Saturday, January 21, 2012

शब और शबनम


अजीब शब है
हाथों में चांद का कटोरा लिए
तारों के सिक्के मांगती-फिरती है....

अजीब शब है
मेरी आंखों को
नींद की आगोश में सुलाकर
ख्वाब बिखेर देती हैं वहां....

अजीब शब है
जैसे समंदर की सतह पर भाप
अभी तो नहीं मगर
बरसेगी जरूर एक दिन
अजीब शब है....है न.....


अलसुबह लान में टहलते हुए
शबनम की बूंदों ने
ऐसे हौले से छुआ मुझको
जैसे कि तुमने छुआ हो...

मद्धम हवा के झोंके से फिसलकर
गुलाब की पंखुरी से गिरते हुए 
उस शबनम की बूंद को
अपनी उंगलियों पर ऐसे संभाला मैंने
जैसे लहराकर गिरते हुए 
तुमको संभाल लिया हो मैंने...


Tuesday, January 17, 2012

मशहूर अदीब चित्रा मुदगल साहिबा से एक मुलाक़ात


जब हम घर से दूर होते हैं तो हमारा घर हमें अपनी तरफ खींचता है... ऐसा क्यों?
          जब मैं मुंबई में रहती थी, तब ऐसा लगता था कि वहां मनाया जाने वाला कोई भी त्यौहार मुझे अपने घर वापस जाने के लिए कह रहा हो. गणेश उत्सव चल रहा है, लोग पूजनोत्सव में लगे हुए रहते थे, मगर मेरा मन मेरे गांव की ओर भागता था. मैं यही सोचती थी कि मेरे घर पर भी आज गणेश पूजनोत्सव की धूम होगी और मेरे सभी घर वाले एक साथ मिलकर पूजन कर रहे होंगे. उस वक्त मेरे घर की सभी पुरानी यादें ताजा हो जाती थीं और मैं बिल्कुल उदास हो जाती थी. इसका एक ही कारण है, यह कि मेरी यादों में संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी थीं. सचमुच संस्कृति और परंपराएं हमें अपनी जड़ों से बांधे रखती हैं.

हमारी यादों के लिए हमारी प्रकृति कितनी जिममेदार होती है?
             मनुष्य एक ऐसा सामाजिक प्राणी है, जो सामाजिकता से विच्छिन्न होकर जीने की ललक खोने लगता है. क्योंकि जिस समाज में वह जीता है, वहां की प्रकृति के साथ उसका साहचर्य होता है, एक गहरा नाता होता है. उस प्राकृतिक परिवेश में रहते हुए जो संस्कार उसके अंदर आते हैं, वही उसकी सांस्कृतिक जडें होती हैं. हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एकांतवासी होते हैं, लेकिन जनविहीनता की स्थिति में वे भी अवसादग्रस्त हो जाते हैं. उनके अवसादग्रस्त होने का कारण यह है कि उनकी संस्कृति उन्हें अपनी जड़ों की ओर खींचती तो है, लेकिन वह उससे जुड़ नहीं पाता है. हमारी संस्कृति ही हमें बांधे रखती है. 

शहर और गांव की संस्कृति में बुनियादी फर्क क्या है?
             भारतीय जनमानस अपनी सामाजिकता को कहीं न कहीं सांस्कृतिक पक्ष के भीतर महसूस करता है. क्योंकि हमारी जड़ें हमारे परिवार में होती हैं. भारतीय परिवार की संस्कृति एक साझी संस्कृति है. इस ऐतबार से दो बातें हो सकती हैं. एक तो भारतीय शहरों में संस्कृति तो है, लेकिन साझी संस्कृति नहीं है. जबकि, भारत का ग्रामीण व्यक्ति साझी संस्कृति की विरासत को जीता है. वह उससे दूर होते ही छटपटाने लगता है. यही छटपटाहट उसे उसके घर-परिवार की ओर खींचती हैं. वह खुद को उस अविच्छिन्नता के परिवेश से बाहर निकालने की सोचने लगता है. इसी सोचने के बीच एक ऐसा मौका आता है जब उसे घर जाने की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस होती है, तब वह भाग के घर पहुंच जाता है. 

हमारी संस्कृति और परम्पराएं खोती जा रही हैं. वजह क्या है?
            आज का भारत एक ऐसा भारत है जिसमें उदारीकरण, वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण के पैबंद लग गये हैं. इन्हीं कारणों के चलते हम किसी गांव यह शहर के नहीं रह गये हैं. हमारी संस्कृति में बाहरी संस्कृतियों का ऐसा फ्यूजन हो गया है जिससे हम खुद से जरा सा दूर होने लगे हैं. यहीं रहते हुए हम खुद को तलाशने लगे हैं कि आखिर हम हैं कहां? यह फ्यूजन की ऐसी स्थिति है जिससे हम एक विकल्प तो जरूर ढूंढ लेते हैं, लेकिन विडंबना देखिये कि हम उनके साथ भी नहीं हो पाते. क्योंकि तब हम अपनी सामाजिकता से कट जाते हैं. हम अपनी सांस्कृतिक विरासत से विमुख हो जाते हैं. यह तो जगजाहिर है कि दूरी चाहे जिस चीज की हो, यादों को जन्म देती है. इन यादों में सबसे पहले आता है हमारा घर-परिवार. उसके बाद वहां की प्रकृति, संस्कृति, परंपरा और पास-पड़ोस के भाई-बंधु. हिंदुस्तान अब धीरे-धीरे एक कंक्रीट के जंगल में तब्दील होता जा रहा है. इससे हमारे समाज में जो सबसे बडा नुकसान हुआ है, वह है संवेदना का क्षरण. संवेदना का क्षरण समाज में कई तरह की विकृतियों को जन्म देता है. इससे जड़ें कमजोर होती हैं और हमारे काम करने की ऊर्जा घटने लगती है. इसलिए जरूरी है कि हमारी संवेदनशीलता बरकरार रहे. हम इसे बरकरार रखकर ही अपनी संस्कृति को बचाये रख सकते हैं. 

Friday, January 13, 2012

मंडी हाउस की शाम


मंडी हाउस की शाम
रोज़ एक नया रंग लेके आती है
संगीत, साहित्य, कला
और संस्कृति के पैरोकार
रोज़ इकट्ठा होते हैं यहां
सुरों, लफ़्ज़ों, अदाकारी के
खूबसूरत पौदों को
दोस्तों के क़हक़हों से सींचते हैं
स्नैक्स और चाय की चुस्कियों से
क्कविता फूट के निकलती है जब
‘फिक्की’ सर उठाये सुनने लगता है
मगर गाडि़यों के शोर में
हर्फ नहीं पहुंच पाते उस तक
और कविता
वापस लौट आती है उनके होठों पर।

त्रिवेणी सभागार, एनएसडी और
रविंद्र भवन की कुर्सियों पर बैठकर कविता
खबरचियों से कहती है
कल ‘प्रेमचंद’ आये थे
अपने हाथों में ‘कफ़न’ और ‘गोदान’ लिये
आज शायद टैगोर आयेंगे
बंगाली मार्केट में काफी पीने
और कल हो सकता है
‘ग़ालिब के ख़याल’ की दावत है
तो वो भी आयें।

मंडी हाउस की शाम
सचमुच!
रोज़ एक नया रंग लेके आती है....


Saturday, January 7, 2012

दिल्ली मेट्रो पर एक उदास लड़की


मेट्रो पर एक उदास लड़की को
देखकर ये ख़याल आता है
चांद से उसके हंसी चेहरे पर
क्यों ये रंग-ए-मलाल आता है
ज़ुल्फ़ को शानों पे गिराये हुए
कोई नंबर मिला रही है कहीं
ऐसे अंदाज़ में परीशां है
जैसे ख़ुद को भुला रही है कहीं
खोई-खोई सी आलम-ए-नौ में
जाने वो क्यों उदास बैठी है
या किसी कि तलाश है उसको
होके वो बेशनास बैठी है
कान में नगमा-ए-साहिर की धुन
कह रही बात एक ज़रूरी है
अजनबी बनने का तकाज़ा है
पर मुलाक़ात एक ज़रूरी है
कौन है, कैसा है, ये क्या मालूम
के जिसे अजनबी बनाना है
बस एक बार जिससे मिलना है
आखि़री वादा एक निभाना है
सोचता हूं कि पूछ लूं उससे
ये इंतज़ार का आलम क्यों है
जिसके होठों पे फूल खिलते हों
आंख उसकी ये पुरनम क्यों है

Thursday, January 5, 2012

मेरी तहज़ीब मेरी पहचान


        इस दुनिया के चाहे जिस हिस्से में चले जाएँ, सुकून हमें अपने घर में ही मिलता है. दुनिया की सारी खुशियाँ एक तरफ और हमारे घर की थोड़ी सी खुशी एक तरफ. हम नौकरी के सिलसिले में घर से बाहर होते हैं, यह किसी और मुल्क में होते हैं, हमारा दिल--दिमाग घर में लगा रहता है. उस घर से हमारी संस्कृति, परंपरा और धर्म की सभी बुनियादी चीजें जुड़ी होती हैं, जो कदम-दर-कदम जिंदगी के हमारे साथ होती हैं. ये चीजें हमारी परवरिश के साथ धीरे-धीरे जिंदगी में शामिल होती हैं और यही हमारी पहचान भी बनती हैं. इसी पहचान का नाम संस्कृति है. जब हम अपना घर छोड़ किसी और जगह पर जाते हैं तो यह संस्कृति हमारे साथ हो लेती है. ऐसे में, घर से दूर होते हुए हम महसूस करते हैं कि कुछ चीजें हैं जो हमें हमारे घर की ओर खींच रही हैं. हमसे वापस लौट आने के लिए गुज़ारिश कर रही हैं.
         इस्लामी हदीस बुखारी शरीफ में पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब ने फरमाया, 'जिसने मुंह मोड़ा अपने बाप-दादा से, उसने कुफ्र किया और काफिर का काम किया.' आदमी अपना मजहब तो बदल सकता है, लेकिन अपनी तहजीब, अपने पूर्वज, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं को नहीं बदल सकता. मिसाल के तौर पर आजादी से पहले बहुत से हिंदुस्तानियों को अंग्रेजों ने काम का छलावा देकर यूरोपीय देशों में भेजा और वहां उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया. वे वहां जाकर वापस न आने के लिए मजबूर हो गये, लेकिन उन्होंने अपनी संस्कृति, परंपरा और धर्म को नहीं छोड़ा. आज भी यूरोप के कई हिस्सों में भारतीय संस्कृति की झलक देखी जा सकती है. भारतीय हिंदू परंपरा के तहत होने वाले उत्सवों में भारतीय गीतों के साथ बैले डांस का फ्यूज़न सनातन संस्कृति के जिंदा रहने की बेहतरीन मिसाल है. त्रिनिदाद के चटनी सोसा संगीतकार और गायक रिक्की जय के पूर्वज भारतीय थे. रिक्की जय भारतीय शादियों में महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले गीतों को वेस्टर्न म्यूजिक के साथ मिक्स कर पश्चिमी बाजार में कई एल्बम ला चुके हैं. वे कहते हैं कि मैं भले ही त्रिनिदाद में पैदा हुआ हूं, लेकिन मेरे पूर्वज भारतीय थे, इसलिए मैं भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अपने गीत-संगीत के जरिये जिंदा रखना चाहता हूं. यह ऐसी मिसाल है जिससे यह समझा जा सकता है कि इंसान भले ही सात समंदर पार जाकर रहने लगे, लेकिन वह अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ता. यही वजह है कि बहुत से भारतीयों ने विदेश में बसने के बाद भी वहां की संस्कृति को अपनी संस्कृति में मिला लिया है. यह सिर्फ भारतीय संस्कृति की जड़ों के गहरी होने की बात नहीं है, बल्कि दुनिया की सभी संस्कृति के मानने वालों की बात है.
          हिंदुस्तान के मशहूर इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान अपने एक दीनी तकरीर के सिलसिले में एक बार पाकिस्तान गये. तकरीर के बाद रात के खाने का इंतजाम एक घर की छत पर किया गया था. उस वक्त आसमान में निकले चौदहवीं के चांद को देखकर मौलाना वहीदुद्दीन ने फरमाया, 'यह चांद यहाँ जितना खूबसूरत दिखता है, हिंदुस्तान में भी उतना ही खूबसूरत दिखता होगा.' जाहिर है चांद की खूबसूरती किसी मुल्क के ऐतबार से नहीं बदलती. ठीक ऐसी ही होती है हमारी तहजीब यानि संस्कृति. हम चाहे जहां रहें हमारे दिलों के नाजुक एहसासों में हमारी तहजीब उस चांद की तरह ही चमकती रहती है. यही वजह है कि हिंदुस्तान का कोई शख्स जब अमेरिका नौकरी के लिए जाता है तो घर से निकलते वक्त महफूज़ सफ़र के लिए नारियल फोड़ता है और अपनी मां के हाथों से दही खाकर ही निकलता है. जब वह अमेरिका में नौकरी कर रहा होता है तो उसे मां के हाथों से खाई हुई दही की याद आती है और मां के हाथों के मस को महसूस कर उसकी आंखें नम हो जाती हैं. अगर संस्कृति की जडें गहरी नहीं होतीं तो शायद कुछ ही पलों में वह अपने काम में लग जाता और इसी तरह जीते हुए कुछ ही दिनों बाद एक दिन सबकुछ भूलकर वहीं रच-बस जाता.
           मशहूर साहित्यकार महीप सिंह किसी मुल्क के सफ़र पर थे. कार्यक्रम के दौरान वहां के एक बुजुर्ग ने जब यह सुना कि महीप सिंह उनके वतन भारत से आये हैं तो वह बुजुर्ग उनसे लिपट के फूट-फूट कर रोने लगा. वह बुजुर्ग बनारस का रहने वाला था. उसका धर्म महीप सिंह के धर्म से बिलकुल अलग था, लेकिन उसकी संस्कृति भारतीय संस्कृति थी. इसलिए जब उसने एक भारतीय को देखा तो उससे लिपटकर रोने लगा. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी शायद यही महसूस किया होगा तभी तो उन्होंने आखिरी ख्वाहिश रखी थी कि उनकी अस्थियों को इलाहबाद के संगम में विसर्जित किया जाये. दुनिया के लगभग सभी मुल्कों में हिंदुस्तान के लोग रहते हैं, लेकिन वे अपने पारंपरिक त्योहारों में शामिल होने के लिए परदेस छोड़ देस लौट आते हैं. यही होता है वतन की मिट्टी की खुशबू का आकर्षण. ऐसा कौन है जो इस आकर्षण से बच पाया है?

Monday, January 2, 2012

मशहूर शायर निदा फाजली से हुई बातचीत का एक टुकड़ा


कहीं भी रहूँ, घर की तरह जीता हूँ 

       साल 2011 वैसे ही गुजर गया जैसे इसके पहले 2010 और उसके पहले के सभी साल गुजरते गये थे. लम्हा-दर-लम्हा, वक्त-दर-वक्त, दिन-महीने-साल गुजरते जाते हैं और हम अपनी जिंदगी को वक्त के मुताबिक जिये जाते हैं. इन्हीं गुजरते हुए लम्हों के बीच अक्सर सुनने में आता है जब लोग कहते हैं कि वे जहां पैदा हुए, वह जगह और वह मुल्क उनके लिए सबसे प्यारा है. यह एक अच्छी बात है, क्योंकि एक इंसान के लिए अपनी जड़ों से जुडे रहने का एहसास बहुत अच्छा होता है. वे अपनी तहजीब और रस्मो-रिवाज की  जड़ों में लिपटे तो रहते हैं, लेकिन अपनी बुनियाद की दुहाई देते हुए जहां वे बस जाते हैं, वहीं जीने के आदी भी हो जाते हैं. ऐसे में यह सवाल उठाना कि लोग अपनी  जड़ों  से कटने के बाद उसे मिस (याद) करते रहते हैं, बेमाने हो जाता है.
        तहजीब, रवायतों और परंपराओं को जिंदा रखने जैसी तमाम बातें भारतीय मध्य वर्ग की सोच का नतीजा है. उच्च और निम्न वर्गों में ऐसी कोई सोच नहीं होती. जो निम्न वर्ग से आता है, वह कहीं चला जाये, अपनी मेहनत से अपनी एक दुनिया बना लेता है. उच्च वर्ग कहीं भी जाकर जमीन-जायदाद-घर खरीदकर रहने लगता है. लेकिन मध्य वर्ग एक ऐसा वर्ग है जो दोनों के बीच में बैठकर ऊपर-नीचे दोनों तरफ देखता हुआ लुढकता रहता है. यह बात तो जग जाहिर है कि कोई भी इंसान अपने घर को तभी छोड़ता है जब उसे वहां रोटी नहीं मिलती. या फिर उसके पास इतने पैसे होते हैं कि उसकी ख्वाहिशें उसे बड़े शहर की तरफ खींच लाती हैं. वह वहां जाकर गुजर-बसर करने लगता है और फिर वह उसके लिए वही सबसे अच्छी जगह हो जाती है. इसके बाद भी अगर वह अपनी जड़ों की दुहाई देता है तो यह एक दिखावा मात्र लगता है.
        सबको मालूम है कि हमारे हिंदुस्तान की कुछ भूख दुनिया के तमाम मुल्कों में रोटी खा रही है. दुनिया के दूसरे मुल्कों के लोग भी यहाँ आकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं. बहुत से ऐसे हिंदुस्तानी जो दूसरे मुल्क में हैं उनके अंदर हिंदुस्तान आने की थोड़ी सी भी कसक नहीं है. क्योंकि, जहां भी रोटी होती है वहां आदमी होता है. वैसे ही जैसे- जहां नदी होती है, वहां बस्ती होती है. अगर किसी का जन्म पहाड़ पर हुआ हो और कालांतर में जब उसके जीने के लिए वहां कुछ न हो तो वह नदी किनारे बसी बस्ती की तरफ ही जायेगा. फिर भी वह कहे कि वह  पहाड़ को मिस कर रहा है तो यह दिखावे वाली बात होगी. दुनिया में कोई जगह खराब नहीं होती, बल्कि हम इसे अच्छा या बुरा बना देते हैं. अपनी तहजीब और अपने मुल्क को ही अच्छा मानना, दूसरे की तहजीब और मुल्क को बुरा मानने के बराबर है. यह कोई आज की बात नहीं है. अगर आप गौर करें तो एक जगह से दूसरी जगह पर जाकर बसने की रवायत तो सदियों-सदियों से चली आ रही है. अप्रवास की रवायत से संस्कृतियों का आदान-प्रदान होता रहता है और एक विकसित एवं संतुलित समाज का निर्माण होता है.
        मैं कभी भी अपनी पैदाइशी जगह को अच्छी नहीं कह सकता. मैं कहीं भी रहूं, उसे अपने घर की तरह जीता हूं. मेरे लिए घर बहुत मायने रखता है. मेरे लिए पूरी दुनिया बहुत अच्छी है, इसलिए मेरे घर में एक पूरी दुनिया रहती है. सिर्फ अपने वतन को अच्छा कहने की वतनपरस्ती मेरे लिए एक लानत है. कुरान की पहली लाइन है- अल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल-आलमीन... तारीफ उसकी जो पूरी दुनिया का रब है. हिंदू शास्त्र में लिखा है- कण-कण में नारयान व्याप्त हैं... यानि पूरी दुनिया का एक ही ईश्वर है. बाइबिल कहता है- लेट देयर बी लाईट, देयर वाज लाईट... हमारे  शास्त्र, हमारी किताबें और हमारे धर्म बिना किसी भेदभाव के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात करते हैं. इसे मानने की जरूरत है.  शास्त्र  में आता है- अयं निजः परोवेति, गणना लघुचेतसाम्. उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्...। यानि, यह अपना है और यह पराया है, ऐसी गणना छोटे हृदय वाले लोग करते हैं. उदार हृदय वाले लोगों का तो पृथ्वी ही परिवार है. 

Friday, December 23, 2011

तू... सर्दियों की धूप सी



तू... सर्दियों की धूप सी
गुनगुनी...
तू... सर्दियों की धूप सी
मिनमिनी...
तू... सर्दियों की धूप सी
शीरी-शीरी...
तू... सर्दियों की धूप सी
नग्मगी...
     तू... सर्दियों की धूप सी
     चुलबुली...
     तू... सर्दियों की धूप सी
     खिलखिली...
     तू... सर्दियों की धूप सी
     सन्दली...
     तू... सर्दियों की धूप सी
     मखमली...
तू... सर्दियों की धूप सी
आसपास...
तू... सर्दियों की धूप सी
खास-खास...
तू... सर्दियों की धूप सी
एक लिबास...
तू... सर्दियों की धूप सी
बेशनास...

Thursday, December 15, 2011

गुलज़ार से बातचीत का एक टुकड़ा


एक रवायत का नाम है देवानंद  गुलज़ार 

          देव साहब का इस दुनिया से जाना, एक दुनिया का जाना है। देव और उनकी फिल्मों के बारे में बहुत से लोगों ने बहुत कुछ कहा है। मैं सिर्फ देव साहब के वजूद की बात करूंगा। देव साहब को देखना, उनसे मिलना, उनकी बात करना, ऐसा ही है जैसे उन्हें जीना। जीना भी ऐसे के जैसे शोखियों की सारी हदें उनके वजूद तक जाकर खत्म हो जाती हैं। रवायतों की हाजत उन्हें कभी नहीं रही। हां जब भी वो किसी चीज की हाजत करते थे, वह रवायत जरूर बन जाती थी। बालीवुड में बेमिसाल वजूद के एक अकेले शाहकार थे देव साब। गालिब की शोख, लुत्फ अंदोज मिसरों की तरह थी उनकी अदाकारी, गोया वो हंसें तो मुहब्बत शुरू हो और अगर गमगीन हों तो सबके जेहनो दिल में दर्द की इंतेहाई सूरत नजर आ जाये। फिर तो उस गम के आलम में दिन तो ढल जाता है, लेकिन रात का गुजरना मुश्किल हो जाता है। सरमस्ती, बेबाकी, लुत्फ अंदाजी जैसी चीजें तो उनकी अदाकारी के ऐसे वक्फे थे, जिसे वे जब चाहे जैसे चाहते थे परदे पर उतार देते थे। हालांकि एक आलम आया था जब उन्हें सुरैया से मुहब्बत हुई थी। उस वक्त तो ऐसा लगा था कि देव साहब अपनी शोखियां खो बैठेंगे, लेकिन जिंदगी से भरपूर, हमेशा जवां दिल और हर दिल अजीज देवानंद ने हकीकत की जिंदगी को हकीकत ही रहने दिया और परदे की जिंदगी को परदे पर। इंसान के अंदर जब मुहब्बत अपना घर बना ले तो उसका दिल शायद ही कभी टूटता है। देवानंद भी उसी मुहब्बत का एक नाम है, जिसके पहलू में ‘रोमांसिंग विथ लाइफ’ की इमेज अभी भी बरकार है। आखिरी वक्त भी देव साहब को देखकर यही लगता था कि कलाकार इस दुनिया से विदा होते वक्त अपना जिस्म छोड़ जाते हैं, लेकिन उनकी रूह यहीं रह जाती है। बालीवुड को राज कपूर, दिलीप कुमार और देवानंद की तिकड़ी की वजह से भी याद किया जायेगा। इन तीनों को अपना अभिनय का अजूबा अंदाज था और जीने का भी। तीनों एक दूसरे से जुदा, पर कितने करीब लगते थे तीनों। लगता था एक से जो छूट गया वह दूसरे ने पकड़ लिया है और दूसरे से जो बचा वह तीसरे ने। उनमें से जब भी किसी एक की बात चलेगी तो बाकी दोनों का जिक्र निश्चित रूप से आएगा। अगर मैं ये कहूं तो ये गल्त न होगा कि उनमें से कोई भी एक बाकी दोनों के बिना अधूरा था। उनकी सार्थकता साथ होने में थी। शायद इसीलिए कुदरत ने उन्हें एक ही वक्त नवाजा था। इन तीनों में  बुनियादी फर्क की बात करें तो राज कपूर और दिलीप कुमार की सिनेमेटिक इमेज पर उम्र की धूल जमा हुई सी लगती है, लेकिन देवानंद उम्र के आखिरी पड़ाव में भी वैसे थे जैसे अभी-अभी गाये चले जा रहे हों कि... मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया। 
       वाकई इस सदाबहार और जवां दिल अदाकार के लिए उम्र कभी आड़े नहीं आयी। अगर जिंदगी जीने के जज़्बे और रोमांटिक सलीके की जब भी बात आयेगी, देव साहब हमारे बीच गाते-मुस्कुराते नजर आ जायेंगे..... है अपना दिल तो आवारा, न जाने किसपे आयेगा.... और बहुत मुमकिन है कि वहीं से एक और दास्तान-ए-मुहब्बत शुरू हो जाये और हम एक और मिसाल के वजूद में खुद को ढूंढते नजर आयें। शुक्रिया देव साहब। हमें हमारा वजूद याद दिलाने के लिए। अगर आप दिलीप साहब और राजकपूर ना होते तो फिल्मी दुनिया की तस्वीर आज वैसी ना होती जैसी है! 

Monday, December 12, 2011

दिल्ली-दर-दिल्ली, गालिब की दिल्ली हुई 100 साल की


     हर एक शहर की अपनी एक तहजीब कुछ रवायतें होती हैं जो अपने अंदर उस शहर के वजूद और पहचान को समेटे रहती हैं. गुजिश्ता 100 साल होने को आये दिल्ली को हिंदुस्तान की राजधानी बने. कुछ रवायतों को छोडकर इन सौ सालों में दिल्ली की तहजीब में दशक-दर-दशक कुछ न कुछ बदलाव होता आया है. यह बदलाव गालिब की दिल्ली से लेकर अंग्रेजी  हुक्मरानों की अंग्रेजियत से होते हुए लुटियन की दिल्ली तक पहुंचा और अब, दिल्ली-६ की झूठी दलीलों के बीच से होते हुए देल्ही-बेली की गाली वाली दिल्ली तक पहुंच चुका है. 12 दिसंबर, 1911 को अल-सुबह तकरीबन 80 हजार से भी ज्यादा भीड के बीच ब्रिटेन के किंग जार्ज पंचम ने जब दिल्ली के राजधानी होने का ऐलान किया, तब वहां मौजूद लोग यह समझ भी नहीं पाये कि चंद लम्हों में वो भारत के इतिहास में जुडने वाले एक नये अध्याय का गवाह बन चुके हैं. एक अरसे से चली आ रही दिल्ली की रवायात का वह एक छोटा सा पहलू था, जो ’दिल्ली दूर है‘ की कहावत की तर्जुमानी करता था. इस घटना को आज सौ साल बीत चुके हैं और साल 2011 इतिहास की इसी करवट पर एक नजर डालने का मौका है, जब अंग्रेजों ने एक ऐसे ऐतिहासिक शहर को भारत की राजधानी बनाने का फैसला किया जिसके बसने और उजडने की सफेद-स्याह  दास्तान इतिहास से भी पुरानी है.
     दिल्ली का जिक्र हो और गालिब का जिक्र न हो ऐसा कैसे हो सकता है. हिंदुस्तान की अजीमुशान शख्शियत असदुल्लहा खां गालिब ने तो दिल्ली को गालिब की दिल्ली बना दिया था, जहां अदब की महफिलों में उठने वाली वो वो दाद, वो वाह-वाह बल्लीमारान, चांदनी चौक की गलियों को रौशन किया करते थे. यह गली पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक से मुडकर बल्लीमारान के अंदर जाने पर शम्शी दवाखाना और हकीम शरीफ खां की मसजिद के बीच पडती है. बल्लीमारान वही जगह है, जहां की एक बेनूर अंधेरी सी गली कासिम से एक तरतीब चरागों की शुरू होती थी, एक पुराने सुखन का सफहा खुलता था और जनाब असदुल्लाह खान गालिब का पता मिलता है. वहीं गालिब ने अपना आखिरी वक्त बिताया, जहां आज भी गालिब की हवेली है. वह हवेली दिल्ली प्रदेश सरकार की हिफाजत में है, लेकिन बल्लीमारन की पेंचीदा दलीलों की सी गलियां आज बदहाली के कगार पर हैं और हादसों के इंतजार में हैं कि न जाने कब कोई इमारत जमींदोज हो जायेंगे  मगर हर हाल में गालिब की दिल्ली का अंदाज शायराना ही होता है. आज भी ’मेरा चैन-वैन सब उजडा... बल्लीमारान से उस दरीबे तलक, तेरी मेरी कहानी दिल्ली में...  के बहाने ही सही, गालिब का बल्लीमारान आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है. बल्लीमारान के उस गौरवमयी इतिहास की एक छोटी सी तसवीर के रूप में गालिब और उनकी दिल्ली को हिंदुस्तान के मशहूर व मआरूफ शायर व गीतकार गुलजार ने एक पोट्र्रेट की शक्ल दी है. कुछ यूँ है...

बल्लीमारां के मोहल्लों की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां
सामने टाल के नुक्कड पे, बटेरों के कसीदे
गुडगुडाती हुई पान की पीकों में वह दाद, वह वाह-वा
चंद दरवाजों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज
और धुंधलायी हुई शाम के बेनूर अंधेरे 
ऐसे दीवारों से मुंह जोडकर चलते हैं यहाँ
चूडीवालान के कटरे की बडी बी जैसे
अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाजे टटोले
इसी बेनूर अंधेरी-सी गली कासिम से
एक तरतीब चरागों की शुरू होती है
एक कुरान-ए-सुखन का सफा खुलता है
असदुल्लाह खां गालिब का पता मिलता है...

     जहां गालिब का पता मिलता है, वहीं गालिब की दिल्ली भी मिलती है. गालिब ने कहा था- हमने माना कि तगाफुल ना करोगे लेकिन... खाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक... और सचमुच गालिब की दिल्ली हिंदुस्तान की राजधानी बनने से पहले ही गालिब इस दुनिया-ए-फानी को अलविदा कह गये. जाते-जाते वे अदब की एक ऐसी रवायत छोड गए, जिसके सामने दुनिया की तमाम अदबी रवायतें बौनी नजर आती हैं. गालिब की दिल्ली में बल्लीमारान की गली कासिमजान आज भी उन सबकी पसंद है, जो कबाब का बेहद शौकीन  है या फिर अच्छे मांसाहार का शौक रखता है. अगर आप दिल्ली में हैं और कुछ वक्त मस्ती में खाते-पीते बिताना चाहते हैं तो यकीनन एक ही पसंद होगी बल्लीमारान. लेकिन आज गालिब की दिल्ली का आलम कुछ और ही है. बल्लीमारान की अंधेरी सी गली कासिम आज रौशन जरूर है, लेकिन अब वह दाद, वह वाह-वा की चमक से नहीं, बल्कि अश्लील गालियों की चकाचौंध से. गालिब की उस दिल्ली को याद करते हुए आज की दिल्ली पर मशहूर शायर अनवर जलालपुरी कहते हैं...
कुछ यकीं कुछ गुमान की दिल्ली
अनगिनत इम्तिहान की दिल्ली
ख्वाब, किस्सा, ख्याल,  अफसाना
हाय,  उर्दू जबान की दिल्ली
बेजबानी का हो गयी है शिकार
असदुल्लाह खान की दिल्ली...

दिल्ली दरबार, 12 दिसंबर, 1911

प्रभात खबर 11 दिसंबर, संविधानविद सुभाष कष्यप का इंटरव्यू


Thursday, December 8, 2011

शब की शिफत

शब है तो फसाना-ए-आरजू है
शब है तो हंगामा चार-सू है
          शब है तो उजालों की आजमाइश है
          शब है तो कहकशों की पैमाइश है
शब मुस्कुराये तो चांद तबोताब हो
शब लहराये तो समंदर फैजयाब हो
          शब है तो तारों की रानाई है
          शब है तो आलम-ए-तनहाई है
शब है तो सुबह-ए-इंतजार है
शब है तो बादे-नौ-बहार है
          शब सोये तो पांवों से किरन फूटे
          शब जागे तो चांदनी चमक लूटे
शब हंसे तो गुलों में मसर्रत मचले
शब रोये तो पत्तों पे मोती फिसले
          शब चले तो तारीकी फजा महके
          शब रुके तो महफिल-ए-घटा महके
शब बोले तो फूलों के लब खुल जाये
शब चुप रहे तो नग्मगी मचल जाये
          शब है तो गुलशन-ए-तारीक है
          शब है तो जश्न की तस्दीक है



Wednesday, November 30, 2011

तुझको यूँ चाहा है

तुझको यूँ देखा है, यूँ चाहा है, यूँ पूजा है
तू जो पत्थर की भी होती तो ख़ुदा हो जाती
बेख़ता रूठ गई रूठ के दिल तोड़ दिया
क्या सज़ा देती अगर कोई ख़ता हो जाती
हाथ फैला दिये ईनाम-ए-मोहब्बत के लिये
ये न सोचा कि मैं क्या, मेरी मोहब्बत क्या है
रख दिया दिल तेरे क़दमों पे तब आया ये ख़याल
तुझको इस टूटे हुए दिल की ज़रूरत क्या है
      तुझको यूँ देखा है, यूँ चाहा है, यूँ पूजा है
      तू जो पत्थर की भी होती तो ख़ुदा हो जाती
तेरी उल्फ़त के ख़रीदार तो कितने होंगे तेरे गुस्से का तलबगार मिले या ना मिले लिख दे मेरे ही मुक़द्दर में सज़ायें सारी फिर कोई मुझसा गुनहगार मिले या ना मिले
     तुझको यूँ देखा है, यूँ चाहा है, यूँ पूजा है
     तू जो पत्थर की भी होती तो ख़ुदा हो जाती                                                     
                                      कैफ़ी आज़मी 

Tuesday, November 22, 2011

एक मासूम ख्वाहिश


एक गांव के 
बिल्कुल सीधे-सादे लड़के की
एक मासूम सी ख्वाहिश-

काश!
मेरे पास एक सरकारी नौकरी होती
मेरी शादी हो जाती और मैं
एक मासूम मगर जिद्दी बीवी का
एक भोला सा पति बन जाता।

मेरे पास एक लमरेटा स्कूटर होता
और छुट्टियों के दिन जब
मेरी बीवी घुमाने ले चलने को कहती
तो उस स्कूटर पर उसे बिठाकर
बाजार की तरफ चल देता
बीच रास्ते में रेड लाइट पर
मेरा स्कूटर चुपके से बंद हो जाता
दो-चार किक और घुर्र-घुर्र के बाद
स्कूटर तो नहीं स्टार्ट होता मगर
मेरी बीवी का मासूम गुस्सा स्टार्ट हो जाता
मैं किक पे किक मारता जाता
और वो गाली पे गाली दिये जाती।

जब वो गुस्से में मुझे कोसती हुई 
बड़ी मासूमियत से कहती-
सरकारी नौकर हो मगर अभी भी 
तुम्हारे सपने सरकारी नहीं हुए
कब से कह रही हूं कि अम्पाला न सही
आल्टो, आइटेन या नैनो ही ले लो
और मैं उसकी गुस्सैल मासूमियत पर 
हौले-हौले मुस्कुराता जाता। 

किसी दिन बाजार से सब्जी लाते ही
उसका गुस्सा फिर फूट पड़ता
वो डांटती-
सब्जी भी खरीदना नहीं आया आपको
कुछ भी उठा लाते हैं
ऐसे कि जैसे बिना पैसे के लाते हैं।

और मैं डरा-डरा सा उससे कहता-
एक कप चाय बना दीजिए
कल से आप ही सब्जी ले आइयेगा।

काश!
मेरी भी शादी हो जाती
और मैं किसी का पति बनता।
काश! 
रोज उसकी एक मासूम जिद
मेरी खुशी का कारण बनता।

Friday, November 4, 2011

शब-ए-आरजू



पहले, शब के अंधेरे से 
डर लगता था मुझे,
पर अब, नहीं लगता।
पहले, एक जुंबिश सी उठती थी
तनहाई की,
पर अब नहीं उठती।
पहले, शाम के बेनूर साये
मेरी शब-ए-आरजू को
तारीक बना देते थे,
पर अब नहीं बनाते।
पहले, मेरी रूह
मेरा दिल और मेरा जिस्म
अलग-अलग
टुकड़ों में रहा करते थे,
पर अब नहीं रहते।
पता है क्यों?
कल शब एक ‘शब’ ने
चुपके से कह दिया मुझसे-
'तुम मेरे दिन के ऐसे ‘सूरज’ हो
जिस पर अपनी जुल्फें डाल कर
मैं ‘शब’ बनी हूं...'



Wednesday, November 2, 2011

श्रीलाल शुक्ल की श्रद्धांजलि पर विश्वनाथ त्रिपाठी का इंटरव्यू


अपनी अनूठी धारा के रचनाकार : विश्वनाथ त्रिपाठी


सबसे पहले तो स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल को एक विनम्र श्रद्धांजलि. एक उपन्यासकार के तौर पर श्री शुक्ल उच्च कोटि के रचनाधर्मी थे. साथ में बहुत अच्छे और सुलझे इंसान भी थे. उनकी रचनाधर्मिता ग्रामीण परिवेश की जमीनी सच्चाइयों का विश्‍लेषण करती है, लेकिन इसी विश्‍लेषण के साथ-साथ श्री शुक्ल गंवई व्यवस्था में प्रशासनिक भ्रष्टाचार को लेकर बहुत चिंतित भी रहते थे. वे हिंदी साहित्य की अपनी अनूठी धारा के रचनाकार थे. उनकी भाषा शैली ऐसी थी कि अगर निरा से निरा गंवई आदमी भी पढ़े तो उसे आसानी से समझ में आ जाता है कि ग्रामसभाओं में होने वाले चुनाव और ग्राम प्रधान की दावेदारी में किस तरह की मासूम मगर खतरनाक राजनीति होती है. यह सच्चाई है कि गांव की राजनीति देश की राष्ट्रीय राजनीति से थोड़ी भी कमजोर नहीं होती. इस बात को श्री शुक्ल ने राग दरबारी में साबित किया है और इसी के साथ ग्रामीण व्यवस्था के दुर्गुणों को व्यंग्य के जरिये परिभाषित किया है.
आजादी के बाद लोगों की आकांक्षाएं आसमान छू रही थीं. उन्हें लग रहा था कि अब यह देश एक आदर्श देश बन जायेगा, लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाया तो श्री शुक्ल ने राग दरबारी के जरिये सिद्ध किया कि यह ऐसा देश है जो न कभी बदला है और न कभी बदलेगा. आज भी श्री शुक्ल के राग दरबारी की प्रासंगिकता उतनी ही है, जितनी की तब थी. आज जिस तरह से भ्रष्टाचार को लेकर आंदोलनों का दौर चल रहा है, उसके मद्देनजर हम कह सकते हैं आज के दौर में एक ऐसी कृति का इंतजार रहेगा जो आज का सच बयान कर सके. चाहे वह जमीन अधिग्रहण की त्रासदी हो या भ्रष्टाचार का भस्मासुर, राग दरबारी की प्रासंगिकता यहां पूरी तरह से सिद्ध हो जाती है. यही वजह है कि श्री शुक्ल को एक ऐसा साहित्यकार माना जाता है जो दर्द के तमाम बिंबों को हास्य और व्यंग्य के साहित्यिक रंगों से रंगीन बना देते हैं.
राग दरबारी के जरिये श्रीलाल शुक्ल पर यह आरोप लगता रहा है कि यह व्यंग्य का नहीं, बल्कि हास्य का उपन्यास है. यह बात कुछ हद तक सच भी है, क्योंकि राग दरबारी में व्यंग्य कम है और हास्य ज्यादा. व्यंग्य एक ऐसी विधा है जो प्रतिष्ठा पर प्रहार करता है. लेकिन राग दरबारी में ग्रामीण जीवन की विषमता को प्रदर्शित किया गया है. इसलिए इसमें व्यंग्य की अपेक्षा हास्य ज्यादा नजर आता है. हां, कहीं-कहीं प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरियों का सहारा लेकर उन्होंने व्यंग्य कसा है. यही उपन्यास की मूल भावना बनी और इसे व्यंग्य उपन्यास कहा गया और है भी. व्यंग्य हमेशा प्रतिरोध की रचनाधर्मिता को पैदा करता है, लेकिन राग दरबारी में प्रतिरोध नहीं है, बल्कि ग्राम्य जीवन की उदासीनता की ऐसी परिस्थितियां हैं जो इंसान को हंसने के लिए मजबूर तो करती हैं, साथ ही साथ सोचने के लिए भी प्रेरित करती हैं.
श्रीलाल शुक्ला के रचना संसार में उनके उपन्यास ‘राग दरबारी’ ने उनके लिए एक नया साहित्यिक प्रतिमान गढ़ा था. राग दरबारी और श्रीलाल शुक्ल को एक-दूसरे का पर्याय कहा जाये तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी. बीते कई दशकों में हिंदी उपन्यासों में अगर किसी उपन्यास को लोगों ने खूब पढ़ा है, तो वह राग दरबारी ही है. आजादी के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास ‘राग दरबारी’ (1968) के लिए उन्हें 1969 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ.
आजादी के बाद की सामाजिक, लोकतांत्रिक और राजनीतिक व्यवस्था की खामियों पर हंसता हुआ यह उपन्यास जब लिखा गया था तब यह एक ऐसे व्यंग्य उपन्यास के रूप में लोगों के बीच आया, जो उस वक्त हिंदी साहित्य जगत के लिए एकदम नयी चीज थी. साधारणत: व्यंग्य शैली का प्रयोग तब तक लघुकथा या कहानियों में ही देखा जाता रहा था, लेकिन श्रीलाल शुक्ल ने रागदरबारी लिखकर यह साबित कर दिया था कि व्यंग्य का प्रयोग उपन्यास में भी हो सकता है. यही श्रीलाल शुक्ल की साहित्यिक शक्ति है और उनकी रचनाधर्मिता है. रचनाशीलता को उन्होंने किसी र्ढे में नहीं बंधने दिया. रागदरबारी के बाद आज भी हिंदी साहित्य में ऐसी कोई औपन्यासिक कृति नहीं आयी.
राग दरबारी की चर्चा करते हुए अकसर यह कहा जाता है कि श्रीलाल शुक्ल ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के विकास के मॉडल पर व्यंग्य कसा था, जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, क्योंकि जब यह उपन्यास लिखा गया था तब नेहरू जी इस दुनिया में नहीं थे. हां दूसरी बात यह कही जा सकती है कि नेहरू जिस समाजवादी व्यवस्था को लाना चाहते थे और दिन-रात जिसका सपना देखते थे, वे पूरे नहीं हुए. राग दरबारी नेहरू की इस प्रभावहीनता पर व्यंग्य है, न कि उनके विकास के किसी मॉडल पर.
दरअसल आजादी के बाद का हर भारतीय यही सोचता था कि नेहरूयुगीन समाजवादी भारत में सबकुछ हरा-भरा होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ. पंचवर्षीय योजनाएं बनीं, पंचायती राज व्यवस्था, भूमि सुधार आदि के बारे में बड़ी-बड़ी बातें हो रही थीं, लेकिन इन सभी योजनाओं के बावजूद भारत की ग्रामीण व्यवस्था में भ्रष्टाचार के दीमक लगने शुरू हो गये. बस श्रीलाल शुक्ल ने इसी बात को अपने व्यंग्य अंदाज में राग दरबारी की शक्ल दे दी.
लोग मुझसे पूछ चुके हैं कि उन्हें ज्ञानपीठ देर से क्यों मिला? दरअसल ज्ञानपीठ उन्हीं साहित्यकारों को मिलता है जो बहुत वरिष्ठ होते हैं. किसी नौजवान को ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिलता. देर ही सही, लेकिन ज्ञानपीठ ने सम्मानित करके उनकी प्रतिष्ठा को एक ऊंचा आयाम दिया है.