं। उचित रखरखाव की अनदेखी के कारण तालाब, झीलें, नहरें, कूएं और दूसरे जलश्रोत दिन पर दिन सूखते जा रहे हैं। इन्हें बचाने के लिए हम सबको आगे आना होगा, क्योंकि जल है तो कल है। 

Friday, April 22, 2011

खोखली बुनियादें

        
           संस्कृति, परंपरा, आदर्श, तहज़ीब, रीति रिवाज़ और शरियत जैसे बड़े वज़नदार शब्द सुनने में बड़े अच्छे लगते हैं। और ये भी कि इनको शिद्दत से मानना चाहिए और इनका पालन करना चाहिए जिससे समाज में कोई बुराई जड़ न कर जाए। मगर यही शब्द कभी कभार जड़ता का रूप लेकर इंसानी जि़दगी में सड़ांध पैदा करने लगते हैं और इन शब्दों की आवाज़ तब इतनी बदबूदार हो जाती है कि इंसान अपने कान सिकोड़ने लगता है। ऐसे शब्दों को नहीं सुनना चाहता।

            उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में एक कस्बा है बहादुरगंज। वहां मुसलमानों की अक्सरियत है। हिंदू विरादरी भी है लेकिन बहुत कम। मुस्लिम बहुल इलाका होने की वजह से वहां इस्लामी तहजीब की झलक चारों तरफ दिखाई देती है, मगर वह तहजीब सिर्फ बाहरी आवरण भर है। उस तहजीब की बेरंग सूरतें तो उस आवरण के भीतर मौजूद हैं। और विडंबना देखिए कि इन सूरतों में एक भी सूरत किसी पुरूष की नहीं है। पुरूष सत्तात्मक इस समाज ने औरत के पैरों में धर्म और परंपरा की बेडि़यां डालकर उन्हें किस तरह तड़पने पर मजबूर कर दिया है, इसकी बानगी उस कस्बे के घरों की खिड़कियों से असहाय झांकते उन अबला चेहरों को पढ़कर देखा जा सकता है। वो चेहरे हैं उन लड़कियों के जिन्हें शादी के बाद या तो छोड़ दिया गया है या तलाक दे दिया गया है। उस कस्बे में 50 प्रतिशत ऐसी लड़कियां हैं, एक घर में चार लड़कियों में से दो लड़कियां तलाकशुदा हैं या उन्हें उनके पतियों द्वारा प्रताडि़त कर छोड़ दिया गया है। समाज के लोकलाज से डरी सहमी, अवसादग्रस्त ये लड़कियां अपने मायके में अपने छोटे बच्चों को लेकर किसी कैदी की तरह कैद हैं। भरी जवानी में तलाक का दंश झेल रही इन लड़कियों की पहाड़ सी जिंदगी सिर्फ अल्लाह मियां के भरोसे कैसे कट रही है, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। और गरीब मां बाप के पास इतना पैसा नहीं कि वो अपनी बेटियों की मान मर्यादा के लिए केस लड़ सकें।
          कबीर दास जी कहते हैं  ‘‘खाला घरे बेटी ब्याहे, घरहीं में करे सगाई।’’ उन लड़कियों के हालात के मद्देनजर इन पंक्तियों की प्रासंगिकता यह है कि मुसलमानो में चार शादियां जायज हैं लेकिन इन चार शादियो के लिए कैसी कैसी कितनी सूरतें हैं, ये ज्यादातर मुसलमान या यूं कहें तो 90 प्रतिशत मुसलमान इसे नहीं जानते। और शरियत ये कि दूध के रिश्ते को छोड़कर किसी भी लड़की से शादी जायज मानी जाती है। ऐसी स्थिति में चाचा, मामा, बुआ, मौसी की लड़की या गांव की किसी और हमबिरादर लड़की से वहां का कोई भी लड़का शादी कर सकता है। इस्लामी शरीयत और तहजीब के चश्में से देखें तो यह अच्छा लग सकता है, लेकिन जब इसके सामाजिक परिणाम को देखते हैं तो गुस्सा फूट पड़ता है।
        दरअसल इसके पीछे एक जबरदस्त कारण है मुस्लिमों का अशिक्षित होना। मुसलमानों में साक्षरता की दर बहुत ही कम है। अगर वो पढ़ते भी हैं तो सिर्फ अपनी धार्मिक किताबो और शरीयत को ही पढ़ते हैं। इनके अंदर दुनिया, समाज की समझदारी कम है और रूढि़वादिता, कट्टरता ज्यादा है, जिसके परिणाम स्वरूप चार शादी को जायज मानकर तीन को तलाक देकर उनकी जिंदगी बद से बदतर बनाने जैसा घृणित काम करते हुए ये बिल्कुल नहीं सकुचाते, बल्कि ये कहते हैंदृ हम धर्म पे हैं क्योंकि हम जायज पे हैं। मगर तलाक के बाद की नाजायज होने वाली चीजें ये नहीं समझ पाते। यहां तक कि एक घर में जिसने तीन शादियां कर सबको छोड़ दिया है उसी की तीन बहने तलाक लिए बैठी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि जहां इस तरह की तहजीब होगी वहां का माहौल क्या होगा? एक तो इनमे शिक्षा की वैसे ही कमी है, दूसरे दारूल ओलूम के मुफ्ती मुल्ला रोज़ कोई न कोई फतवा देते रहते हैं। अभी पिछले दिनो एक फतवा आया था कि ‘‘ मुस्लिम महिलाओं का मर्दों के साथ काम करना गैरइस्लामी है।’’ क्या ये बताएंगे कि तलाक देकर या छोड़कर उन लड़कियों की जिंदगी बरबाद करना कितना इस्लामी है, जिनकी गोद में एक दो बच्चे हैं। ये ओलमा बहादुरगंज या उस जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों की लड़कियों, औरतों के हालात पर क्यों कुछ नहीं बोलते? क्या सारे फतवे औरतो के लिए है, मर्दों के लिए कुछ नहीं? क्या इन्हें इन सब बातों का इल्म नहीं? है। क्योंकि बहादुरगंज जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों के कुछ लोग ही सही उसी दारूल ओलूम में पढ़ाई करते हैं।
  ये सारे ओलमा भी एक तरह से सत्ताभोगी हैं, जो धार्मिक लबादा पहने अपने मतलब की शरई सियासत करते हैं। मुसलमान गरीब हैं, अशिक्षित हैं, बेरोजगार हैं और लाचार हैं मगर इन मुल्लाओं को इनकी चिंता नहीं है। ये तो बस तब्लीग की दावत देते हैं और बड़ी बड़ी किताबी, शरई बातें करना जानतेे हैं। ये हाईटेक ओलमा अपनी दुकान चलाने के लिए टीवी पर आकर सानिया मिर्जा की शादी पर और उसके स्कर्ट पर तो ख़ूब बोलते हैं, मगर उन अबलाओं, तलाकशुदा लड़कियों की जिंदगी को देखते हुए, जानते हुए भी कुछ नहीं बोलते। हिन्दुस्तान में आज 90 प्रतिशत मुसलमानो को ये नहीं पता कि मानवाधिकार क्या है? महिला आयोग क्या है? ये खुद के लिए भी कोई कानूनी लड़ाई से डरते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप हमेशा दबे कुचले रहते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ इनमे कट्टरता ऐसी है कि अपने नजदीकी मस्जिदों में नमाज भले न पढ़ें मगर बाबरी मस्जिद बनवाकर वहां नमाज पढ़ने की ख्वाहिश पाल रखे हैं।
देखा जाए तो मुसलमानो के लिए हिन्दुस्तान से सुरक्षित जगह पूरी दुनिया में कहीं नहीं, लेकिन फिर भी अपने आस पड़ोस की बुराईयों को नजरअंदाज कर दूसरे मुल्कों के मुसलमानों की हालत पर तरस खाकर कहते हैंदृ‘‘हमें सताया जा रहा है।’’ इन तमाम मौलवी, मुफ्ती, मुल्लाओं को ये सोचना चाहिए कि मुसलमानो में शिक्षा का विस्तार कैसे हो, तभी बहादुरगंज जैसी जगहों पर लड़कियों के साथ हो रहे इन अत्याचारों को रोका जा सकता है। और एक जायज़ समाज का निर्माण किया जा सकता है।  

Sunday, April 3, 2011

उस घर से

इस नये घर में 

वैसे तो सब कुछ है
जब चाहूं तब आने-जाने की आजादी,
सोने-खाने की आजादी, 
बिला-वक्त नाचने गाने की आजादी
और सबसे बढ़कर 
खुलकर जीने की आजादी

मगर ऐसी आजादी 
बेमाने लगती है मुझे
क्योंकि इसमें
सुनीता की डांट नहीं है कहीं
जो कहती थी-
छीः कितने गंदे हो आप!
क्यों सिगरेट पीते हो इतना!

मैम का मासूम गुस्सा नहीं है इसमें
जो कहती थीं-
बहुत गंदा नशा है सिगरेट!
और मेरा जवाब होता था-
सबसे बुरा नशा तो इश्क है मैम
जो अब तक मुझे हुआ नहीं.
और वो हंसकर कहती थीं-
पागल हो गये हैं आप!

सिम्मी, गोलू और निक्कू की 
मासूम हरकतें नहीं हैं इसमे
जिनके साथ खेलते हुए
मैं भी बच्चा बन जाता था,
लौट आता था मेरा बचपन,
उम्र बढ़ जाती थी मेरी...

ऐसा लगता है
सिर्फ अपना जिस्म लेकर
लौट आया हूं वहां से,
मेरा दिल, मेरी रूह
वहीं कहीं छूट गये हैं मुझसे.

अगर ये दोनो मिल जायें आपको
तो प्लीज!!!
कम्बख्तों का कान पकड़ कर 
दो थप्पड़ दीजिएगा
और भेज दीजिएगा मेरे पास.

Thursday, March 24, 2011

त्रिवेणी

ज़रा सा जाग लूँ कि मैं जी लूँ 
नींद का क्या है मौत जैसी है 
नींद आये कि जैसे मौत आये 

Saturday, March 12, 2011

प्रभात खबर 12 मार्च, नदीम हसनैन का इंटरव्यू


तेरी तस्वीर

अलसुबह तेरी तस्वीर
शर्ट की जेब में रखकर,
भूल गया था मैं
और दिन भर ये सोचता रहा
कि चुपके-चुपके कौन
खेलता रहा मेरी धड़कनों से,
हौले-हौले कौन
गुदगुदी करता रहा मेरे सीने में
और दिन भर कौन
अपनी मासूम हरकतों से
परेशान करता रहा मुझको


अजब दिल्लगी है!
परेशान होकर भी
डांट नहीं सकता तेरी तस्वीर को
डर लगता है
कहीं तुम रो न पड़ो
और तुम्हारे आंसुओं से
शर्ट के भीतर छुपा मेरा मासूम दिल
बेवजह, भीग जाये कहीं


Wednesday, February 16, 2011

पुरस्कृत कविता: लोकतंत्र में लोक


पुरस्कृत कविता: लोकतंत्र में लोक


प्रतियोगिता की दूसरी कविता वसीम अकरम की है। यूनिप्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागी वसीम की कविताओं के केंद्र मे सामाजिक और आर्थिक विसंगतियाँ होती हैं, रूढियों और अन्याय के प्रतिरोध का स्वर हो्ता है और सामाजिक परिवर्तन का आह्वान भी होता है। नवंबर माह के यूनिकवि रह चुके वसीम अकरम की एक ग़ज़ल पिछले माह भी शीर्ष दस मे रही थी।

तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओं
कलमाडियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी ज़बान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनितिक खेल बनकर रह जाती है।

Tuesday, February 1, 2011

नज़रे इलाहाबाद विश्वविद्यालय


Allahabad University
जहां आकर अदब के साथ जीना हमने सीखा है
तभी लोगों ने इसका नाम माहो-मश्रिक रखा है

  मीलों दूर से आते ईल्म के पासबां सारे
फूटे जिनकी पेशानी से अहले-ईल्म के तारे

चमन है ये अदीबों का, बग़ावत का, मोहब्बत का
के सारे मुल्क में फैला है चर्चा जिसकी अज़मत का

चमन है ये बग़ावत का जहां बाग़ी हैं हम सारे
हमारी ठोकरों में हैं फ़लक़ के चांद और तारे

चमन है ये मोहब्बत का प्यार के फूल हम सारे
हमारे इश्क़ के दम से हैं ये पुरनूर नज़्ज़ारे

चमन है ये अदीबों का वो रूहानी-इदराक़ है
यहीं महफ़िल है‘बच्चन की यहीं बज़्में फ़िराक़है

हज़ारों माहो-अख़्तर की शोख़ अंगड़ाइयां भी हैं
कहीं बज़्मे-मोहब्बत है कहीं तन्हाइयां भी हैं

यहां की शाम ‘लखनऊ की शाम’ से नहीं कमतर
यहां की सुबह तो है ‘सुबहे बनारस’ से भी बढ़कर

यहीं है ईल्म की गंगा यही तहज़ीब की यमुना
यहीं है संगमो-प्रयाग की पाकीज़गी जाना

सलाम तुझको तेरी शान व शौकत को है सलाम
मिला दर्जा तुझे सेंट्रल की उस अज़मत को है सलाम।।

Friday, January 21, 2011

अधूरी साँस

चाँद के आंगन में 
कितनी रातें काट दी तुमने
तारों के दाने चुनते-चुनते
तेरा इंतज़ार आवाज देकर
बुलाता रहा मुझको
मैने भी कितनी बार चाहा
कि तुम तक
लम्हों के सन्देश भेज दूँ
मगर इत्तफाक ने 
कभी मौका ही नहीं दिया


अधूरी सांस लिए
हम जी तो सकते हैं
मगर मौत को तो
पूरी की पूरी साँस चाहिए
हिसाब की बहुत पक्की है वो
और वक़्त की पाबंद भी।
देखो न!
कितनी देर से
खड़ी है वो मेरे पास


अब, आ भी जाओ
के एक पल के लिए ही सही 
हम पूरी साँस तो जी लें।

Tuesday, January 11, 2011

बेबुनियाद है ईशनिंदा कानून

दुनिया के किसी भी मुल्क में जहां धर्म आधारित राजनीति की दोहरी व्यवस्था है वहां धर्म के नाम पर उदारवादी सोच के लोगों या नीतियों का विरोध करने वाले लोगों की हत्या या उनकी मौत की सजा मुकर्रर करना एक आम बात सी होती है. फिर अगर बात पाकिस्तान की हो तो कोई अचंभे वाली बात नहीं है कि वहां सलमान तासीर की हत्या क्यों हुई. पाकिस्तान एक लोकतांत्रिक मुल्क जरूर है, लेकिन उसकी कुछ राजनैतिक नीतियां धर्म आधारित हैं. आज तक वहां जितनी भी हत्याएं हुई हैं, उनके पीछे राजनीतिक कारण कम और धार्मिक कारण ज्यादा रहे हैं. धार्मिक कानून को मानने वाले मुल्कों में तरक्कीपसंद लोगों के लिए अपनी बात कह पाना बहुत मुश्किल होता है. उनकी प्रोग्रेसिव सोच को या तो दबा दिया जाता है या लोगों के बीच पहुंचने से पहले ही उनकी हत्या कर दी जाती है. ऐसी हत्य्ओं के लिए पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के और भी कई मुल्क हैं, जहां प्रोग्रेसिव सोच के लोगों की हत्याएं होती रहती हैं. पाकिस्तान के इतिहास पर एक नजर डालें, तो पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मंत्री शाहबाज़ भट्टी की हत्या से पहले जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो और लियाकत खान जैसे नेताओं की हत्या में कहीं न कहीं धार्मिक कट्टरता शामिल थी. गौरतलब है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून के तहत पाकिस्तानी ईसाई महिला आसिया बीबी के पक्ष में बोलने के कारण हत्या कर दी गयी. पाकिस्तान में आसिया बीबी को ईशनिंदा कानून के तहत मौत की सजा सुनायी जा चुकी है और वे जेल में हैं. ऐसा कहना कि ईशनिंदा (पैगम्बर मुहम्मद या इस्लाम के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करना) करने पर इसलाम में मौत की सजा का फरमान दिया गया है, तो यह गलत है और बेबुनियाद है.
ईष निंदा कानून क्या है, इसे जानने के लिए इतिहास के पन्नों में झांकने की जरूरत है. इसलामी तारीख के मुताबिक ईशनिंदा कानून पहली बार अब्बासी काल में आया. सन ७५॰ में दुनिया के कई मुल्कों जैसे उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण यूरोप, सिंध और मध्य एशिया में अब्बासी वंश का कब्जा था. अब्बासियों के ही राज में इस्लाम का स्वर्ण युग शुरु हुआ. अब्बासी खलीफा ज्ञान को बहुत महत्त्व देते थे. मुस्लिम दुनिया बहुत तेजी से विश्व का बौद्धिक  केंद्र बनने लगी और उस दौरान मुसलमान और मुसलिम शासक राजनीतिक उच्चता के शिखर पर थे. उनके सत्ता के इस गुरूर ने ईशनिंदा जैसे कानून को जन्म दिया. यह एक नयी कानूनी इजाद थी, जिसे र्कुआन और हदीस दोनों इनकार करते हैं. मतलब यह कि र्कुआन या हदीस में कही गयी बात को तोड-मरोड कर या गलत व्याख्या कर कोई नया कानून बनाने की इजाजत इसलाम में नहीं है. इसलिए पाकिस्तान को भी चाहिए कि इस कानून को फौरन खत्म करे, क्योंकि यह वही ईशनिंदा कानून है जिसे अब्बासियों ने इजाद की थी. ईशनिंदा लोगों को मिली अभिव्यक्ति की आजादी का गलत इस्तेमाल है और इसके लिए कोई कानूनी सजा मुकर्रर नहीं है. अगर कोई शख्स किसी को चोट पहुंचाता है या शारीरिक रूप से नुकसान पहुचाता है, तो उस पर सजा का मामला बनता है, लेकिन वह भी मौत की सजा का नहीं. अगर कोई ईशनिंदा करता है, तो उस पर तो कोई कानूनी सजा का मामला ही नहीं बनता, क्योंकि वह उसकी मानसिक सोच का मामला है. इस ऐतबार से हम किसी को ऐसा करने पर सजा कैसे दे सकते हैं? इस तरह का कानून इस्लाम में कहीं नहीं है. यह कानून इस्लाम के खिलाफ है. पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून जनरल जियाउल हक के शासनकाल में लागू किया गया था. हदीस के जमाने के बाद यानी पैगम्बर मुहम्मद के बाद के जमाने में अरब में कुछ ऐसे शासक हुए, जिन्होंने इस्लामीकरण के नाम पर कुरआन और हदीस की गलत व्याख्या की और मनमाने ढंग से तरह-तरह के कई कानून बनाए , जिन्हें ’फोकहा‘ कहा गया. आज इसको मानने वालों की पूरी दुनिया में एक लंबी फेहरिस्त है, जिसके परिणाम स्वरूप लोगों की हत्याएं होती रही हैं. और जबतक इस कानून को खत्म नहीं किया गया तबतक ऐसा होता रहेगा.
इस्लाम के हवाले से यह बात कही गयी है कि अगर कोई पैगम्बर मुहम्मद साहब या इसलाम के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता है, तो यह  उसकी नासमझी है. मुसलमान विद्वानों को चाहिए कि उस शख्स को समझाएं और इस्लाम की अच्छी बातों को उसके जेहन में उतारने की कोशिश करें. बजाय इसके कि उसकी मौत का फरमान जारी कर दें. पैगम्बर मुहम्मद के बारे में या इस्लाम के बारे में अगर कोई किसी भी तरह की टिप्पणी करता है, यह उसकी जातीय सोच का मामला है जिसके लिए उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. ऐसे घृणित काम के लिए उसे सजा या माफी सिर्फ अल्लाह ही दे सकता है, इंसान नहीं. इस पूरे मसले के मद्देनजर इस्लामी तारीख का एक वाक्या बयान करना मुनासिब होगा. पैगम्बर मुहम्मद जब रास्ते से गुजरते थे तो उनके दुश्मन उनको और इस्लाम के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते थे. सहाबा किराम यानी मुहम्मद साहब के साथी गुस्सा होकर कहते थे कि हुजूर, अगर आप इजाजत दें तो हम उनको सबक सिखाएं. लेकिन पैगम्बर मुहम्मद ने उन्हें मना करते हुए अपने सहाबी साबित अल अंसारी से कहा कि उनके अंदर समझ की कमी है. मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि अल्लाह उन्हें अच्छी हिदायत दे. पैगम्बर मुहम्मद ने उनके खिलाफ किसी भी तरह की सजा से इनकार कर दिया. इस्लाम हमेशा किसी मसले की जड तक जाकर कोई फैसला देने की बात करता है. र्कुआन में आया है- ’किसी भी मसले के पीछे के कारणों को ढूंढकर लोगों को समझाने की कोशिश करनी चाहिए. फौरन उनकी आलोचना नहीं करना चाहिए जो अल्लाह के अलावा किसी और की प्रार्थना करते हैं’’. यहां तक कि र्कुआन में यह भी आया है कि अल्लाह का फरमान है कि अगर कोई किसी दूसरे ईष्वर की पूजा करता है तो उसकी आलोचना और उसके ईश्वर की आलोचना मत करो, नहीं तो वो तुम्हारे ईश्वर की आलोचना करेंगे.
इस्लाम में किसी शख्स की सजा को लेकर बहुत गहराई से बताया गया है. इस्लाम सिर्फ हत्या के मामले में ही सजा की इजाजत देता है. इसके अलावा किसी भी तरह के अपराध के लिए इसलाम में कहीं भी मौत या मौत जैसी सजा मुकर्रर नहीं है. अगर कहीं ऐसा होता है तो एस मुल्क की सरकार को चाहिए कि पहले वो इसलाम को समझने की कोशिश करे, फिर कोई सजा का प्रावधान बनाए और वो सजा भी मौत की नहीं होनी चाहिए. इसलाम तो साफ-साफ कहता है कि अगर किसी ने कोई अपराध किया है तो उसको सजा कोर्ट से ही दी जानी चाहिए और वह भी जूर्म साबित हो जाने के बाद. कोई भी आम नागरिक ऐसा नहीं कर सकता, जैसा कि सलमान तासीर की हत्या मुमताज कादरी ने किया. ऐसे लोग इस्लाम को अच्छी तरह नहीं समझे होते हैं.
मुसलमानों के लिए पाक र्कुआन का बड़ा उंचा मर्तबा है. र्कुआन में अल्लाह ने अपने रसूल, पैगम्बर मुहम्मद को हुक्म देते हुए कहा है कि- ’ऐ मुहम्मद! आप लोगों को इस्लाम के बारे में बताइये . आपका काम सिर्फ लोगों को बताना है, क्योंकि आप निगहबान नहीं हैं’’. इससे यह साबित होता है कि ईशनिंदा जैसे जुर्म में भी किसी को मौत की सजा नहीं दी जा सकती. इस्लाम का दायरा बहुत बडा है. इसलाम सजा से पहले किसी शख्स को दीनी बातों के तहत समझाकर उसे दीन की तरफ आने की दावत देने की बात करता है, न कि फौरन सजा की. लोगों के दिमाग में एक धारणा बन गयी है कि कुरआन एक फरमान जारी करने वाली किताब है. यह बहुत ही गलत धारणा है.कुरआन कोई क्रिमिनल कोड यानी अपराध संहिता नहीं है, बल्कि यह तो एक आस्था वाली किताब है. इस्लाम के सारे तर्क और उपदेश स्थितिजन्य कारणों पर आधारित होते हैं, कि कोई मसला क्यों और कैसे हल किया जाना चाहिए. कुरआन  सामाजिक और राजनैतिक दायरे को अच्छी तरह बताता है. इसलिए विद्वानों को चाहिए कि लोगों के अंदर कुरआन  और इस्लाम की अच्छी समझ पैदा करें.

इश्क का कैंसर

याद है एक दिन 


मेरे मुंह से सिगरेट खींचकर 
फेंक दिया था तुमने गुस्से में 
ये कहते हुए कि
छि:! कितने गंदे हो आप 
और कैंसर का हवाला देकर 
कभी न पीने का 
एक मासूम सा 
मशवरा भी दिया था तुमने 

तेरे उस मशवरे ने 
बचा लिया मुझको कैंसर से 
अब जो तेरे इश्क का कैंसर 
पल पल खाए जा रहा है मुझे 
और तुम खामोश हो ऐसे 
कुछ नहीं जानती जैसे........

Saturday, January 8, 2011

कमबख्त वक़्त

बहुत दिन हुए 

उस गली से गुज़रे

अब तो शायद वो भी

मेरी राह नहीं देखती होगी

कहाँ ठहरता है 

कोई इतने दिनों तक

कहते हैं प्यार के लिए


वक़्त देना पड़ता है

मगर पेट ने 


खरीद लिया है वक़्त को 

अब मेरे पास जो वक्त है

वो पेट के लिए है

और ये वक्त बहुत ज़ालिम है

दिन भर 


काम कराता रहता है मुझसे

कमबख्त! वक़्त 


उसको याद भी नहीं करने देता