Saturday, October 22, 2011

एक नज़्म ‘शब’


न तो इकरार की ‘शब’ है न तो इनकार की ‘शब’ है।
वल्लाह ‘शब’ है या कि इश्क-ए-बेकरार की ‘शब’ है।।

     तुम्हारे शहर से तो बच के अब जाना नहीं मुमकिन।
     ये खंजरों का दिन और ये तलवार की ‘शब’ है।।

घनेरी जुल्फ में रोशन रुख-ए-महताब की चमक।
नूर की बूंद है या कि गुल-ए-रुखसार की ‘शब’ है।।

     निगाह-ए-नाज पे पल्कों का झिंगुर गीत गाता है।
     के जैसे छुट्टियों की सुरमयी बुधवार की ‘शब’ है।।

छुपी शीशे के परदे में कयामतखेज सी आंखें।
उठे तो इश्क की सुबह, झुके तो प्यार की ‘शब’ है।।

     मैं शहर में उसके एक दहकते दिन की तरह हूं।
     और वो खयाल में मेरे एक आबशार की ‘शब’ है।।

ये चांदनी का बदन और उसपे शोखी-ए-खुश्बू।
मचल रही है गोया बादे-नौ-बहार की ‘शब’ है।।

     यूं इश्क की रुसवाइयों का मुन्तजिर होकर।
     मैं तन्हा ही बहुत खुश हूं कि इंतजार की ‘शब’ है।।

ये लब हैं या कि ‘अकरम’ की गजल के एक-दो मिसरे।
ये लरजिश है या आहट सी कोई इजहार की ‘शब’ है।।

Wednesday, October 19, 2011

कबसे हसरत थी


कबसे हसरत थी मुझे


एक मासूम सी ख्वाहिश थी

एक अदना सा तकाजा था

एक छोटी सी इल्तिजा थी

एक बोसीदा सा तसव्वुर था

एक सहमी सी आरजू थी

एक ठहरा सा वलवला था


कि तुम किसी ‘शब’

मेरी महफिल-ए-नाज में

यूं भी आते

यूं भी आते और

अपनी गुदाज बाहों में भरकर

मेरे रूहानी लम्स को जीते।


या किसी ‘शब’ तुम 

यूं भी आते और 

रूखी सी फिजा को छूकर

उसे ‘नम’ करते।


तो मुझे

अपने जिस्म-ओ-जां की

सभी राहतें

तुम्हें सौंप देने में

तकल्लुफ न होता जरा भी ।


कबसे हसरत थी मुझे

कबसे?

शायद! अभी से!

शायद! कल से!

या शायद! अजल से!


कबसे हसरत थी मुझे...

प्रभात खबर 15 अक्तूबर, कमर आगा का इंटरव्यू


Monday, October 3, 2011

जेहनो-दिल का रावण


इस बार दशहरे में फिर
हम जलायेंगे रावण
शायद इस बार
भ्रष्टाचार रूपी रावण की बारी है
उसे जलाकर हम मनायेंगे जश्न
बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न।

बुराई के बजाय
बुराई के प्रतीक को जलाकर
कितना खुश होते हैं हम
और अगली सुबह से ही
अपने कारोबार को फिर
जीने लगते हैं वैसे
जैसे रोज जिया करते थे इससे पहले, 
शराब पीकर सडक पर
बेवजह रिक्शे वाले को डांटकर
उसे अन्ना बनने का 
बेवकूफी भरा मशवरा दे डालते हैं।

खुद में बुराई ढूंढने की बजाय
दुनिया को बुरा कहने से 
कभी नहीं हिचकते हम
कंधे पर गुनाहों की पोटली लिये
दर-ब-दर भटकते हैं
मगर दूसरे को गाली देने से 
बाज नहीं आते कभी भी।

कागजी रावण तो
मर जाता है हर साल
मगर 
हमारे जेहनो दिल में रोज
जन्म लेता है एक रावण।

जिस दिन हम खुद को
गाली देना सीख लेंगे
उस दिन हमारे दिल का रावण भी
मर जायेगा खुद-ब-खुद।

Wednesday, September 28, 2011

पतंगे का वजूद


अजीब हरकत है
समंदर के लहरों की
हौले से पास आयें
तो पैरों में कोई राग उड़ेल कर
नग्मगी करती हैं मीठी सी
और अगर कभी
अपनी औकात पर आ जायें
तो इंसानी वजूद को भी
रेत का जर्रा समझ लेती हैं गोया

मगर उनके वजूद को भी
बिखरते देखा है मैंने
जब कोई अदना सा पतंगा
तेज लहरों के उपर बैठकर
रक्स करता है पलभर के लिए
उनके शोर को
कैद कर लेता है अपने पंखों में

रेत पर इंसानी कदमों के निशान
मिटते देर नहीं लगती जरा भी
मगर तेज लहरों की बूंदों पर
पतंगों के कदमों के निशान
ऐसे अक्सनशीं हो जाते हैं जैसे
अजल से ये चांद तारे
अक्सनशीं हैं आसमां पर...

Friday, September 16, 2011

एक नौकरीशुदा महीना


Wasim Akram
नौकरीशुदा एक महीने के चार हफ्ते
चार युग की तरह होते हैं जैसे
पहला हफ्ता सतयुग की तरह
सैलरी आती है जिसमें
हम बहुत अमीर हो जाते हैं
और सुख-दुख का फर्क
जरा सा भूल जाते हैं कुछ दिनों के लिए।
जिसने पैसे मांगे उसे दिया
और जिसने नहीं मांगे उसे भी दिया,
उन्हीं दिनों ऐसा भी लगता है
कि कहीं न कहीं 'काम का इश्क'
गढ़ता है 'पैसे का हुस्न'।

दूसरा हफ्ता द्वापर की तरह
घर का किराया, राशन का खर्च
और कुछ देनदारियों को मिलाकर
खत्म हो जाती है आधी सैलरी
फिर एक मध्यवर्गीय परिवार के मुखिया की तरह
जुट जाते हैं जोड़-घटाव करने।

Wasim Akram
तीसरा हफ्ता त्रेता की तरह होता है जैसे
मस्तियां पास आये तो हां भी नहीं
हां मगर पूरी तरह ना भी नहीं
और एक चैथाई बची सैलरी में जैसे-तैसे
चलते-चलाते, चुकते-चुकाते
जरा सा बचता है चौथे हफ्ते कलयुग के लिए।
ऐसा लगता है उस वक्त
के 'काम का इश्क'
बिलकुल नहीं गढ़ता 'पैसे का हुस्न'
बल्कि अगली सैलरी के इंतजार में
पैसे का हुस्न ही
गढ़ने लगता है काम के इश्क को।

इसी बीच आफिस जाते हुए किसी दिन
बचते हैं किराये भर के पैसे जेब में जब
कि कोई अपना सा आकर पास हमारे
अपनी जरूरत के लिए मासूम आग्रहों से
उसे भी छीन ले जाता है हमसे
और महीने के आखिरी दो से तीन दिन तो
किसी घोर कलयुग की तरह गुजरते हैं जैसे,
एक कर्ज में हैं मगर फिर
जरूरत पड़ जाती है एक और कर्ज की,
मुश्किल ऐसा कि
थकन से सिर में दर्द हो अगर
तो भी नहीं ले पाते हम दवा कोई।

मगर अगली सुबह ताजगी है चेहरे पर
हम बहुत खुश हैं कि आज सैलरी का दिन है।

Monday, September 12, 2011

कब मिलेगी देश को राष्ट्र भाषा


      किसी देश और उसकी संस्कृति को जानना हो तो सबसे पहले उसकी भाषा को जानना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश की भाषा उसकी संस्कृति की वाहक होती है। भाषा के परों पर सवार होकर ही कोई देश अपनी सभ्यता के उन्नत पड़ाओं को पार करता है। गाँधी जी ने भी कहा था की ''राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है|'' इसलिए देश की अखंडता के लिए बहुत जरूरी है कि पूरा देश अपनी राष्ट्र भाषा में ही बात करें, व्यापार करें, लोकाचार करें और शिक्षा पाये। अन्यथा दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं सर उठाये खड़ी हो जायेंगी और अखंडता के लिए एक चुनौती बन जायेंगी। मनसे और शिवसेना के मराठी मानूस और असम का उदाहरण हमारे सामने है। और पंजाब को हम देख ही रहे हैं जहां बाजार में सारे होर्डिंग पंजाबी में लिखे हैं।
      हमारी सरकारी भाषा के महत्व को कम आंकती रही हैं, तभी तो 64 साल गुजर गये आजादी के मगर हिंदी अभी भी संसद के गलियारों में बेबस, लाचार होकर भटक रही है, क्योंकि अभी तक हम इसे राष्ट्रभाषा के रूप में पूरी तरह से अपना नहीं पाये हैं। और दो सौ सालों की गुलामी की भाषा अंग्रेजी आज सेना, सरकार, बाजार से लेकर शिक्षा और लोकाचार तक फैली अघोषित तौर पर हमारी राष्ट्रभाषा के रूप में राज कर रही है। देश के तमाम नेताओं ने कहा था कि जब तक हिंदी कामकाज नहीं संभाल लेती, तब तक ये दोनों भाषाएं यानी साथ में अंग्रेजी भी काम करे। हिंदी कामकाज संभाल ले तो उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दे दिया जायेगा। इसकी समय सीमा भी तय की गयी कि 1965 तक हिंदी राज का कामकाज संभाल लेगी। और तब अंग्रेजी को मुख्य राजभाषा के पद से मुक्त कर हिंदी को मुख्य राजभाषा का दर्जा दे दिया जायेगा। ‘‘दे दिया जायेगा’’ भविष्य काल का यह वाक्य यह बताने के लिए काफी है कि इस प्रक्रिया की कोई निष्चित समय-सीमा नहीं है। और इसी लिए अभी तक हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रावधान भविष्य के कालचक्र में फंसा हुआ है।
      3 मार्च, 2010 को राज्यसभा में सत्यव्रत चतुर्वेदी और मोतीलाल वोरा ने प्रश्न संख्या 653 में पूछा कि क्या सरकार का ध्यान हाल ही में गुजरात उच्च न्यायालय के उस कथन की ओर गया है, जिसके अनुसार भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है और हिंदी आधिकारिक तौर पर राष्ट्रभाषा नहीं है और नहीं है’’ तो हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है? तात्कालीन गृहराज्यमंत्री अजय माकन ने जवाब देते हुए कहा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के संबंध में कोई प्रावधान नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी संघ की राजभाषा है।’’ इस जवाब को सुनने के बाद आश्चर्य यह है कि किसी ने सरकार से यह नहीं पूछा कि इस देश को उसकी राष्ट्रभाषा कब मिलेगी?
      14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के तौर पर स्वीकार किया। 1955 में बीजी खेर आयोग बना और 1956 में रिपोर्ट भी पेश की गयी।
      जवाहर लाल नेहरू के आष्वासन को ध्यान में रखते हुए राजभाषा अधिनियम बनाया गया। तब से लेकर अब तक कितनी सरकारें आयीं और गयीं मगर राष्ट्रभाषा के नाम पर सब मौन रहीं। यहां तक कि हिंदी प्रदेशों के सांसद भी इसके लिए कुछ नहीं किये। यह एक विडम्बना ही तो है कि संसद में सांसदों की वेतनवृद्धि का बिल आते ही पास हो जाता है मगर संसद के दरवाजे पर 64 साल से खडी हिंदी ठिठकी, सहमी और सकुचाई सी अंग्रेजी के कुर्सी खाली करने का इंतजार कर रही है। सिर्फ सरकार ही नहीं भारतीय हिंदी मीडिया भी कम दोषी नहीं है। हिंदी अखबारों में अंग्रेजी शब्दों और रोमन लिपि का धडल्ले से प्रयोग हो रहा है। अखबार अब द्विभाषी होने लगे हैं, मगर वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों की लंबी-चौड़ी जमात भी इसके विनाशकारी खतरों की तरफ ध्यान नहीं दे रहा है।
      देश की 43 प्रतिशत आबादी यानी लगभग 35 करोड लोग हिंदी बोलने-समझने वाले हैं, जबकि पूरे विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या लगभग 80 से 85 करोड है। इसके बावजूद भी हिंदी की जिस तरह उपेक्षा हो रही है वह काबिले-गौर है। हम अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही पढाना पसंद करते हैं क्योंकि बडा होकर उसे नौकरी करनी है। बाजार की दृष्टि से यह स्थिति सुखद हो सकती है, लेकिन एक राष्ट्र के आत्म सम्मान की दृष्टि से नहीं। अंग्रेजी जिस रफतार से बढ रही है, उससे तो हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने का सपना षायद ही कभी साकार हो। भारत में बोली जाने वाली भाषाओं के बारे में 2001 की जनगणना की रिपोर्ट यह कहती है कि, भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या इस कदर बढ रही है कि वह ब्रिटेन की कुल आबादी से दोगुनी से भी ज्यादा हो गयी है। यही नहीं भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या ने ब्रिटेन को छोड समूचे यूरोप को पीछे छोड दिया है। जबकि पूरी दुनिया में 6141 भाषाएं हैं, जिनमें सर्वाधिक हिंदी बोली जाती है। विष्व की प्राचीनतम एवं एक मात्र वैज्ञानिक भाषा संस्कृत के सरलीकृत स्वरूप हिंदी का उसी की जन्म भूमि पर तिरस्कार हो रहा है और इसके जिम्मेदार खुद हमीं हैं। डाॅ फादर कामिल बुल्के ने कहा था कि-संस्कृत मां, हिंदी गृहणी और अंगे्रजी नौकरानी है।’’ मगर आज आलम यह है कि एक नौकरानी ही रानी बन बैठी है। यही रानी जिसे 2001 की जनगणना के अनुसार अपनी मातृभाषा घोषित करने वाले 10000 में मात्र दो लोग थे यानी .02 प्रतिषत। यह भी एक विडंबना ही है।
      सारी विडंबनाओं के बीच ख़ुशी की बात यह है कि राष्ट्रभाषा के नाम पर संसद में चुप्पी साधने वाले लोग हिंदी को विश्वभाषा बनाने के लिए पिछली सत्र में उठ खडे हुए थे। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए कुछ नेता प्रयासरत हैं। 2010 के मानसून सत्र में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने लोकसभा में यह जानकारी देते हुए कहा कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में 6 भाषाएं मौजूद हैं। चीनी, अरबी, रसियन, स्पैनिश, इंग्लिश और फ्रेंच। इन्हें सम्मिलित रूप से कारसेफ (सी ए आर एस इ एफ) कहा जाता है। यह पूछे जाने पर कि क्या इसके लिए फंड उपलब्ध कराया जा रहा है, कृष्णा ने कहा था कि बात फंड की नहीं, जरूरत मतों की संख्या की है।
      हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए जरूरी संख्या में मत चाहिए। अमेरिका स्थित अप्रवासी भारतीय भी इसके लिए प्रयासरत हैं। फिलहाल संयुक्त राष्ट्र प्रति सप्ताह हिंदी में बुलेटिन जारी करता है। यह सुनकर हम शायद खुश हो लें और बल्लियों उछल भी लें कि चलो, हिंदी राष्ट्रभाषा न सही संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा तो बन जायेगी। और हिंदी-हिंदी करने वाले लोगों को विदेश में हिंदी दिवस मनाने का मौका भी मिलने लगेगा। मगर इन सबके बावजूद भी हिंदी का कितना भला होने वाला है? क्या द्विभाषी अखबार बंद हो जायेंगे? क्या शिक्षा व्यवस्था में कोई बदलाव आयेगा? क्या हिंदी रोजगार की भाषा बन पायेगी? क्या असम और महाराष्ट्र के लोग हिंदी भाषियों का विरोध करना बंद कर देंगे? और क्या हमारा देश अपनी राष्ट्र भाषा का गौरव प्राप्त कर पायेगा? यह सब अभी किसी सपने जैसा है। फिर भी, आइये बढते हैं अगले पडाव की ओर  और मनाते हैं एक और हिंदी दिवस। ठीक वैसे ही जैसे दशहरा, दिवाली, ईद, होली आदि धूमधाम से मनाते हैं। इस उम्मीद के साथ कि आने वाले दिनों में हिंदी भारतवर्ष की न केवल राष्ट्रभाषा होगी, वरन संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा भी होगी। 

प्रभात खबर 10 सितम्बर, शम्सुल इस्लाम का इंटरव्यू


Saturday, September 10, 2011

एक लम्हे के लिए


तेज होती बारिश में 
भीगते हुए अचानक
एक लम्हे के लिए
आ गया मैं उसकी छतरी में

एक लम्हे के लिए
मैंने उसे देखा
और उसने मुझे देखा
एक लम्हे के लिए
हम दोनों मुस्कुराए
एक दूसरे का शुक्रिया किया
और आगे बढ गये

एक लम्हे के लिए ऐसा लगा
मैंने उसे जिया
और उसकी खामोश गहरी आंखों में
अपनी जिंदगी रखकर
मैं आगे बढ गया जैसे

एक लम्हे के लिए ऐसा लगा
जितना दूर होता गया उससे
ठीक उतना ही
पास होता गया उसके
एक लम्हे के लिए

आह! किसी के लिए फकत 
एक लम्हे के लिए जीना भी 
एक खूबसूरत जिंदगी का जीना है

Tuesday, August 30, 2011

इबादत और ख़ुशी का संगम है ईद

        भारत ही नहीं दुनिया के सभी मुल्कों में जो त्यौहार मनाये जाते हैं, (राष्ट्रीय् त्योहारों को छोडकर) वे किसी न किसी रूप में धर्म आधारित ही होते हैं. इन त्यौहारों से सामाजिक कम और धार्मिक सरोकार ज्यादा जुडे होते हैं. लेकिन हां, बदलते समय् और देशकाल के अनुसार कुछ लोगों ने इन त्यौहारों को सामाजिक सरोकारों से जोडकर सामाजिक सौहार्द को बढावा देने के नजरिये से देखा. फिर धीरे-धीरे ऐसे लोगों की तादाद बढती गयी और आज हमारे त्यौहार सिर्फ धार्मिक न रहकर सामाजिक हो गये हैं. यही कारण है कि आज भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म विशेष त्योहारों को भारतीय् त्यौहार का दर्जा दिया जाने लगा है. ईद, होली, दिवाली, लोहडी, क्रिसमस आदि जैसे त्यौहार धार्मिक त्यौहार न होकर विशुद्ध भारतीय् संस्कृति और परंपरा में रचे-बसे पूर्ण रूप से भारतीय् त्यौहार हैं.
             मुसलमानों का त्यौहार ईद मुहब्बत का त्यौहार है. रमजान के 29  या 30 रोजों के बाद खुदा की तरफ से रोजेदारों को दिया गया एक नायाब तोहफा है. ईद का अर्थ है खुशी यानि एक महीने तक रोजा रखने के बाद मिलने वाली एक ऐसी खुशी कि अब तुम अपने सामान्य् दिनों में लौट आये हो, इसलिए खुशियां मनाओ. यह त्यौहार पैगामे मुहब्बत को और बुलंद करता है. यह त्यौहार अल्लाह की इबादत और इंसान की ख़ुशी का एक ऐसा संगम है जहां एक दूसरे के कट्टर दुश्मन भी एक दूसरे से गले मिलकर उनको बधाइयां देते हैं. मिलने-मिलाने और सदियों की दुश्मनी मिटाने की कवायद् करता यह त्यौहार धर्मों के बीच की दीवार को भी खत्म करने का काम करता है. क्योंकि ईद के दिन अपने मुसलमान भाइयों को बधाइयां देना और दावत पे बुलाना तो अच्छा है, लेकिन इस दिन गैर-मुसलमान भाइयों को  बधाइयां देना और दावत पर बुलाना बहुत ही अच्छा है. य्ही इसलाम का दस्तूर है और इंसानियत का तकाजा है. हमारी खुशी तभी हमारी खुशी होगी जब इसमें दूसरे लोग भी शामिल हों. अब चाहे वे किसी भी धर्म-जाति के हो सकते हैं. आज हमारे देश की जो हालत है, इसके मद्देनजर य्ह कहा जा सकता है कि इस तरह के त्यौहारों की उपयोगिता सिद्ध होनी चाहिए.
           ईद की सबसे खास बात यह है कि ईद की नमाज के लिए जाने से पहले हर एक मुसलमान को गरीबों, फकीरों, जरूरतमंदों के लिए फितरा (दान) निकालना जरूरी होता है. एक आदमी पर यह फितरा पौने दो किलो गेहूं या मौजूदा वक्त में इसकी कीमत के बराबर पैसा होता है. कोई आदमी सामान्य लोगों से ज्यादा मालदार है और अगर वह चाहे तो इससे ज्यादा भी अपने आसपास के जरूरतमंदों को दे सकता है. य्ही ईद का संदेश है. य्ह एक ऐसा तरीका है जिससे समाज में बराबरी का माहौल पैदा होता है. अमीर को गरीब के बारे में फिक्र करने की थोडी सी ही सही, लेकिन मोहलत मिल जाती है. इंसानियत का तकाजा भी य्ही है कि अमीर-गरीब की खाई को पाटा जाना चाहिए. ज्यादा से ज्यादा कोशिश होनी चाहिए कि हर इंसान एक दूसरे के लिए राहत का जरिया बनें. ऐसा होना  धर्मनिरपेक्षता का मजबूत होना है. ऐसा होना सांप्रदायिक  सद्भाव का मजबूत होना है. ऐसा होना अखंडता का ताकतवर बनना है. ऐसा होना इंसानियत की उस परंपरा का निर्वाह करना है जहां आकर सभी धर्म और इंसान एक हो जाते हैं. इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि ईद के दिन अमीर-गरीब सब एक साथ चाहे जितनी भी खुशियां मना लें, वह उनके लिए कम ही होगा.
          हिंदुस्तान में कई ऐसे त्यौहार हैं जिसमें हुल्लडबाजी, खेल-तमाशे, शराबनोशी, पंगा-पटाखा आदि के जरिये अपनी खुशी का इजहार किया जाता है. हमारे सभ्य समाज के लिए ये सारी विसंगतियां हैं. इसलिए मेरा मानना है कि त्योहारों में इस तरह की चीजें अगर शामिल न हों तो बेहतर होगा. हमें लोगों की दिली खुशियों का ख्याल करना चाहिए, न कि हुल्लडबाजी पैदा करने वाले कुछ लोगों की. इसके नुकसान क्या हैं, मिसाल देना जरूरी नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इससे त्योहारों की आत्मा पर चोट लगती है और हम एक ऐसी परंपरा कायम कर लेते हैं जिसे हमार समाज बिल्कुल भी पसंद नहीं करता. इसलिए ऐसी चीजों से दूर रहते हुए ईद की खुशियां मनायी जाये तो मैं समझता हूं कि इससे न सिर्फ हम अपनी परंपरा और संस्कृति को संजोने में कामयाब हो जाएंगे, बल्कि भारतीयता की मिसाल को हमेशा के लिए बरकरार रख पाएंगे. इसी उम्मीद व ऐतबार के साथ सबको ईद की ढेर सारी शुभकामनाएं.  

Tuesday, August 9, 2011

गुलदान


मेरे मेज पे रखा गुलदान
उदास रहता था कल तक
मेरे कमरे में दाखिल होते ही
उसमें लगे फूल
मुझे देखकर 
छुप जाते थे पत्तियों में कहीं
उसकी शाखें
ऐसे सिकोड़ लेती थीं खुद को
मानों मैं उन्हें काट खा जाता
पानी बदलते वक्त 
फूल, पत्तियां और शाखें
सब ऐसे घूरते थे नफरत से मुझे
जैसे सदियों की कोई दुश्मनी हो मुझसे


मगर अब खुश हैं सब
मुस्कुराने लगे हैं सारे फूल,
शाखें बेकरार हैं 
मुझको बाहों में भरने के लिए,
पत्तियां बल खाकर
बोसा उछालती हैं मेरी तरफ,
और गुलदान
अपनी आंखों में आंसू लिए
शुक्रिया कहता है मुझे,
पता है क्यूं?


आज सुबह कहा था मैंने
कि अब इस गुलदान को 
तुम्हारे पास भेजने वाला हूँ....

Friday, July 29, 2011

वजूद बचाने की जद्दो जहद

          शहर, एक ऐसे जीवन की कल्पना है जिसमें दुनिया की तमाम ऐशो आराम की चीजों से लेकर इंसान की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का हर एक साधन मौजूद होता है. और शायद्  यही  शहर और उसकी दूर के ढोल सुहावन लगने वाली खूबसूरत जिंदगी ने जरूरतमंदों के लिए एक ऐसा सपना गढा जिसने गांवों से पलायन जैसी विभिषिका को जन्म दिया. उसी सपने ने गंवई लोगों की बेरोजगारी को रोजगार का झांसा दिया, जिसकी  जद में आकर वे शहर तो चले आये, लेकिन यहाँ आने के बाद न तो अपने गांव के रहे और न ही शहर के. रोजगार की तलाश ने गरीबों के मासूम सपनों को ऊंची-ऊंची गगनचुम्बी इमारतों के बीच कहीं गुम कर दिया और वे गुमनामी के अंधेरे में अपने वजूद को बचाये रखने के लिए हर वह काम करने को मजबूर हो गये जो शायद्  उन्होंने भी कभी सोचा नहीं था. आज उनके यही न सोच पाने के कारण ही शहरों में इनका आगमन बढता गया और झुग्गी झोपड़ियों का जन्म हुआ.
Delhi Slums
         सुबह साढे नौ बजने का वक्त था. दिल्ली के पटपडगंज विधानसभा क्षेत्र् के नेहरू कैम्प  कालोनी के पास एक झुग्गी बस्ती मौजूद है. इस झुग्गी में तकरीबन 40 से 50 परिवार रहते हैं. झुग्गी में रहने वाले वे गरीब सुबह काम पर जाने की तैयारी में थे. औरतें घर से बाहर ही उनके लिए ईंट के चुल्हे पर या तो नाश्ता बना रही थीं या फिर रात के बचे खाने को गर्म कर रही थीं. सभी झुग्गी झोपड़ियाँ प्लास्टिक से बनी थीं इसलिए उसमें खाना बनाना खतरे से खाली नहीं था. अब जहां खाना बनाने तक की जगह न हो वहां ट्वाय्लेट-बाथरूम की बात बहुत बेमाने लगती है. ऐसे माहौल में पैदा हुए बच्चे, जहां झुग्गी झोपड़ी के बाहर ही औरतों को नहाना पडता है, किस तहजीब के वारिस होंगे, ये  सोच पाना बहुत मुश्किल है. जहां कहीं भी निगाह पडती थी, हर तरफ जिंदगी को जीने के लिए एक जद्दो-जहद नजर आ रही थी. इसी तरह की जद्दो-जहद के बीच वहीं आसपास नंगधडंग बच्चे ना जाने कौन सा खेल खेल रहे थे और रह-रह कर भद्दी गालियां देते हुए एक दूसरे से लड रहे थे. रात को शराब पीकर सोने वाले कुछ लोग ऐसे भी थे जो अभी तक नशे में थे और गालियां  दिये जा रहे थे. तमाम शहरी विकास को मुंह चिढाती गटर के ऊपर पडी उस बस्ती की तस्वीर को देखकर ऐसा लगने लगा जैसे हम उस सदी में जी रहे हैं जिसमें लोग य्ह नहीं जानते कि विकास क्या होता है. पीने के पानी के नाम पर सरकारी नलों से बहता पानी तो है, लेकिन उसके रख-रखाव की व्यवस्था देखकर ऐसा लगा कि शायद् शहरों में बीमारियां ऐसी जगहों से पैदा होती हैं. बारिश का मौसम है. दिल्ली में अगर फुहारे भी पडते हैं तो सडकों पानी भर जाता है और बेशुमार गाडियों से जाम लग जाता है. ऐसे में य्ह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि बरसात होने पर वे लोग कैसे अपने घरों में रह पाते होगे. जिनके चुल्हे घर के बाहर है बारिश में उनको खाना कैसे मिलता होगा. इस भयावह तसवीर से एक चीज तो साफ है कि गांव में भले रोजगार न हो, लेकिन दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए इस कदर की जिल्लती भरी जिंदगी से होकर नहीं गुजरना पडता है. बीमार होने पर इलाज के लिए वे सरकारी अस्पतालों का सहारा लेते हैं, लेकिन वहां भी उन्हें भर्ती के लिए कई परेशानियों का सामना करना पडता है. मसलन झुग्गी बस्ती में रहने वाले बहुत कम लोगों के पास पहचान पत्र् है, जिसके अभाव में उनके ऊपर भारतीय् होने के पहचान का भी संकट मंडराता रहता है. एक और सबसे बडी समस्या यह है कि दूसरी जगहों के खूंखार अपराधी अपनी पहचान छुपाने और पुलिस से बचने के लिए इन झुग्गी बस्तियों में आकर रहने लगते हैं. कुल मिलाकर झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों की जिंदगी कई विसंगतियों से भरी हुई है.
          वहां लोगों से बात करने पर पता चला कि उस बस्ती में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के उन क्षेत्रों के लोग आकर बसे थे जो आज भी विकास से वंचित हैं. वहां मजदूरी करने, रिक्शा चलाने, चाय्-पानी की दुकानदारी करने, आटो चलाने या फिर कालोनियों में गार्ड की नौकरी करने के साथ-साथ हर वह काम करने वाले लोग रहते थे जिसे मजबूरी का नाम दिया जाता है. बातचीत के दौरान मालूम हुआ कि उस बस्ती का एक प्रधान भी है, जिनका नाम अशोक सिंह था. अशोक बिहार के बाका जिले के निवासी हैं जो आज से तकरीबन 10 साल पहले नौकरी की तलाश में दिल्ली आये थे. आजकल अशोक घरों की रंगाई-पुताई का ठीका लेते हैं और अपनी ही बस्ती से मजदूरों को इकट्ठा कर काम पर ले जाते हैं.
         गांव से पलायन के सवाल पर वे कहते हैं- शहर आने का सबसे बडा कारण है रोजगार. गांव में हमारे लिए काम नहीं है. और इसकी सबसे बडी वजह य्ह है कि हम थोडे कम पढे-लिखे हैं, इसलिए हमको नौकरी तो मिलने से रही और गांव में हम किसी का काम नहीं कर सकते. क्योंकि कल को वह हमारे बच्चों से कहेगा कि तेरा बाप तो मेरे य्हां काम करता था. गांव में मजदूरी करने को लेकर हमारा स्वाभीमान हमारे सामने आ जाता है. हम शहर में आकर नाला साफ कर सकते हैं, लेकिन अब गांव में मजदूरी नहीं कर सकते. अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए दिल्ली आये  थे, लेकिन हम नहीं बना पाये. फिर भी हमें कोई मलाल नहीं है क्योंकि हम अपना स्वाभीमान बचाने में कामयाब रहे.
           बच्चों की शिक्षा व्यवस्था के नाम पर एक सरकारी स्कूल तो था, मगर वहां बच्चों की तादाद बहुत कम थी. झुग्गी के बच्चों के मां-बाप को अपने काम से फुरसत नहीं है और बच्चों को खेलने और झ्गडा-लडाई करने से फुरसत नहीं. दस से बारह घंटे काम करने के बावजूद ज्यादा  से ज्यादा तीन से पांच हजार तक माहवार कमाने वाले और तीन से पांच लोगों का पेट पालने वाले वे गरीब हर रोज प्रशासनिक व्यवस्था का शिकार होते हैं. पास में खडे एक लालाजी नामक बूढे व्यक्ति ने बताया  कि कभी-कभार कुछ लोग गाडी से आते हैं और झुग्गी गिराने की धमकी देकर पैसा मांगते हैं. वे कौन हैं, कहां से आते हैं, हमें नहीं मालूम. मगर उनकी गाडियों में बैठे हथियारबन्दों  को देखकर हम डर जाते हैं और उन्हें पैसे दे देते हैं. पुलिस में हम शिकाय्त भी दर्ज कराते हैं मगर कार्वाही के नाम पर हम खुद ही डांट खाते हैं कि हमने सरकार की जमीन को कब्जा कर रखा है. हमारी कोई नहीं सुनता. हर बार जब भी चुनाव आता है तो नेता हमारे लिए घर बनाने की बात करके वोट मांगते हैं, मगर कितने ही चुनाव बीत गये, हमारी स्थिति आज भी वैसी ही है. 
          बातचीत के बीच हमने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की उस नीति का जिक्र किया जिसके तहत शहरी गरीबों के लिए आवास योजना की बात चल रही है. इस पर अशोक का कहना था कि यह हमारी बस्तियों को हटाने की एक साजिश लगती है. कुछ दिनों पहले तक हमारे पास राशन कार्ड था जिस पर सरकार से कुछ सस्था अनाज मिल जाता था, लेकिन अब पुनर्नवीकरण करने के नाम पर 15 से 20 प्रतिशत लोगों का राशन कार्ड निरस्त कर दिया गया. पहले महीने में मिट्टी का तेल 20 लीटर तक मिलता था, लेकिन अब घटकर 5 से 10 लीटर हो गया  है. जब जीवन की तमाम बुनियादी चीजों में धीरे-धीरे कटौती की जा रही है तब हम सरकार से कैसे उम्मीद करें कि वह हमारे लिए आवास योजना लाएगी. हम तो सरकार से इतना कहते हैं कि हम जहां काम कर रहे हैं, वहां से तीन किमी के दायरे में हमारे लिए जमीन मुहैया करा दे तो हम खुद ही अपना घर बना लेगें. हम जो कुछ कमाते हैं उसमें से बचत भी करते हैं, लेकिन घर इसलिए नहीं बनवाते कि ना जाने कब सरकारी फरमान आ जाय्ो और हमारे घर गिरा दिये  जाएँ. य्ाह एक ऐसी समस्या है जिससे सरकार निजात भी पा सकती है और शहर भी खूबसूरत हो सकता है. लेकिन, जिस तरह हमारी अनदेखी की जाती है, उससे य्ाही लगता है कि सरकार सिर्फ नीतियां बनाना जानती है, उनको लागू करना नहीं. 
           अशोक का मानना है कि हालांकि मनरेगा के बाद गांवों से लोगों का पलायन कुछ कम हुआ है, लेकिन जो लोग मजबूरी का शिकार होकर शहर की झुग्गियों में रहने लगे हैं उनके लिए वापस लौटना थोडा मुश्किल है. इसके कारणों के लिए वे तर्क देते हैं कि शहरों में कई तरह के काम होते हैं. लेकिन मनरेगा में वैसा कोई काम नहीं होता जिसे हम शहर से वहां जाकर कर सकें. शहरों में काम करने का संस्कार गांवो जैसा नहीं है और न ही गांवों में काम करने का संस्कार शहरों जैसा है.
         झुग्गी झोपड़ियों की समस्याओं के प्रति शहरी प्रशासन और नगरपालिका की शून्यता जगजाहिर है. ऐसे में सवाल य्ाह उठता है कि अगर सरकार इन शहरी गरीबों के लिए कोई नीति बनाती भी है तो इसका फाय्दा कैसे उन तक पहुंगा. इस तरह की आशंका सिर्फ हमें ही नहीं, बल्कि उस झुग्गी बस्ती में मौजूद हर उस आदमी की निगाहों में एकदम साफ झ्लक रहा था. दूसरी तरफ उनमें एक उदासीनता का भाव भी स्पष्ट नजर आ रहा था कि सरकार चाहे जो नीति बनाये हमारी हालत सुधरने वाली नहीं है, क्योंकि संसद में बैठे ज़्यादातर नेता भ्रष्ट हैं.

Sunday, July 24, 2011

पिछली रात की बारिश


मानसून की आमद के साथ
कल रात
अचानक हुई तेज बारिश में
निकला था मैं छप्पा करने

गुजरे दो मौसमों की तपिश में
झुलस चुके पीले पत्ते
ऊंघ रहे थे जो दरख्तों पर
गिरने से पहले
लम्हे भर की राहत पाकर  
खिल उठे
कोई जिंदगी मिल गयी हो जैसे

नुक्कड़ के मंदिर में बैठा देवता
लाल हो रहा था गुस्से में,
शाम की आरती में लगे
उसके माथे का टीका
बौछार के नेजे से कटकर
टपक रहा था उसके चेहरे से

खिड़कियाँ खोले वो कंवारियां
हाथ बढ़ाकर खींच लेती थीं जब
पास से गिरती हुई
बूंदों की आंखों से 
मोती टपक पड़ते थे

पिछली रात की वो बारिश
सिर्फ बारिश तो नहीं थी
बादलों का दर्द भी था उसमें...शायद

Friday, July 15, 2011

मुंबई हमले के बाद

अभी तो शहर को पूरी तरह से शहर होना था
अभी तो रौनक़े-बाज़ार मुर्गे-सहर होना था

अभी तो धूप की तासीर का आगाज़ होना था
अभी तो रुख़ हवा का और बेअंदाज़ होना था

अभी तो शाम के सारे मनाजिर रक्स करने थे
अभी तो माहो-अख़्तर के दिलों में रंग भरने थे

अभी तो बुलबुलों के परों का परवाज़ बाक़ी था
अभी तो शहरे-मौसिक़ी का हसीं साज़ बाक़ी था

अभी तो वक्त के सारे तकाज़े आने थे बाक़ी
अभी तो लम्हों-लम्हों के जनाज़े आने थे बाक़ी

के तुमने ख़ुश हवा में ज़हर बमों का मिला डाला
ये गलियों में मिला डाला,वो कूचों में मिला डाला

लगाकर मौत का सामान ख़ुद परवाज़ कर बैठे
बहाकर ख़ून इंसां का ख़ुदी पर नाज़ कर बैठै

न तुमने ये कभी सोचा कि ख़ूं इंसान का होगा
न तो हिंदू का ख़ूं होगा न मुसलमान का होगा

बिछाकर मज़हबी शतरंज चाल दहशत की चलते हो
जेहादी नाम से इंसानियत का सर कुचलते हो

मासूमियत का तुम जो क़त्लेआम करते हो
ख़ुदा वाले ख़ुदा की ज़ात को बदनाम करते हो

ख़ून मज़लूम का हो ये मेरा ईमां नहीं कहता
करो तुम दीन को रुसवा कोई कुर्‌आँ नहीं कहता

इस जेहाद से रब की मुहब्बत मिल नहीं सकती
बहाकर ख़ून इंसां का वो जन्नत मिल नहीं सकती

Friday, July 8, 2011

नाज़ुक ख्यालों वाला एक पहलवान शायर


Qateel Shifai

ज़िन्दगी  में तो सभी प्यार किया करते हैं... मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे  चाहूंगा...    जैसी दिल की नाजुक रगों को छू लेने वाली नज्म लिखने वाले उर्दू के मशहूर व मआरूफ शायर कतील शिफाई की 11 जुलाई को दसवीं बरसी है. पाकिस्तान के हजारा जिले में 24 दिसंबर, 1919 को पैदा हुए कतील शिफाई का असली नाम औरंगजेब खान था. ’कतील‘ इसलिए कि जिसका कत्ल हो गया  हो, यानि  इश्क में फना हो गया  हो और ’शिफाई‘ इसलिए कि वे अपने उस्ताद शायर  शिफा कानपुरी से अपनी बाकमाल शायरी  और कलाम पर इसलाह लिया करते थे. इन दोनों मौजूं ने मिलकर औरंगजेब खान को कतील शिफाई जैसे शायर  की शक्ल दे दी, जिसने उर्दू शायरी को आला मकाम अता करने में अपनी जिंदगी तो लगा दी. मगर अपनी जिंदगी फिल्म एक्ट्रेस चंद्रकांता से बिछडने के बाद तो जैसे सदमें आ गये. लेकिन जुदाई के उस गम ने उनकी शायरी में बेइंतहा रूमानियत भर दी.
सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे  जुदा हूं मैं
लेकिन ये सोचता हूं कि तेरा क्या हूं मैं...
इस बात का वे खुद भी इकरार करते हुए कहते हैं कि, ’अगर चंद्रकांता मुझे छोड़कर नहीं गयी  होती तो मैं अभी तक एक ढर्रे वाली ही शायरी कर रहा होता, जिसमें हकीकत की बजाय् बनावट ज्यादा होती. चंद्रकांता से बिछडने के बाद की शायरी में कल्पनाओं के लिए कोई जगह नहीं है.‘ सचमुच दर्द में डूबी उनकी गजलों में जिंदगी का फलसफा साफ दिखायी देता है, जब वे फरियाद करते हुए कहते हैं...
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह...
और इस फरियाद का असर यह हुआ कि कतील की मकबूलियत  दिन पर दिन बढती गयी. शायरी  के लिए उनकी दीवानगी का आलम यह था कि बीवी-बच्चों की परवरिश के लिए जी-तोड मेहनत करने वाले कतील कलम उठाना कभी नहीं भूलते. उनके इस अंदाज ने जमाने की रुसवाईयों को दरकिनार कर दिया...
चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वगरना हम जमाने भर को समझाने कहां जाते...
कतील शिफाई वैसे तो पाकिस्तान के थे, लेकिन उन्हें पाकिस्तान से ज्यादा हिंदुस्तान में मकबूलियत  हासिल हुई. उनकी मकबूलियत ने उन्हें फिल्मों में गीत लेखन का बेहतरीन मौका दिया. इस मौके को भुनाते हुए कतील ने एक से बढकर एक बेहतरीन गीत लिखे. बालीवुड में बडे दिलवाला, औजार, पेंटर बाबू, फिर तेरी कहानी याद आई, शीरी फरहाद, गुमान जैसी कामयाब फिल्मों के गीतकार रहे कतील शिफाई को भारत और पाकिस्तान के कई अकादमिक पुरस्कारों से भी नवाजा गया. जगजीत सिंह, चित्रा सिंह और गुलाम अली जैसे गजल गायकों  ने तो उनकी गजलों से अपनी आवाज को और शीरी बनाया है. 
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूं तेरा नसीब अपना बना ले मुझको... 
अंग्रेजी के मशहूर कवि वर्ड्स्वर्थ ने कहा था कि, ’पोएट्री इज स्पोंटेनियस ओवरफ्लो आफ पावरफुल इमोशन‘, यानि  शायरी जेहनो-दिल में दफ्फतन उठे जज्बात का नाम है, जिसे काफिया-रदीफ के पैमाने में उतारकर लय और बहर के साथ किसी खूबसूरत गजल या नज्म की शक्ल दी जाती है. मगर कतील शिफाई इससे बिलकुल अलग मिजाज रखते थे. हर लेखक या शायर  के लिखने का ढंग अलग-अलग होता है. मसलन, अल्लामा इकबाल के बारे में बात कही जाती है कि वे फर्शी हुक्का भरकर पलंग पर लेट जाते थे और अपने मुंशी को शेर लिखवाना शुरू कर देते थे. जोश मलीहाबादी अलसुबह सैर को निकल जाते थे और कुदरत के नायाब मनाजिर को देखकर उनके वजूद को शायरी बना लेते थे. बाज शायरों के बारे में यह भी आता है कि वे शराब की घूंट लिये बगैर तो लिख ही नहीं सकते. गोया उनके जेहनो-दिल के गोशे में छुपे नाजुक खयालात कलम के रास्ते बाहर आने के लिए शराब की कीमत मांगते हों. लेकिन कतील शिफाई इन सब पैमानों से बिलकुल अलग सुबह चार बजे ही उठकर दंड-बैठक और तेल मालिश करते थे, फिर शेर लिखना शुरू करते थे. अब ताज्जुब की बात यह है कि जिस्म से हट्टे-कट्टे, पहलवान नजर आने वाले और सुबह-सवेरे दंड-बैठक करने वाले इस शख्स की शायरी में झरनों का सा संगीत, फूलों जैसी महक, महबूबा की कमर जैसी लोच और दर्द में डूबी एक बेवा की जवानी जैसी गमजदा सलाहियतें  कहां से आती थीं. खम ठोंकने और पैंतरे बदलने वाले कतील शिफाई के कमरे से आने वाली आवाज की जगह दर्द भरी मुहब्बत में डूबी हुई गजलों और नज्मों की गुनगुनाहट मचलती थी...
किया है प्यार जिसे हमने जिंदगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह...
किसी की याद में रातभर जागने की बेचैनी और सुबह उठकर पहलवानी करने की आदत के दरमियान वे कैसे अपने दर्द भरे लम्हे को जीते थे, उसकी एक बानगी देखिए...
परेशां रात सारी है सितारे तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारे तुम तो सो जाओ...

Monday, May 9, 2011

आस्था पर भारी धर्मान्धता


हिदुंस्तान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट है हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने की पूरी आजादी है और यह आजादी भारत के वहद संविधान ने दी है जितनी तेजी से आधुनिकता और पश्चिमी सभ्यता अपनी जडे फैला रहे हैं उतनी ही तेजी से धर्मांधता भी बढ रही है आज हिंदूस्तान का कोई युवक अगर अमेरिका नौकरी के लिए जाता है तो घर से दही खाकर और नारियल फोडकर निकलता है क्योंकि यह एक धार्मिक और सांस्कतिक परपंरा है अगर हम अपनी संस्कति और परपरा से सच्चाई से विश्वास करते हैं तो ये बहुत ही अच्छी बात हैं क्योंकि यही चीजें राष्ट को पहचान देती हैं लेकिन जब इनमें रूढियां, आडबंर, कटटरता और हठधर्मिता जैसे तत्व आ जाते हैं तो फिर यही संस्कृति और परंपरा हमारे मानव मूल्यों और दैनन्दिन जीवन पर बोझ सा लगने लगती है
किसी इंसान को भगवान मान लेने का एक चलन सा चल पडा है कुछ साल पीछे अगर जाएं तो ओशो भगवान रजनीश, शिरडी के साईं बाबा, मथुरा के जयगुरूदेव आदि ऐसे कई नाम है जिन्हें हम भगवान का दर्जा दे चुके हैं और अभी आशाराम बापू, सत्य साईं बाबा, संत निंरकारी महाराज, श्री श्री रविशंकर, दक्षिण भारत की अम्मा आदि ऐसे कई नाम हैं जो मुमकिन है कि आने वाले दिनों में ये भी भगवान कहलाए हमारी अगली पीढी जो इनके कुकृत्यों से अंजान होगी और इनको भगवान मान बैठेगी क्या चैरासी लाख देवता कम पड गये थे जो हम खुदाओं की फेहरिस्त लंबी करते जा रहे हैं 
एक अंग्रेज फिलासफर ने कहा है कि " the God, who is prooved, is not the God"  यानी अगर ये सिद्व हो जाए कि फलां व्यक्ति भगवान है तो वो भगवान हो ही नहीं सकता. भगवान की सत्ता इतनी कमजोर नहीं कि किसी भी उपदेशक, धर्मगुरू या दार्शनिक को ही भगवान मान लिया जाए ऋगवेद कहता है "एकुम ब्रहम दूति नि: नि: नास्ति, ना किं चन्न" जिसका अर्थ है ईश्वर एक है, दूसरा नहीं है और न कभी होगा.
काबिले गौर बात यह है कि ऐसी धर्मांधता को बढावा देने वाला हमारा धनाढय और कुलीन वर्ग र्है आज सारे बाबाओं को पूजींपतियों का संरक्षण प्राप्त है। जो हाई प्रोफाइल सोसाइटी के नीति नियंता है और इस  कलियुग में बाबाओ, मुल्लाओं की कुछ बातों का अनुसरण कर उनको भगवान के अवतार के रूप में मानने लगते हैं और धार्मिक टीवी चैनलों के जरिए इसका प्रचार प्रसार भी करते हैं दरअसल ऐ बाबा लोग कुछ धार्मिक किताबों को पढकर, उन्हीं का उद्वरण अपने स्वयं से करते हैं और जनता ये समझती है कि बाबा न कोई चमत्कारिक बात बताई है 
इंसान कैसे कुछ संयोगों के कारण भगवान बन जाता है इसकी एक घटना यहां प्रस्तुत है पिछले साल उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में एक साधारण सा व्यक्ति अपनी मोटर साइकिल पर होकर कहीं जा रहा था अचानक एक मोड आया और उसकी बाइक फिसल कर सडक के किनारे खडड में गिर पडी वो आदमी तुरंत वहीं पर मर गया यह घटना आई गई हो गई कुछ दिनों के बाद उस घटनास्थल पर एक्सीडेंट की घटनाएं रोज होने लगी क्योंकि लोगों के दिलोदिमाग में उस के भूत बनने का भ्रम भर गया था एक दिन एक बाबा जी आए और वहां के सीधे साधे निवासियों से कहने लगे कि अब इस मोटरसाइकिल वाले बाबा की पूजा करनी होगी तभी ये घटनाए रूकेंगी और आज स्थिति ये है कि वहां बाकयदा एक मोटर साइकिल वाले बाबा के नाम से मदिर है और एक पुजारी भी है। लोग रोज वहां पूजा करने जाते है
यह घटना संयोगवश जिस तरह से देवत्व की कहानी का रूप ले चुकी है उससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह बेचारी जनता इन चंद ढोंगी बाबाओ और कठमुल्लाओं के चंगुल में फंस चुकी है आस्था का सवाल आने पर हमारा प्रशासन भी कुछ नहीं करता क्योकि उसमें भी तो ढेर सारे अंधभक्त हैं 
 आज हिदुंस्तान में कोई ऐसा बाबा नहीं जिस पर यौनशोषण और सेक्स रैकेट चलाने का आरोप न हो ऐसे हालात को देखते हुए प्रशासन को एक ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे घर्म की आड में इस तरह के ढोंगी तत्व देश में पैदा न हो सकें।